प्रामाणिक स्रोत कहते हैं कि इंदौर में पाइपलाइन और नलों के माध्यम से पानी सबसे पहले 1906 में घरों तक पहुंचा था. यानि इसको 120 साल हो गए. अब इंदौर दूषित पेयजल को लेकर खबरों में है. इससे 9 लोगों की मृत्यु हो चुकी है. इसके पीछे मुख्य रूप से होल्कर राजघराना ही था. उस समय ब्रिटिश शासन जरूर था लेकिन इंदौर एक प्रिंसले स्टेट था. शहर के बुनियादी ढांचे का विकास होल्कर राजाओं के विजन और फंड से हुआ. तकनीकी रूप से उस समय की पाइपलाइनें अब भी बिछी हुई हैं. यही कारण है कि आज भी मध्य इंदौर की गलियों में बहुत पुरानी पाइपलाइनें मिलती हैं.
इसी वजह से इंदौर में विशेष रूप से ‘ओल्ड सिटी’ यानि मध्य इंदौर में कई इलाके ऐसे हैं जहां पाइपलाइनें 80 से 100 साल पुरानी हो चुकी हैं. इंदौर के मौजूदा दूषित पेयजल को इसी से जोड़ा जाना चाहिए, जिसमें पाइप लाइन की स्थिति बहुत पुरानी और खराब हो चुकी है.
महाराजा तुकोजीराव होल्कर की देन
अब जानते हैं कि इंदौर में जल की आपूर्ति कैसे शुरू हुई. ये कितनी पुरानी है. 1906 में जब इंदौर में पहली बार व्यवस्थित जल आपूर्ति और बिजली की व्यवस्था शुरू हुई, तब इंदौर पर महाराजा तुकोजीराव होल्कर तृतीय का शासन था. होल्कर प्रशासन ने ही 1905-1906 के आसपास बिलावली तालाब से शहर को पानी देने की योजना बनाई. बिलावली जलाशय का निर्माण कार्य 1906 में शुरू हुआ था. यह 1914-1916 तक पूरी तरह तैयार हो गया. योजना होल्कर स्टेट के बजट से पूरी की गई.
कई पेयजल लाइनें 80 साल पुरानी भी
दरअसल इंदौर नगरपालिका का गठन 1870 में ही हो गया था. ये भारत की सबसे पुरानी नगरपालिकाओं में एक है. 1906 में इस नगरपालिका ने अपना खुद पावर हाउस शुरू किया. बिलावली जलाशय से पाइपलाइन के जरिए पानी की सप्लाई का नेटवर्क बिछाना शुरू किया. अगर स्थानीय अखबारों में छपी रिपोर्ट्स की मानें तो इंदौर में कई पेयजल पाइप लाइन 80 साल पुरानी हैं.
विश्व प्रसिद्ध टाउन प्लानर गेडिस ने की थी प्लानिंग
तब प्रशासनिक सलाह के लिए ब्रिटिश ‘रेजिडेंट’ मौजूद होते थे, लेकिन योजना को लागू करने और धन उपलब्ध कराने का काम होल्कर राजवंश का ही था. होल्कर राजाओं ने ही विश्व प्रसिद्ध टाउन प्लानर पैट्रिक गेडिस को इंदौर बुलाया. गेडिस ने 1918 में इंदौर का पहला मास्टर प्लान बनाया, जिसमें पाइपलाइन नेटवर्क, जल निकासी और खुले स्थानों का विशेष ध्यान रखा गया.
ब्रिटिश राज का ध्यान केवल ‘रेजीडेंसी एरिया’ पर था, वह वहां तक हर हाल में पानी पहुंचाना चाहते थे, क्योंकि यहां अंग्रेज रहते थे. लेकिन होल्कर राजवंश ने पूरे इंदौर शहर में पाइपलाइन बिछाने और सफाई व्यवस्था पर निवेश किया.
समय के साथ चुनौतियां भी आईं
हालांकि 1906 में बिलावली तालाब से पेयजल आपूर्ति शुरू होने के बाद जैसे-जैसे शहर की आबादी बढ़ी, ये तालाब आपूर्ति के लिहाज से कम पड़ने लगा. तब होल्कर राजवंश के शासकों ने बड़े स्तर पर योजना बनाई. यशवंत राव होल्कर द्वितीय ने 1930 के दशक में गंभीर नदी पर यशवंत सागर बांध का निर्माण शुरू करवाया.
