कैसे तलवार और लाठी में एक्सपर्ट होते हैं नागा साधू, माघ मेले में क्यों उनका आना जरूरी

15 hours ago

Last Updated:January 09, 2026, 12:10 IST

प्रयागराज में माघ मेले से पहले जूना अखाड़े के नागा साधुओं और अन्य संत महात्माओं ने शोभा यात्रा निकाली. उसमें नागा साधुओं ने तलवार और लाठी भांजकर करतब दिखाए. आखिर नागा साधु तलवार और लाठी कौशल में कैसे एक्सपर्ट होते हैं और इसे क्यों चलाते हैं. इसके साथ ही जानेंगे नागा साधुओं के रहस्यमय जीवन के बारे में. वो अचानक माघ मेले और कुंभ के दौरान कहां से आते हैं और कहां गायब हो जाते हैं.

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नागा साधुओं का तलवार-लाठी कौशल कोई अचानक सीखा गया करतब नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सैन्य-आध्यात्मिक परंपरा का नतीजा है. जूना अखाड़ा भारत का सबसे प्राचीन और सबसे युद्धक अखाड़ा माना जाता है. इसकी स्थापना परंपरागत रूप से आदि शंकराचार्य के साथ 8वीं सदी से जोड़ी जाती है. उस दौर में बौद्धों, शैव-वैष्णव संन्यासियों और इस्लामी आक्रमणों के कारण धर्मस्थलों की रक्षा एक बड़ी जरूरत बन गई.

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वैसे नागा साधु मूलरूप से संन्यासी-योद्धा ही माने जाते हैं. ये साधु “अहिंसा” के दर्शन में रहते हुए भी, धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाना धर्म मानते थे. तो ये कैसे तलवार और लाठी के एक्सपर्ट बन जाते हैं. ये भी जानते हैं. जूना अखाड़े में दीक्षा लेने वाला व्यक्ति पहले ब्रह्मचारी बनता है. कई नागा साधु बचपन से अखाड़ों में पलते-बढ़ते हैं. दीक्षा के बाद उन्हें गुरु महंत या कोठारी को सौंपा जाता है.

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नागा साधुओं की ट्रेनिंग आज के जिम जैसी नहीं, बल्कि पारंपरिक सैन्य व्यायाम पर आधारित होती है. पहले वो भारी लाठी चलाना सीखते हैं, फिर बल्लम, इसके बाद मल्लखंभ, दंड-बैठक. मिट्टी के अखाड़े में कुश्ती करते हैं. शरीर को चोट सहने का अभ्यास करते हैं. इससे उनके हाथ-कंधे-कमर बहुत मजबूत हो जाते हैं. फिर उन्हें तलवार और ढाल की कला सिखाई जाती है. वो त्रिशूल, फरसा, भाला भी जानते हैं. कभी कभी धनुष-बाण की परंपरागत शिक्षा उन्हें देते हैं.

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हालांकि उन्हें सबसे पहले पहले लाठी सिखाई जाती है क्योंकि वह तलवार की जननी मानी जाती है. नागा साधु केवल लड़ना नहीं सीखते, वे डर खत्म करना सीखते हैं. नागा साधु कभी दर्शकों पर वार नहीं करते. शस्त्रों का नियंत्रण इतना सधा होता है कि तलवार हवा में रुकती-घूमती दिखती है. ये दिखाता है कि “शक्ति हमारे पास है, पर हम उसे नियंत्रित करते हैं.” हालांकि अब उनका शक्ति कौशल प्रदर्शऩ प्रतीकात्मक और सांस्कृतिक ही होता है.

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नागा साधु केवल कुंभ मेले तक सीमित नहीं होते, बल्कि माघ मेला भी उनके लिए धार्मिक, परंपरागत और व्यावहारिक तीनों कारणों से बहुत अहम होता है. माघ मेला हर साल प्रयागराज में माघ महीने जनवरी–फरवरी में लगता है. ये कुंभ की ही वार्षिक निरंतरता है. नागा साधुओं के माघ मेले में आने का मुख्य कारण अखाड़ों का स्थायी धार्मिक कैलेंडर है. माघ मेला अनिवार्य धार्मिक पड़ाव है.

कुंभ में होने वाली नागा दीक्षा से पहले माघ मेले में नए नागा साधु बनने वाले उम्मीदवारों की परीक्षा, अनुशासन, सेवा और ब्रह्मचर्य की जांच होती है. माघ मेला एक तरह से “रिहर्सल ग्राउंड” होता है.

नागा साधु ईश्वर द्वारा दिए गए प्राकृतिक स्वरूप यानि नग्न ही रहते हैं. वो जब माघ मेला या कुंभ के दौरान प्रयागराज पहुंचते हैं तो कोई वस्त्र धारण नहीं करते. अलबत्ता जब यहां से वापस लौटने लगते हैं तो जरूर लंगोट धारण कर लेते हैं.

माघ मेला नागाओं के स्वभाव से ज्यादा मेल खाता है. वो कम साधनों में जीने वाले होते हैं. दिखावे से दूर रहते हैं. माघ मेला कम भव्य, अधिक कठोर, अधिक आध्यात्मिक होता है इसलिए कहा जाता है कि “कुंभ में नागा दिखते हैं और माघ में साधना करते हैं.”

अखाड़ों में नागा साधुओं के लिए कुछ सख्त नियम होते हैं. इनमें से एक नियम यह भी होता है कि जब वे किसी धार्मिक आयोजन, यात्रा, या किसी सामाजिक स्थान पर जाते हैं, तो उन्हें लंगोट या साधु वस्त्र पहनने होते हैं.

लंगोट केवल एक वस्त्र नहीं बल्कि आत्मसंयम का प्रतीक भी है. यह नागा बाबाओं को याद दिलाता है कि वे सांसारिक सुखों और भौतिक इच्छाओं से परे हैं और उनके जीवन का उद्देश्य साधना और तपस्या है. (image generated by meta ai)

आज के आधुनिक समाज में सार्वजनिक रूप से नग्नता स्वीकार्य नहीं होती. इसलिए, नागा बाबाओं को भी कानूनी और प्रशासनिक नियमों का पालन करना होता है, जिससे वे समाज में बिना किसी बाधा के रह सकें. (image generated by meta ai)

नागा बाबा किसी विशेष अखाड़े से जुड़े होते हैं, जैसे कि जूना अखाड़ा, अटल अखाड़ा, महानिर्वाणी अखाड़ा आदि. कुंभ समाप्त होने के बाद वे अपने अखाड़ों में लौट जाते हैं, जहां वे अपने शिष्यों को दीक्षा देते हैं, धार्मिक अनुष्ठान करते हैं और साधना जारी रखते हैं. कुछ हिमालय और अन्य एकांत तपस्थलों की ओर चले जाते हैं. कई नागा बाबा कुंभ समाप्त होने के बाद हिमालय, गंगोत्री, यमुनोत्री, अमरकंटक, गिरनार और नेपाल जैसे स्थानों की ओर चले जाते हैं. वहां वो कठोर तपस्या और साधना करते हैं, जिससे उनकी आध्यात्मिक उन्नति हो सके. (image gene rated by meta ai)

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First Published :

January 09, 2026, 12:09 IST

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कैसे तलवार और लाठी में एक्सपर्ट होते हैं नागा, माघ मेले में क्यों आना जरूरी

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