Last Updated:January 01, 2026, 19:49 IST
Court News: मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन ने 1755 के नथम कनवाई युद्ध की याद में स्मारक स्तूप बनाने की अनुमति दी है. सुनवाई के दौरान उन्होंने स्टेन स्वामी के मेमोरियल का जिक्र करते हुए सरकार से तीखा सवाल पूछा और औपनिवेशिक दौर के भारतीय प्रतिरोध को याद करने की जरूरत बताई.
मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन ने नथम कनवाई युद्ध स्मारक की अनुमति देते हुए स्टेन स्वामी के मेमोरियल का हवाला दिया. (फाइल फोटो PTI)Court News: तमिलनाडु में मंदिर में दीप जलाने के मुद्दे को लेकर पहले ही सियासी और वैचारिक निशाने पर आ चुके मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन एक बार फिर चर्चा में हैं. इस बार वजह है उनका एक अहम फैसला, जिसमें उन्होंने 18वीं सदी में अंग्रेजों के खिलाफ लड़े गए नथम कनवाई युद्ध की याद में स्मारक स्तूप बनाने का रास्ता साफ कर दिया है.
इस फैसले के दौरान जस्टिस स्वामीनाथन ने सरकार से ऐसा सवाल पूछ दिया, जिसने पूरे मामले को नई बहस के केंद्र में ला दिया. उन्होंने स्टेन स्वामी की याद में बने स्मृति स्तंभ का जिक्र करते हुए यह सवाल उठाया कि अगर वहां अनुमति की जरूरत नहीं पड़ी, तो आजादी से पहले अंग्रेजों के खिलाफ लड़े गए युद्ध की स्मृति को क्यों रोका जा रहा है.
क्या है पूरा मामला?
यह मामला तमिलनाडु के नथम कनवाई इलाके से जुड़ा है, जहां वर्ष 1755 में ब्रिटिश सेना और स्थानीय मेलूर कल्लर समुदाय के बीच एक भीषण युद्ध हुआ था. इस युद्ध की स्मृति में एक स्तूप बनाने का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन नथम के तहसीलदार ने इसकी अनुमति देने से इनकार कर दिया. इसके बाद एक याचिकाकर्ता ने मद्रास हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की. इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन ने तहसीलदार के फैसले पर सवाल उठाए और स्मारक निर्माण का रास्ता साफ किया.
क्यों कोर्ट ने जताई नाराजगी?
सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वामीनाथन ने गहरी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि आज की पीढ़ी को भारत के औपनिवेशिक शासन के इतिहास की जानकारी नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि लोगों को यह नहीं पता कि गुलामी से मुक्ति के लिए किस तरह की लड़ाइयां लड़ी गई थीं. कोर्ट के मुताबिक ऐसे ऐतिहासिक संघर्षों की स्मृति को संरक्षित करना समाज के लिए जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने अतीत को समझ सकें.
स्टेन स्वामी के मेमोरियल का क्यों हुआ जिक्र?
जस्टिस स्वामीनाथन ने सुनवाई के दौरान कहा,
राज्य में अगर स्टेन स्वामी की याद में पत्थर का स्तंभ लगाया जा सकता है और उसके लिए किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं पड़ी, तो निश्चित रूप से नथम कनवाई युद्ध की स्मृति में स्तूप स्थापित करने के लिए भी अनुमति की जरूरत नहीं होनी चाहिए.
स्टेन स्वामी एक जेसुइट पादरी और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता थे, जिनका नाम भीमा कोरेगांव हिंसा मामले से भी जोड़ा गया था. उनकी 2021 में मौत के बाद मद्रास हाई कोर्ट ने उनकी याद में स्मृति स्तंभ बनाने की अनुमति दी थी. इसी उदाहरण के जरिए कोर्ट ने सरकार के दोहरे मापदंडों पर सवाल खड़े किए.
क्या हुआ था नथम कनवाई युद्ध में?
याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि वर्ष 1755 में नथम कनवाई इलाके में मेलूर कल्लर समुदाय और ब्रिटिश सेना के बीच संघर्ष हुआ था. इस युद्ध में कल्लर समुदाय ने ब्रिटिश सेना को पराजित किया था. याचिका के मुताबिक यह संघर्ष कोइलकुड़ी के तिरुमोगुर मंदिर से जुड़ा था. ब्रिटिश सैनिकों ने कर्नल अलेक्जेंडर हेरॉन के नेतृत्व में मंदिर से पीतल की मूर्तियां और अन्य कीमती सामान लूट लिया था. इसके बाद कल्लर समुदाय ने संगठित होकर युद्ध किया और लूटी गई मूर्तियों को वापस हासिल किया.
फैसले का व्यापक संदेश
इस फैसले को सिर्फ एक स्मारक निर्माण की अनुमति के तौर पर नहीं देखा जा रहा है. कोर्ट ने इसके जरिए यह संदेश दिया है कि औपनिवेशिक दौर में हुए भारतीय प्रतिरोध को भुलाया नहीं जाना चाहिए. ऐसे संघर्षों की याद न सिर्फ इतिहास का हिस्सा हैं, बल्कि समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम भी करती हैं. जस्टिस स्वामीनाथन का यह फैसला यह भी दिखाता है कि कोर्टें सिर्फ कानून की व्याख्या नहीं करतीं, बल्कि सामाजिक और ऐतिहासिक चेतना को भी सामने लाने की भूमिका निभाती हैं.
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सुमित कुमार News18 हिंदी में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं. वे पिछले 3 साल से यहां सेंट्रल डेस्क टीम से जुड़े हुए हैं. उनके पास जर्नलिज्म में मास्टर डिग्री है. News18 हिंदी में काम करने से पहले, उन्ह...और पढ़ें
First Published :
January 01, 2026, 19:49 IST

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