1939 से इस बांध के जरिए पाइपलाइन नेटवर्क को और अधिक मजबूत किया गया. शहर के अधिकांश रिहायशी इलाकों में नलों से पानी की आपूर्ति विधिवत शुरू हुई.
लचर हालत में पुरानी पाइपलाइंस
स्मार्ट सिटी इंदौर के दस्तावेजों के अनुसार, पानी की आपूर्ति के साथ-साथ, गंदे पानी की निकासी के लिए 1936 में होल्कर शासन के दौरान ही पहली बार कंक्रीट पाइप वाली सीवेज प्रणाली डाली गई, जो अब बहुत लचर हालत में है.
आधुनिक इंदौर के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि नर्मदा जल योजना थी. इसका पहला चरण 1977 में पूरा हुआ, जिसके बाद इंदौर के घर-घर तक बड़े स्तर पर पाइपलाइन का जाल बिछ गया. नर्मदा का पानी करीब 70 किलोमीटर दूर और 500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इंदौर तक पाइपों के जरिए पहुंचाना एक बड़ी इंजीनियरिंग उपलब्धि मानी गई थी.
100 साल पुरानी पाइपलाइन वाले मुख्य इलाके
इंदौर के ये वो हिस्से हैं जहां होल्कर शासन (1906-1939) के दौरान पहली बार पाइपलाइनें बिछाई गई थीं.
राजवाड़ा और आस-पास का क्षेत्र – यहां के कई पुराने मोहल्लों में अभी भी पुरानी कास्ट आयरन (लोहे) की पाइपलाइनें जमीन के नीचे दबी हुई हैं.
नगर निगम जोन3 और रावजी बाजार – शहर के सबसे पुराने वार्डों में एक होने के कारण यहां का बुनियादी ढांचा बहुत पुराना है.
किला मैदान और मल्हारगंज – यहां भी पाइपलाइनों का नेटवर्क दशकों पुराना है, जिनमें अब अक्सर लीकेज की समस्या बनी रहती है.
भागीरथपुरा और पुरानी बस्तियां – हाल ही में दूषित पेयजल भागीरथपुरा में ही दुखद हादसा हुआ है. 9 लोगों की मौत हो चुकी है. यहां पाइपलाइनें 30 से 50 साल पुरानी और जर्जर हो चुकी थीं.
इंदौर भले ही “स्वच्छता” में नंबर 1 है, लेकिन जमीन के नीचे दबे पाइपों का पुराना जाल आज भी शहर के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है. पुराने शहर में रहने वाले लोग अक्सर शिकायत करते हैं कि ऊपर से सड़क नई बन जाती है, लेकिन नीचे की पुरानी पाइपलाइनें नहीं बदली जातीं.
पुरानी पाइपलाइनों से होने वाली समस्याएं
सीवेज मिक्सिंग – पुरानी पानी की लाइनें और पुरानी ड्रेनेज लाइनें अक्सर एक-दूसरे के बहुत करीब हैं. पाइप के गलने या टूटने पर सीवेज का पानी पीने के पानी में मिल जाता है.
जंग और मिट्टी – लोहे की पुरानी पाइपलाइनों के अंदर जंग लग चुका है, जिससे नलों में लाल या मटमैला पानी आता है.
प्रेशर की कमी – पाइप के अंदर कचरा जमा होने से पानी का दबाव (Pressure) भी बहुत कम हो जाता है।
क्या भागीरथपुर में पानी लंबे समय से खराब था
अगर स्थानीय अखबारों की रिपोर्ट पर गौर करें तो बीते साल में अक्टूबर-नवंबर में निवासियों ने मेयर हेल्पलाइन और स्थानीय निगम कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई थी कि पानी से ‘गंदी बदबू’ आ रही है. पानी का रंग ‘हल्का पीला’ या मटमैला है.
शिकायतों में यहां तक कहा गया था कि नल से आने वाले पानी में “एसिड जैसी जलन” और भयानक दुर्गंध है. दिसंबर के मध्य तक यह समस्या 90% घरों तक पहुंच गई, जिसकी जानकारी पार्षद और निगम के अधिकारियों को दी गई. सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि प्रशासन को पाइपलाइन के जर्जर होने का पता पहले से था.

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