दिल्ली में चीन पर लगाम, टोक्यो में ट्रंप पर नकेल, मोदी-मेलोनी की केमिस्ट्री कर रही ये काम

1 hour ago

नई दिल्ली: भारत की विदेश नीति इन दिनों एक साथ तीन मोर्चों पर बेहद सक्रिय है. एक तरफ दिल्ली में इंडो-पैसिफिक की ‘रेड लाइन’ साफ होती दिख रही है, जहां चीन की बढ़ती आक्रामकता को संतुलित करने के लिए भारत अपने पार्टनर्स के साथ मजबूत कोऑर्डिनेशन बना रहा है. दूसरी तरफ टोक्यो में ट्रंप फैक्टर को मैनेज करने की कवायद है, ताकि अमेरिका की संभावित हार्ड पॉलिसी शिफ्ट के बावजूद रीजन में स्टेबिलिटी बनी रहे. और तीसरी दिशा यूरोप है, जहां मोदी-मेलोनी की केमिस्ट्री भारत के लिए ट्रेड और स्ट्रैटेजिक डील्स को आगे धकेल रही है. इसी बैकग्राउंड में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 18वें इंडिया-जापान स्ट्रैटेजिक डायलॉग में बड़ा संदेश दे दिया. जयशंकर ने कहा कि भारत क्वाड, संयुक्त राष्ट्र और जी-20 जैसे इंटरनेशनल फोरम्स पर जापान के साथ काम करने को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है. यह आने वाले सालों की पावर पॉलिटिक्स का क्लियर इंडिकेटर है कि भारत किस साइड खड़ा है और किसके साथ चलना चाहता है.

आखिर भारत-जापान की पार्टनरशिप अब सिर्फ दोस्ती नहीं, स्ट्रैटेजिक ढाल क्यों बन गई?

एस जयशंकर के मुताबिक पिछले दो दशकों में भारत-जापान रिश्ता आर्थिक दायरे से निकलकर ‘व्यापक, अर्थपूर्ण और रणनीतिक’ बन चुका है. यह वही शिफ्ट है जहां ट्रेड के साथ सिक्योरिटी, टेक्नोलॉजी और ग्लोबल गवर्नेंस भी कनेक्ट हो जाते हैं. जयशंकर ने यह भी याद दिलाया कि इंडो-पैसिफिक को बतौर राजनीतिक और रणनीतिक फ्रेम दुनिया के सामने रखने में जापान के प्रधानमंत्री की ऐतिहासिक भूमिका रही है. और यही वजह है कि भारत का इंडो-पैसिफिक विजन, जापान के ‘फ्री और ओपन इंडो-पैसिफिक’ अप्रोच से काफी हद तक मेल खाता है. मतलब यह कि चीन के इन्फ्लुएंस को कंट्रोल करने के लिए दिल्ली और टोक्यो का अलाइनमेंट अब ऑप्शन नहीं, जरूरत बन गया है.

क्वाड, यूएन और जी-20 में भारत को जापान की सबसे ज्यादा जरूरत क्यों पड़ रही है?

जयशंकर ने क्वाड, संयुक्त राष्ट्र, जी4 सदस्यता और जी-20 का खास तौर पर नाम लिया. इसके पीछे लॉजिक बिल्कुल प्रैक्टिकल है. क्वाड रीजनल सिक्योरिटी और सप्लाई चेन से जुड़ा है. यूएन और जी4 में भारत के लंबे टर्म रिफॉर्म एजेंडे को सपोर्ट चाहिए. और जी-20 में भारत-जापान जैसे बड़े डेमोक्रेसी ब्लॉक का मैसेज दुनिया के लिए बहुत अहम बन जाता है.

डायलॉग में क्रिटिकल मिनरल्स और एआई जैसे सेक्टर्स पर नई पहल भी सामने आई. खासकर क्रिटिकल मिनरल्स वही ‘सप्लाई चेन हथियार’ हैं जिनके दम पर भविष्य की टेक्नोलॉजी और डिफेंस इंडस्ट्री चलेगी. भारत और जापान का इसमें साथ आना, सीधे तौर पर चीन की माइनिंग और मैन्युफैक्चरिंग मोनोपॉली को चैलेंज करता है.

Pleased to co-chair the 18th India – Japan Strategic Dialogue alongside FM Toshimitsu Motegi in New Delhi today. @moteging

Our Special Strategic and Global Partnership is on an upward trajectory and holds immense potential for shaping the world order and de-risking the… pic.twitter.com/x7NdVhrm8f

वेस्ट एशिया से फिलीपींस तक, जयशंकर ने किस नए स्ट्रैटेजिक ‘मैप’ की तरफ इशारा किया?

जयशंकर ने बातचीत में यह भी जोड़ा कि जापानी नेता फिलीपींस से होते हुए भारत आए हैं और इससे इंडो-पैसिफिक कन्वर्जेंस दिखता है. साथ ही कतर, इजरायल और फिलिस्तीन जैसे वेस्ट एशिया लिंक भी गिनाए. यह एक तरह से भारत की नई स्ट्रैटेजी का संकेत है- इंडो-पैसिफिक और वेस्ट एशिया को अलग-अलग थिएटर मानने की बजाय, एक कनेक्टेड स्ट्रैटेजिक जोन की तरह ट्रीट करना.

