ऐसा विरोधी अब नहीं दिखता...राजनीति में खालीपन, सुशील मोदी पर भावुक हुए शिवानंद

1 day ago

Last Updated:January 06, 2026, 09:34 IST

Shivanand Tiwari Facebook Post on Sushil Kumar Modi : शिवानंद तिवारी ने अपने भावुक स्मरण में दिवंगत सुशील कुमार मोदी से जुड़ी जिन बातों का जिक्र किया है वह बिहार की राजनीतिक संस्कृति पर एक बड़ी टिप्पणी है. शिवानंद तिवारी के अनुसार, सुशील मोदी उस राजनीति के प्रतिनिधि थे जहां विचारधाराएं तो टकराती थीं, लेकिन रिश्ते कभी नहीं टूटते थे. सुशील मोदी के निधन के सथ ही बिहार की राजनीति ने सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि संवाद और संतुलन का एक सेतु खो दिया है.

ऐसा विरोधी अब नहीं दिखता...राजनीति में खालीपन, सुशील मोदी पर भावुक हुए शिवानंदसुशील कुमार मोदी की पुण्यतिथि पर शिवानंद तिवारी ने फेसबुक पोस्ट में उनकी राजनीतिक यात्रा और सम्मानित विरोधी नेता के रूप में याद किया है.

sपटना. भारतीय राजनीति में कुछ नेता ऐसे होते हैं जो सिर्फ अपनी पार्टी तक सीमें नहीं रहते, बल्कि विरोधियों के बीच भी सम्मान पाते हैं. बिहार के वरिष्ठ भाजपा नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ऐसे ही राजनेता थे. उनकी पहली पुण्यतिथि पर समाजवादी नेता और राज्यसभा के पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी ने फेसबुक पर एक भावुक पोस्ट लिखकर उन्हें याद किया है. यह पोस्ट सिर्फ स्मृति नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति के एक पूरे दौर के उतार-चढ़ाव के दस्तावेज जैसे हैं. शिवानंद तिवारी ने अपनी भावनाओं को जिन शब्दों में पिरोया है वह शिवानंद तिवारी की नजर में न केवल सुशील मोदी की पूरी राजनीतिक यात्रा की कहानी बताते हैं, बल्कि अपने भावुक स्मरण में वे यह भी बताते हैं कि सुशील मोदी कैसे विरोध की राजनीति में भी रिश्तों की गरिमा निभाने वाले नेता थे.

जनसंघ में सामाजिक संतुलन की लड़ाई

शिवानंद तिवारी लिखते हैं कि उनका और सुशील मोदी का परिचय जेपी आंदोलन के दौर में हुआ. उस समय सुशील मोदी विद्यार्थी परिषद के नेता थे और शिवानंद तिवारी समाजवादी धारा से जुड़े हुए थे. विचारधाराएं अलग थीं, लेकिन संवाद बना रहा. बहसें होती थीं, असहमतियां थीं, पर संवाद कभी टूटा नहीं. शिवानंद तिवारी आगे लिखते हैं, उस दौर के जनसंघ (अब भाजपा) में ऊंची जातियों के नेताओं का वर्चस्व था. गोविंदाचार्य ने बिहार जनसंघ में सोशल इंजीनियरिंग की शुरुआत की. सुशील मोदी, नंदकिशोर यादव और प्रेम कुमार जैसे पिछड़ी पृष्ठभूमि के नेताओं को आगे बढ़ाने में उनकी अहम भूमिका रही. यह बदलाव आसान नहीं था, लेकिन सुशील मोदी ने धैर्य और राजनीतिक कौशल से जगह बनाई.

बांकीपुर जेल में गहराई से बनी दोस्ती

शिवानंद तिवारी आगे बताते हैं कि, सुशील मोदी से असली पहचान बांकीपुर जेल में हुई. दोनों अलग विचारधाराओं से थे, फिर भी किताबों और बहसों ने उन्हें करीब लाया. रामधारी सिंह दिनकर की ‘संस्कृति के चार अध्याय’ सुशील मोदी ने ही शिवानंद तिवारी को जेल में पढ़ाई. मतभेद थे-खासतौर पर जेल प्रशासन से टकराव को लेकर, लेकिन आपसी सम्मान बना रहा.

भाजपा के सबसे मजबूत चेहरों में शुमार

शिवानंद तिवारी लिखते हैं कि, 1980 में भाजपा के गठन के बाद पुरानी पीढ़ी धीरे-धीरे पीछे हुई और नई पीढ़ी सामने आई. सुशील मोदी जल्द ही बिहार भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा बने. उन्हें बिहार की राजनीति का पूरा नक्शा याद रहता था-कौन नेता कहां मजबूत है, किस कार्यकर्ता की क्या भूमिका है, वे सब जानते थे.

लालू यादव से बेबाक टकराव वाले नेता

जब लालू प्रसाद यादव बिहार के सबसे ताकतवर नेता थे और उस दौर में सुशील मोदी ही विपक्ष के सबसे मजबूत स्वर थे. शिवानंद तिवारी लिखते हैं कि जहां दूसरे नेता दब जाते थे, वहीं सुशील मोदी लालू यादव को तुर्की-ब-तुर्की जवाब देते थे. उन पर आरोप भी लगे, लेकिन उन्होंने सबूत की चुनौती दी और आरोप प्रमाणित नहीं हो पाए.

सांप्रदायिकता से दूरी, सामाजिक स्वीकार्यता

शिवानंद तिवारी स्पष्ट कहते हैं कि सुशील मोदी या जेपी आंदोलन से निकले अन्य नेताओं के मुंह से उन्होंने कभी नफरत या सांप्रदायिक भाषा नहीं सुनी. सुशील मोदी हर साल ईद पर इफ्तार पार्टी करते थे, जिसमें बड़ी संख्या में मुस्लिम समाज के लोग शामिल होते थे. उन्हें मुस्लिम वोट भी मिलता था और यह बिहार की राजनीति में असामान्य बात नहीं थी, लेकिन आज के संदर्भ में खास है.

निजी फैसला-अंतर्धार्मिक विवाह का साहस

शिवानंद तिवारी बताते हैं कि सुशील मोदी का विवाह ईसाई युवती जेसिका से हुआ था. यह विवाह बिना धर्म परिवर्तन के हुआ और इसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी शामिल हुए थे. वे इसे आज के राजनीतिक माहौल में लगभग अविश्वसनीय बताते हैं और तुलना करते हैं कि आज ऐसे फैसलों को किस तरह देखा जाता है.

एक खालीपन जो अब भी महसूस होता है

सुशील मोदी के निधन को एक साल हो चुका है, लेकिन शिवानंद तिवारी के शब्दों में- उनके जाने से जो खालीपन बना है और उसे भरने वाला व्यक्तित्व अभी नजर नहीं आता. राजनीति में विरोधी होना आसान है, लेकिन सम्मानित विरोधी होना कठिन-सुशील मोदी इस कसौटी पर खरे उतरते थे.

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Vijay jha

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First Published :

January 06, 2026, 09:34 IST

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