बांग्लादेश में पहले चुनाव ईवीएम से हुए लेकिन फिर इसे बंद कर दिया गया. वर्ष 2023 से वहां चुनाव फिर बैलेट बॉक्स से होने लगा. इस बार भी बांग्लादेश में चुनाव बैलेट से ही हो रहे हैं. ये सवाल तो उठता ही है कि जब इलैक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को भारत में लगातार बेहतर माना जा रहा हो तो उसके ही पड़ोसी देश ने ऐसा कदम क्यों उठाया कि ईवीएम को इंट्रोड्यूस करके चुनाव कराने के बाद कदम वापस पीछे की ओर खींच लिये.
दरअसल 2023 में बांग्लादेश चुनाव आयोग (बीईसी) ने एक महत्वपूर्ण फैसला किया, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) का उपयोग बंद कर दिया गया. पारंपरिक बैलेट पेपर सिस्टम पर वापस लौटने का फैसला किया गया. यह निर्णय 12वीं संसदीय चुनावों के लिए था, जो जनवरी 2024 में होने वाले थे, जिसमें जीतकर शेख हसीना फिर देश की प्रधानमंत्री बनीं. हालांकि इस चुनाव का विपक्षी दलों ने बहिष्कार किया. इस पर गड़बड़ी के व्यापक आरोप भी लगे.
बांग्लादेश में ईवीएम की शुरुआत 2007 में हुई थी, जब इसे पहली बार कुछ स्थानीय चुनावों में आजमाया गया. इसका मुख्य उद्देश्य पेपर बैलेट सिस्टम की समस्याओं को दूर करना था, जैसे वोटों की गिनती में देरी, फर्जी वोटिंग और पर्यावरणीय प्रभाव यानि कागज की बर्बादी. 2010 से ईवीएम को कई शहरों में निगम चुनावों में इस्तेमाल किया गया. 2018 के आम चुनावों में पहली बार ईवीएम को छह निर्वाचन क्षेत्रों में इस्तेमाल किया गया, जहां यह सफल माना गया.
बांग्लादेश में 2023 में ईवीएम से ही चुनाव की तैयारी थी
बीईसी ने ईवीएम को अधिक सुरक्षित और कुशल बताते हुए 2023 में 150 निर्वाचन क्षेत्रों तक इसका विस्तार करने की योजना बनाई थी. इसके लिए 8,000 करोड़ टका का प्रोजेक्ट शुरू किया गया लेकिन ये योजना पूरी नहीं हो सकी. ईवीएम सिस्टम में वोटर वेरिफाइएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) शामिल था, जो वोटर को अपने वोट की पुष्टि करने की अनुमति देता है.
बांग्लादेश मशीन टूल्स फैक्ट्री द्वारा निर्मित ये मशीनें स्थानीय स्तर पर बनाई जाती थीं, जो आत्मनिर्भरता का प्रतीक थीं लेकिन विपक्षी पार्टियों विशेष रूप से बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने ईवीएम पर सवाल उठाए. ये दावा किया कि ये मशीनें रिगिंग के लिए संवेदनशील हैं. जानकारी लीक हो सकती है. 2018 चुनावों में ईवीएम वाले क्षेत्रों में विपक्ष की हार के बाद ये आरोप और तेज हो गए.
फिर EVM की बैलेट बॉक्स से चुनाव का फैसला
2023 में ईवीएम को बंद करने का फैसला अप्रैल में आया, जब बीईसी के सचिव जाहंगीर आलम ने घोषणा की कि 300 संसदीय सीटों पर बैलेट पेपर और पारदर्शी बैलेट बॉक्स का उपयोग किया जाएगा. फैसले के पीछे की कई वजहें थीं.
1. वित्तीय बाधाएं
सबसे प्रमुख कारण फंड की कमी था. पुरानी 1.1 लाख ईवीएम को रिफर्बिश करने और नई मशीनें खरीदने के लिए 1,260 करोड़ टका की जरूरत थी. बीईसी ने वित्त मंत्रालय से अनुरोध किया, लेकिन सरकार ने वैश्विक आर्थिक मंदी का हवाला देकर मना कर दिया. जनवरी 2023 में ही 2 लाख नई ईवीएम खरीदने का प्रोजेक्ट स्थगित कर दिया गया.
2. राजनीतिक असहमति और विपक्ष का विरोध
बीएनपी और उसके सहयोगी दलों ने ईवीएम को रिगिंग का माध्यम बताते हुए विरोध किया. वे दावा करते थे कि ईवीएम से वोटों की गोपनीयता भंग होती है. सत्ताधारी अवामी लीग इसका दुरुपयोग कर सकती है. 39 पंजीकृत पार्टियों में 19 ने ईवीएम का विरोध किया, जबकि केवल अवामी लीग समेत तीन ने समर्थन किया. जुलाई 2022 में बीईसी ने ईवीएम पर चर्चा की, लेकिन बीएनपी ने इसमें भाग नहीं लिया. विपक्ष की मांग थी कि चुनाव निष्पक्ष हों, इसलिए बैलेट पेपर पर लौटा गया. विश्लेषकों का मानना है कि शेख हसीना सरकार ने विश्वसनीयता हासिल करने के लिए यह कदम उठाया.
