जिस तरह आजकल पूरे देश में यूजीसी की नई गाइडलाइंस को लेकर घमासान मचा हुआ है. लड़ाई सड़कों पर आ गई. प्रदर्शन हुए. बेशक सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस पर स्टे लगा दिया है लेकिन लोगों का गुस्सा इस रेगुलेशन को लेकर थमा नहीं है. क्या आप सोच सकते हैं कि 1990 में क्या हुआ होगा, जब तत्कालीन वीपी सिंह सरकार ने मंडल आयोग की आरक्षण की सिफारिशों को लागू करके एक बड़ा सामाजिक बम फोड़ दिया. देश में हाहाकार मच गया. अभूतपूर्व प्रदर्शन हुए. ये मामला सुप्रीम कोर्ट में गया. तब क्या हुआ. सुप्रीम कोर्ट में जब इस मामले पर 9 जजों की बेंच बैठी तो क्या फैसला हुआ. इसमें कौन से जज थे. बाद में उन्होंने क्या किया.
मंडल आरक्षण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ 1992 में गए मामले को इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ के नाम से भी जानते हैं. इसमें 9 न्यायाधीशों की पूरी पीठ ने फैसला सुनाया था. बेंच की अध्यक्षता तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एम.एच. कनिया ने की. इस पीठ ने 6:3 के बहुमत से मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के सरकार के फैसले को बरकरार रखा.
9 जजों की पीठ में 6 जज पक्ष में 3 विपक्ष में
समर्थन करने वाले 6 जज. इन न्यायाधीशों ने ओबीसी को 27% आरक्षण देने के फैसले को वैध माना
न्यायमूर्ति एम.एच. कनिया
न्यायमूर्ति एम.एन. वेंकटचलय्या
न्यायमूर्ति ए.एम. अहमदी
न्यायमूर्ति पी.बी. सावंत
न्यायमूर्ति बी.पी. जीवन रेड्डी – इन्होंने बहुमत का मुख्य फैसला लिखा था. इनको देश में आरक्षण की दिशा बदलने वाले जज के तौर पर भी जानते हैं. न्यायमूर्ति बी.पी. जीवन रेड्डी द्वारा लिखा गया फैसला आज भी भारत में आरक्षण नीति का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी आधार माना जाता है
न्यायमूर्ति एस. रत्नवेल पांडियन- इन्होंने आरक्षण के समर्थन में अपनी अलग लेकिन सहमति वाली राय दी.
विपक्ष में रहने वाले (अल्पमत – 3 जज)
इन न्यायाधीशों ने मंडल आयोग की सिफारिशों के कार्यान्वयन पर असहमति जताई थी.
न्यायमूर्ति डॉ. टी.के. थम्मन
न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह
न्यायमूर्ति आर.एम. सहाय
(फाइल फोटो)
फैसले का मुख्य निष्कर्ष
1. आरक्षण संवैधानिक है, लेकिन 50% की सीमा तक ही
2. ‘क्रीमी लेयर’ का पालन अनिवार्य है.
इन जजों का बाद का करियर
इंदिरा साहनी मामले (1992) के बाद इस बेंच में शामिल जजों के करियर का ग्राफ काफी प्रभावशाली रहा. इनमें से कई जज आगे चलकर भारत के मुख्य न्यायाधीश भी बने. समर्थन करने वाले समूह के जजों ने भारतीय न्यायिक इतिहास में बहुत ऊंचे पद संभाले
समर्थन वाले
1. न्यायमूर्ति एम.एच. कनिया – फैसले के समय वे पहले से ही CJI थे. 1992 में ही सेवानिवृत्त हो गए
2. न्यायमूर्ति एम.एन. वेंकटचलय्या – ये जस्टिस कनिया के बाद भारत के 25वें मुख्य न्यायाधीश बने. रिटायरमेंट के बाद उन्होंने ‘संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग’ की अध्यक्षता भी की.
3. न्यायमूर्ति ए.एम. अहमदी – ये जस्टिस वेंकटचलय्या के बाद भारत के 26वें मुख्य न्यायाधीश बने. उन्होंने एएमयू के चांसलर के रूप में भी सेवाएं दीं.
4. न्यायमूर्ति बी.पी. जीवन रेड्डी – इस फैसले के मुख्य लेखक. रिटायरमेंट के बाद वे भारतीय विधि आयोग के अध्यक्ष बने.
5. न्यायमूर्ति पी.बी. सावंत – रिटायरमेंट के बाद वे भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष रहे.
6. न्यायमूर्ति एस. रत्नवेल पांडियन – रिटायरमेंट के बाद वे छठे केंद्रीय वेतन आयोग के अध्यक्ष बनाए गए.