आज की ग्लोबल अनिश्चितता में एनर्जी रूट्स, ट्रेड कॉरिडोर्स और मैरीटाइम सिक्योरिटी एक साथ बंधे हुए हैं. यही कारण है कि भारत-जापान बातचीत अब ग्लोबल इकोनॉमी को ‘डी-रिस्क’ करने का टूल बन चुकी है.

यूरोप का गेम कैसे बदल रहा है और इटली यहां भारत के लिए ‘गेटवे’ क्यों बन सकता है?

इधर यूरोप के मोर्चे पर इटली के राजदूत एंटोनियो एनरिको बार्टोली ने दावा किया कि यूरोप एक ग्रुप के तौर पर भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और भारत-ईयू ट्रेड डील ‘विन-विन’ हो सकती है. यह वही लाइन है जो बताती है कि यूरोप अब भारत को सिर्फ मार्केट नहीं, स्ट्रैटेजिक पार्टनर मान रहा है.

उसी इंटरव्यू में भारत-ईयू ट्रेड एग्रीमेंट को जल्द फाइनल करने पर जोर दिया गया. भारत के लिए यह डील सिर्फ एक्सपोर्ट नहीं बढ़ाएगी, बल्कि चीन पर ट्रेड डिपेंडेंसी घटाने में भी मदद करेगी. और यही वजह है कि इसे ‘डायवर्सिफिकेशन के जमाने’ की जरूरत बताया जा रहा है.

विनिटैली 2026 की एंट्री यहां क्यों मायने रखती है, क्या यह सिर्फ वाइन इवेंट है?

इटली के वेरोना में विनिटैली 2026 का आयोजन 12 से 15 अप्रैल 2026 तक होना तय है. यह दुनिया के बड़े वाइन इवेंट्स में से एक है और इटली दुनिया का बड़ा वाइन प्रोड्यूसर माना जाता है. यह खबर केवल कल्चर या लाइफस्टाइल तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत-यूरोप बिजनेस नेटवर्किंग और सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी का एक मंच भी बन सकती है.

टोक्यो में इटली और जापान के प्रधानमंत्रियों की मुलाकात.

टोक्यो में मेलोनी-ताकाइची की ‘केमिस्ट्री’ से भारत को क्या अप्रत्यक्ष फायदा?

टोक्यो में इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची की दोस्ताना कैमिस्ट्री ने काफी सुर्खियां बटोरीं. केक, गिफ्ट्स, सेल्फी और ‘हम साथ करेंगे’ जैसे बयान सोशल मीडिया तक ट्रेंड बने. लेकिन असली कहानी इसके पीछे है- जापान और इटली ने इकनॉमिक सिक्योरिटी कोऑपरेशन और क्रिटिकल मिनरल्स सप्लाई चेन मजबूत करने पर सहमति जताई और अपनी स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप को अपग्रेड किया.

यह वही स्पेस है जहां भारत भी अपना पैर मजबूत करना चाहता है. यानी टोक्यो-रोम अलाइनमेंट का फायदा दिल्ली को भी मिलता है, क्योंकि भारत-जापान क्वाड फ्रेम में हैं और भारत-यूरोप ट्रेड डील आगे बढ़ रही है. दूसरे शब्दों में, मोदी-मेलोनी की केमिस्ट्री यूरोप में डील क्लाइमेट बनाती है और जापान के साथ स्ट्रैटेजिक तालमेल इंडो-पैसिफिक में चीन को बैलेंस करता है.

मेलोनी का टोक्यो दौरा जी-7 देशों के बीच बढ़ती एकता का भी प्रतीक है. यह गठबंधन न केवल सुरक्षा बल्कि नई तकनीक और इनोवेशन पर भी फोकस कर रहा है. पीएम मोदी के साथ मेलोनी के बेहतरीन रिश्ते पहले से ही जगजाहिर हैं. अब मेलोनी और ताकाइची की यह नई बॉन्डिंग भारत के लिए भी फायदेमंद साबित होगी. यह तिकड़ी अंतरराष्ट्रीय नियमों पर आधारित वर्ल्ड ऑर्डर को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध नजर आ रही है.

भारत किस ‘ट्रिपल स्ट्रैटेजी’ पर चल रहा है?

दिल्ली में चीन को बैलेंस करने के लिए इंडो-पैसिफिक स्ट्रैटेजी तेज हो रही है. टोक्यो में अमेरिका पॉलिटिक्स के उतार-चढ़ाव के बीच स्टेबिलिटी और सप्लाई चेन का बीमा हो रहा है. यूरोप में ट्रेड डील और टेक-इंडस्ट्री को लेकर नए दरवाजे खुल रहे हैं, जहां इटली एक बड़े फेस की तरह सामने दिख रहा है.

यानी भारत अब वर्ल्ड ऑर्डर को शेप करने की जिम्मेदारी का दावा कर रहा है. और यही लाइन जयशंकर ने भी कही- हमारे पास मौका ही नहीं, कर्तव्य भी है.

Read Full Article at Source