2000 साल पहले मिस्र घूमने जाते थे भारतीय, मकबरों पर मिले 2000 साल पुराने निशान; जानें क्या लिखा है

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रोमन काल में मिस्र घूमने जाते थे भारतीय, मकबरों पर मिली 2000 साल पुरानी निशानी

Last Updated:February 12, 2026, 19:25 IST

Tamil-Brahmi Inscriptions On Egyptian Tombs: मिस्र की 'वैली ऑफ किंग्स' में शोधकर्ताओं को 2,000 साल पुराने तमिल-ब्राह्मी शिलालेख मिले हैं. इसमें 'सिगाई कोर्रन' नामक एक तमिल व्यापारी के नाम का उल्लेख है. यह खोज साबित करती है कि प्राचीन भारत और मिस्र के बीच न केवल गहरा व्यापार था, बल्कि भारतीय व्यापारी मिस्र के अंदरूनी हिस्सों तक पर्यटन के लिए भी जाते थे. वहां तमिल के अलावा संस्कृत और प्राकृत शिलालेख भी मिले हैं.

रोमन काल में मिस्र घूमने जाते थे भारतीय, मकबरों पर मिली 2000 साल पुरानी निशानीZoom

AI से बनाई सांकेतिक तस्वीर

नई दिल्ली: इतिहास की किताबों में अब तक हमने भारत और मिस्र (Egypt) के बीच व्यापारिक संबंधों के बारे में पढ़ा था, लेकिन हाल ही में हुई एक खोज ने इसे और भी रोमांचक बना दिया है. स्विट्जरलैंड और फ्रांस के शोधकर्ताओं ने मिस्र की मशहूर ‘वैली ऑफ किंग्स’ (Valley of Kings) में स्थित मकबरों पर 2,000 साल पुराने तमिल-ब्राह्मी शिलालेख (Tamil-Brahmi inscriptions) खोज निकाले हैं. यह खोज साबित करती है कि प्राचीन काल में भारतीय व्यापारी न केवल मिस्र के बंदरगाहों तक जाते थे, बल्कि वे वहां के पर्यटन स्थलों और संस्कृति में भी गहरी रुचि रखते थे.

कौन था ‘सिगाई कोर्रन’? जिसने पत्थरों पर उकेरा अपना नाम

स्विस विद्वान इंगो स्ट्रॉच और फ्रांसीसी शोधकर्ता शार्लोट श्मिट ने इन शिलालेखों को खोजा और डिकोड किया है. उन्होंने पाया कि करीब 2,000 साल पहले एक तमिल व्यापारी ने मिस्र के राजाओं (फराओ) के मकबरों की यात्रा की थी. उसने छह में से पांच मकबरों में आठ अलग-अलग जगहों पर अपना नाम ‘सिगाई कोर्रन’ (Cikai Korran) खुरचकर लिखा था. तमिल में ‘सिगाई’ का अर्थ मुकुट या चोटी होता है और ‘कोर्रन’ का अर्थ नेता या राजा होता है.

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी रिपोर्ट के अनुसार, एक जगह पर ‘सिगाई कोर्रन- वरा कांत’ लिखा मिला है, जिसका अर्थ है ‘वह आया और उसने देखा’. शोधकर्ताओं का मानना है कि यह व्यापारी संभवतः ग्रीक भाषा भी समझता था, क्योंकि उसने ग्रीक शिलालेखों की शैली की नकल करते हुए अपना नाम वहां उकेरा था.

सिर्फ व्यापार नहीं, टूरिज्म में भी थी रुचि

यूनिवर्सिटी ऑफ लॉजेन के प्रोफेसर इंगो स्ट्रॉच ने बताया कि अब तक हमें केवल मिस्र के तटीय बंदरगाहों पर तमिल व्यापारियों के होने के सबूत मिले थे. लेकिन वैली ऑफ किंग्स जैसे अंदरूनी इलाकों में इन शिलालेखों का मिलना यह दर्शाता है कि तमिल व्यापारी वहां लंबे समय तक रुकते थे. वे केवल सामान बेचने और खरीदने नहीं आते थे, बल्कि वहां की वास्तुकला और इतिहास को देखने के लिए मीलों पैदल यात्रा भी करते थे.

उत्तर भारत के भी मिले निशान: संस्कृत और प्राकृत का संगम

शोधकर्ताओं ने वैली ऑफ किंग्स में कुल 30 शिलालेख खोजे हैं, जिनमें से 20 तमिल में हैं. बाकी शिलालेख संस्कृत, प्राकृत और गांधारी-खरोष्ठी भाषाओं में हैं. इससे यह स्पष्ट होता है कि उस समय केवल दक्षिण भारत ही नहीं, बल्कि गुजरात, महाराष्ट्र और उत्तर-पश्चिम भारत के व्यापारी भी रोमन काल के दौरान मिस्र की यात्रा करते थे. एक संस्कृत शिलालेख में पश्चिमी भारत के ‘क्षहरात’ (Kshaharata) राजवंश के दूत का भी उल्लेख है, जो पहली शताब्दी ईस्वी के दौरान वहां पहुंचा था.

दोतरफा व्यापार का सबसे बड़ा सबूत

वरिष्ठ पुरालेखवेत्ता वाई. सुब्बारायलू और पुरातत्वविद् वी. सेल्वाकुमार के अनुसार, यह खोज ‘टू-वे ट्रेड’ (Two-way trade) का पुख्ता प्रमाण है. अब तक यह माना जाता था कि केवल रोमन व्यापारी भारत आते थे, लेकिन अब यह साफ है कि भारतीय व्यापारी भी उतनी ही सक्रियता से रोम और मिस्र के साम्राज्य तक पहुंच रहे थे.

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Deepak Verma

दीपक वर्मा (Deepak Verma) एक पत्रकार हैं जो मुख्‍य रूप से विज्ञान, राजनीति, भारत के आंतरिक घटनाक्रमों और समसामयिक विषयों से जुडी विस्तृत रिपोर्ट्स लिखते हैं. वह News18 हिंदी के डिजिटल न्यूजरूम में डिप्टी न्यूज़...और पढ़ें

Location :

New Delhi,Delhi

First Published :

February 12, 2026, 19:23 IST

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