Last Updated:February 17, 2026, 17:33 IST
Kapil Sibal CJI Suryakant Conversation: सुप्रीम कोर्ट ने नफरती भाषणों के खिलाफ दायर याचिका को सिलेक्टिव बताते हुए सुनने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि केवल कुछ मुख्यमंत्रियों को निशाना बनाना स्वीकार्य नहीं है; याचिका निष्पक्ष होनी चाहिए. जस्टिस नागरत्ना ने जोर दिया कि नफरत रोकने के लिए संवैधानिक लोकाचार के खिलाफ जाने वाली सोच को मिटाना होगा. कोर्ट ने राजनीतिक दलों को संवैधानिक नैतिकता बनाए रखने और याचिकाकर्ताओं को संशोधित याचिका लाने का निर्देश दिया है.

नई दिल्ली: सियासत की जुबान जब ज़हरीली हो जाए तो लोकतंत्र की नींव डगमगाने लगती है. आज देश की सबसे बड़ी अदालत में कुछ ऐसा ही मंजर था, जहां नफरती भाषणों (Hate Speech) के खिलाफ एक बड़ी कानूनी जंग छिड़ी. लेकिन इस बार कोर्ट का रुख किसी एक पक्ष की ओर नहीं बल्कि संवैधानिक नैतिकता की संपूर्णता की ओर था. याचिका में जब कुछ खास मुख्यमंत्रियों का नाम लेकर निशाना साधा गया तो अदालत ने इसे सिलेक्टिव करार देते हुए सुनने से इनकार कर दिया. जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने साफ कर दिया कि संविधान की रक्षा केवल चंद चेहरों को कटघरे में खड़ा करके नहीं बल्कि हर राजनीतिक दल की मानसिकता बदलकर ही मुमकिन है. यह मामला अब केवल भाषणों का नहीं रह गया है बल्कि उस टॉक्सिक माहौल का है जो सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक लोकतंत्र की गरिमा को चुनौती दे रहा है
याचिका में बदलाव का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने आज उस याचिका पर विचार करने से मना कर दिया जिसमें असम, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मुख्यमंत्रियों द्वारा दिए गए बयानों को आधार बनाकर हेट स्पीच के खिलाफ सख्त गाइडलाइंस की मांग की गई थी. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ताओं के वकील कपिल सिब्बल से कहा कि कोर्ट ऐसी याचिकाओं का स्वागत करता है जो निष्पक्ष और व्यापक हों. अदालत ने कहा कि केवल चुनिंदा लोगों और एक ही विचारधारा के नेताओं को निशाना बनाना न्यायसंगत नहीं है. कोर्ट चाहता है कि याचिका को संशोधित किया जाए ताकि यह किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ न होकर सभी राजनीतिक दलों के लिए एक संवैधानिक सबक बने.
कोर्ट ने भी माना- माहौल टॉक्सिक होता जा रहा है
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने भी इस मुद्दे पर गंभीर टिप्पणी की. बेंच ने कहा कि भाषणों की उत्पत्ति सोच से होती है और जब तक संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ जाने वाली सोच को नहीं मिटाया जाएगा, तब तक केवल गाइडलाइंस से कुछ नहीं होगा. कोर्ट ने कपिल सिब्बल की उस दलील पर सहमति जताई कि माहौल टॉक्सिक (जहरीला) होता जा रहा है और सोशल मीडिया की जिम्मेदारी तय करना जरूरी है. हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसे एक लोकलुभावन अभ्यास के बजाय एक गंभीर संवैधानिक अभ्यास बनाना होगा. अब सिब्बल इस याचिका को संशोधित कर दोबारा पेश करेंगे.
सवाल-जवाब
1. सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच वाली याचिका को सुनने से क्यों इनकार कर दिया?
अदालत का मानना था कि याचिका ‘सिलेक्टिव’ थी, क्योंकि इसमें केवल तीन विशेष मुख्यमंत्रियों (असम, यूपी और उत्तराखंड) को निशाना बनाया गया था. कोर्ट ने कहा कि वह निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता वाली याचिका पर ही विचार करेगा.
2. जस्टिस बीवी नागरत्ना ने भाषणों के नियंत्रण को लेकर क्या महत्वपूर्ण टिप्पणी की?
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि भाषण की उत्पत्ति इंसान की सोच से होती है. उन्होंने सवाल उठाया कि केवल दिशा-निर्देशों से क्या होगा जब तक हम उन विचारों को नहीं मिटाते जो संवैधानिक लोकाचार के खिलाफ जाते हैं.
3. याचिकाकर्ताओं ने किन बयानों को आधार बनाकर कोर्ट में शिकायत की थी?
याचिका में असम के मुख्यमंत्री के ‘मिया मुस्लिम’ वाले बयान, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के ‘लैंड जिहाद’ और ‘लव जिहाद’ जैसे शब्दों के उपयोग और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की उर्दू समर्थकों पर टिप्पणियों का जिक्र किया गया था.
4. कपिल सिब्बल ने अदालत के सामने क्या प्रमुख चिंताएं जाहिर कीं?
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि देश का माहौल ‘जहरीला’ होता जा रहा है. उन्होंने सवाल उठाया कि जब चुनाव आचार संहिता लागू नहीं होती, तब सोशल मीडिया पर फैलने वाली नफरत के लिए मीडिया की क्या जिम्मेदारी होनी चाहिए.
5. अब इस मामले में अगला कदम क्या होगा?
कपिल सिब्बल ने याचिका में बदलाव करने के लिए समय मांगा है. अब वह किसी व्यक्ति का नाम लिए बिना एक संशोधित याचिका पेश करेंगे, जिसमें सभी राजनीतिक दलों के लिए जवाबदेही और संवैधानिक नैतिकता की मांग की जाएगी.
First Published :
February 17, 2026, 17:33 IST

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