3. समय की कमी और तकनीकी चुनौतियां
चुनाव दिसंबर 2023 या जनवरी 2024 में होने वाले थे. ईवीएम तैयार करने में समय लगता. बीईसी अध्यक्ष काजी हबीबुल अवाल ने कहा कि राजनीतिक सहमति और फंड की कमी के अलावा समय की कमी भी एक कारण था. ईवीएम में सॉफ्टवेयर अपडेट, ट्रेनिंग और टेस्टिंग की जरूरत होती है, जो उपलब्ध समय में संभव नहीं था. इसके अलावा ईवीएम की सुरक्षा पर सवाल उठे थे, जैसे हैकिंग की आशंका, हालांकि बीईसी ने इसे खारिज किया.
4. लोकतांत्रिक विश्वसनीयता और पारदर्शिता
बैलेट पेपर सिस्टम को अधिक पारदर्शी माना जाता है, क्योंकि वोटर खुद देख सकता है कि उसका वोट कहां जा रहा है. ईवीएम पर उठे सवालों ने चुनाव की निष्पक्षता पर संदेह पैदा किया. 2023 का निर्णय विपक्ष को संतुष्ट करने और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया पाने का प्रयास था.
ईवीएम बंद करने के बाद विवादित चुनाव
इस निर्णय ने बांग्लादेश की चुनावी प्रक्रिया पर गहरा प्रभाव डाला. जनवरी 2024 के चुनाव बैलेट पेपर से हुए. विपक्ष ने बॉयकॉट किया. अवामी लीग ने बहुमत हासिल किया. चुनाव हिंसा और विवादों से भरे रहे. ईवीएम बंद होने से पारंपरिक सिस्टम की वापसी हुई, जो अधिक श्रमसाध्य है लेकिन विश्वसनीय माना जाता है.
अबकी बार के चुनावों में ईवीएम बिल्कुल नहीं
बांग्लादेश में 12 फरवरी को पूरे देश में आम चुनावों के लिए वोट डाले जा रहे हैं लेकिन उसमें चुनाव आयोग ने ईवीएम को पूरी तरह से स्क्रैप कर दिया. ये चुनाव बैलेट बॉक्स और बैलेट पेपर से हो रहे हैं.
भारत के पड़ोसी देशों में चुनाव – ईवीएम बनाम बैलेट बॉक्स
भारत के पड़ोसी देशों अफगानिस्तान, बांग्लादेश, चीन, मालदीव, म्यांमार, नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका में चुनावी वोटिंग सिस्टम मुख्य रूप से पेपर बैलेट बॉक्स ही है. केवल भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का व्यापक उपयोग होता है, लेकिन पड़ोसियों में ईवीएम का बहुत सीमित या न के बराबर उपयोग है.
भूटान – सक्रिय तौर पर चुनावों में ईवीएम का इस्तेमाल. ये मशीनें भारत में ही बनी हैं. 2023-2024 नेशनल असेंबली चुनावों में 809 पोलिंग स्टेशनों पर EVM से 2,18,273 वोट डाले गए.
नेपाल – यहां पेपर बैलेट का इस्तेमाल होता है. यहां 2008 के एसेंबली चुनावों और 2009 बाई-इलेक्शंस में EVM ट्रायल सफल रहा, लेकिन कई राजनीतिक दलों की वजह से बटन कम पड़ने और प्रमुख पार्टियों के विरोध के कारण इसे बंद कर दिया गया. 2017 से चुनावों में ईवीएम का इस्तेमाल नहीं.
पाकिस्तान – यहां भी पेपर बैलेट का इस्तेमाल. हालांकि पाकिस्तान में इमरान खान सरकार ने 2024 चुनावों के लिए ईवीएम और ओवरसीज वोटिंग आनलाइन का बिल पास कराया. वर्ष 2022 में नई सरकार ने इसे रद्द कर दिया. 2024 आम चुनाव पेपर बैलेट से ही हुए.
श्रीलंका – यहां भी पेपर बैलेट से चुनाव होते हैं. कोई ईवीएम उपयोग नहीं.
मालदीव – यहां भी पेपर बैलेट इस्तेमाल.
म्यांमार –मुख्य रूप से पेपर बैलेट का ही इस्तेमाल.
अफगानिस्तान – पेपर बैलेट का इस्तेमाल लेकिन तालिबान शासन में कोई नियमित लोकतांत्रिक चुनाव नहीं.
चीन – चीन में लोकतांत्रिक चुनाव नहीं होते लेकिन यदि कोई स्थानीय प्रक्रिया हो तो पेपर बैलेट का इस्तेमाल.

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