भगत सिंह की जन्मतिथि पर विशेष रिपोर्ट:लाहौर की आबोहवा में अब भी भगत सिंह बसते हैं, बच्चे उनके किस्से सुनकर बड़े हुए; लोग कहते हैं शहीद-ए-आजम किसी देश-धर्म नहीं, पूरे उपमहाद्वीप के हीरो

3 weeks ago
Special Report On The Date Of Birth Of Bhagat Singh Bhagat Singh Still Lives In The Climate Of Lahore, Children Grew Up Listening To His Tales; People Say Shaheed e Azam Is Not A Nation religion, It Is The Hero Of The Entire Subcontinent

5 मिनट पहलेलेखक: लाहौर से भास्कर के लिए नासिर अब्बास

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यहां 1919 में भगत सिंह पर दर्ज एफआईआर, पोस्टमार्टम रिपोर्ट के कागजात व उनके लिखे पत्र हैं। - Dainik Bhaskar

यहां 1919 में भगत सिंह पर दर्ज एफआईआर, पोस्टमार्टम रिपोर्ट के कागजात व उनके लिखे पत्र हैं।

‘हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली, ये मुश्ते-खाक है फानी रहे न रहे...’ यानी ये जिंदगी खत्म हो जाएगी, पर मेरे विचार जिंदा रहेंगे। भगत सिंह द्वारा जेल से अपने भाई को लिखी आखिरी चिट्‌ठी की ये लाइनें आज भी मौजूं हैं। वे पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की तहसील जरनवाला के बंगा चक 105 जी में पैदा हुए थे। इस सूबे में आज भी बच्चे उनकी कहानियां सुनकर बड़े होते हैं। लाहौर में उनसे जुड़ी जगहों पर 114वीं जयंती की तैयारी शुरू हो गई है।

सैयदा दीप भगत सिंह के दीवानों में से हैं। वे हर साल उनकी जयंती और शहादत दिवस पर कार्यक्रम करती हैं। सैयदा कहती हैं, ‘हम युवा पीढ़ी के दिलों में भगत सिंह को जिंदा रखना चाहते हैं। लाहौर ऐसी जगह है जहां भगत सिंह ने पढ़ाई की और आजादी के लिए फांसी पर झूल गए। यहां की आबोहवा में उनकी विचारधारा का प्रभाव है। उन्होंने पीढ़ियों को अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना सिखाया।’

यहां ब्रेडलॉफ हॉल हो या इस्लामिया कॉलेज, फव्वारा चौक हो या सेंट्रल जेल...भगत सिंह की यादें हर तरफ बसी हैं। उनकी यादें यहां की इमारतों, किताबों, डाक्यूमेंट से लेकर यहां के लोगों के दिलों तक में बसी हैं। ऐसे ही लोगों में से एक हैं, 95 वर्षीय सलीम मलिक। मलिक कहते हैं, ‘भगत सिंह दिलेर और निडर युवा थे। अंग्रेजों की आंखों में आंखें डालकर बात करते थे। वे किसी देश, धर्म के नहीं, पूरे उपमहाद्वीप के हीरो हैं।’

बंटवारे के बाद लुधियाना के मुलापुर गांव से पाकिस्तान विस्थापित हुए 86 वर्षीय चचा अचा कहते हैं, ‘बचपन में मेरे वालिद मुझे भगत सिंह की कहानियां सुनाते थे। लाहौर में उनसे जुड़ी इमारतें दिखाते थे। आज भी सूबे में यह परंपरा कायम है।’ इतिहासकार इकबाल बताते हैं, ‘लाहौर क्रांतिकारी और सुधारवादी आंदोलनों का केंद्र रहा है। शहर के बीचों-बीच बना इस्लामिया काॅलेज स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा रहा।

यहीं भगत सिंह ने ब्रिटिश अफसर जॉन सैंडर्स पर गोली चलाई थी। सेंट्रल जेल में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई। जेल की जगह शादमान चौक बन गया, इसे भगत सिंह चौक भी कहा जाता है।’ भगत सिंह और उनके मित्रों ने कश्मीर बिल्डिंग परिसर के रूम नंबर 69 में शहर की पहली बम फैक्ट्री बनाई थी। बाद में यह बिल्डिंग होटल में तब्दील हो गई। 1988 में उस जगह शॉपिंग प्लाजा बना दिया गया।

भगत सिंह से जुड़ी किताबें-पत्र आज भी सुरक्षित
हम भगत सिंह के यादों को खंगालने आर्काइव विभाग पहुंचे। यहां 1919 में भगत सिंह पर दर्ज एफआईआर, पोस्टमार्टम रिपोर्ट के कागजात व उनके लिखे पत्र हैं। एक पत्र है, जिसमें उन्होंने जेलर से मियांवली से लाहौर जेल भेजने की मांग की थी। यहां ‘बेजुबान दोस्त’, ‘गंगा दास डाकू’ जैसी कुछ किताबें भी हैं।

इन्हें वे जेल में पढ़ा करते थे। आर्काइव डिपार्टमेंट के सचिव ताहिर युसूफ कहते हैं, ‘भगत सिंह उनमें से हैं, जिनकी वजह से हम खुले आसमान में सांस ले रहे हैं। हमारा विभाग प्रदर्शनी लगाता है। उनसे जुड़े दस्तावेज दिखाए जाते हैं।’

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