विपक्ष वाले
इस फैसले के विपक्ष में रहने वाले अल्पमत जजों का क्या हुआ
1. न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह – इन्हें भारत का “ग्रीन जज” कहा जाता है. मंडल केस के बाद उन्होंने पर्यावरण संरक्षण जैसे ताज महल को बचाना, गंगा प्रदूषण पर कई ऐतिहासिक फैसले दिए. रिटायरमेंट के बाद वे ‘परिसीमन आयोग’ के अध्यक्ष रहे.
2. न्यायमूर्ति डॉ. टी.के. थम्मन – वे 1993 में सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त हुए. उनका कार्यकाल बौद्धिक और निष्पक्ष निर्णयों के लिए जाना जाता है.
3. न्यायमूर्ति आर.एम. सहाय – वे 1995 में रिटायर हुए. उन्होंने भी कई महत्वपूर्ण संवैधानिक पीठों में हिस्सा लिया. वह अपनी स्पष्टवादिता के लिए जाने जाते रहे.
कौन थीं इंदिरा साहनी, जिन्होंने विरोध में केस लड़ा
इंदिरा साहनी एक वकील और सामाजिक कार्यकर्ता थीं, जिनका नाम मंडल कमीशन आरक्षण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में ऐतिहासिक याचिका से जुड़ा है.अब वह सुप्रीम कोर्ट में सीनियर वकील हैं. दिल्ली निवासी इंदिरा साहनी ने 1 अक्टूबर 1990 को वी.पी. सिंह सरकार के 27% OBC आरक्षण के फैसले को असंवैधानिक बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. बाद में उन्होंने पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार के 10% आर्थिक आरक्षण को भी चुनौती दी.
उनकी याचिका पर 1992 के इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 50% आरक्षण सीमा, क्रीमी लेयर और प्रमोशन में आरक्षण पर रोक जैसे सिद्धांत स्थापित किए. वह आरक्षण नीति पर चर्चित रही. बाद में सवर्ण आरक्षण पर भी सक्रिय रहीं.
क्या मंडल कमीशन कांग्रेस सरकार ने बनाया
नहीं, मंडल कमीशन के चेयरमैन बी.पी. मंडल को मोरारजी देसाई ने नियुक्त किया था. जनता पार्टी सरकार ने दिसंबर 1978 में पिछड़े वर्गों के विकास के लिए दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया, जिसे मंडल कमीशन के नाम से जाना गया. प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने 1 जनवरी 1979 को अधिसूचना जारी कर बी.पी. मंडल को इस 6 सदस्यीय आयोग का अध्यक्ष बनाया गया.
1. बीपी.मंडल – ये बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और दिग्गज सांसद थे. मंडल आयोग के अध्यक्ष के रूप में इन्होंने ही पिछड़ी जातियों की पहचान के लिए 11 सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक मानक तैयार किए.
2. न्यायमूर्ति आरआर भोले –ये बांबे हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश और एक प्रमुख दलित नेता थे. कानूनी विशेषज्ञ होने के नाते उन्होंने आयोग की सिफारिशों को संवैधानिक और कानूनी आधार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
3. दीवान मोहन लाल – वो एक वरिष्ठ राजनेता और वकील थे. वे सामाजिक न्याय के कामों में लंबे समय से सक्रिय थे. आयोग में उत्तरी भारत के पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के मुद्दों का प्रतिनिधित्व करते थे.
4. के. सुब्रमण्यम –ये दक्षिण भारत के एक अनुभवी प्रशासक और सामाजिक कार्यकर्ता थे. उन्होंने आयोग को दक्षिण भारतीय राज्यों जैसे तमिलनाडु के सफल आरक्षण मॉडल के डेटा और अनुभवों को समझने में मदद की.
5. एल.आर. नायक –ये पूर्व सांसद और दलित समुदायों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले नेता थे. इन्होंने मुख्य रिपोर्ट से अलग अपना मत दिया था, जिसमें ‘अति-पिछड़ों’ के लिए अलग से आरक्षण की वकालत की गई.
एस.एस. गिल – आयोग के सचिव. वह आयोग के सदस्य-सचिव के रूप में कार्यरत थे. एक आईएएस अफसर थे.
फिर वीपी सिंह ने इसको कैसे लागू किया
1989 के लोकसभा चुनाव में जनता दल ने घोषणापत्र में OBC आरक्षण लागू करने का वादा किया था. वी.पी. सिंह की अल्पमत सरकार ने 7 अगस्त 1990 को इसे सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण के रूप में लागू किया, जो पिछड़े वर्गों को सशक्त बनाने के उद्देश्य से था.
रिपोर्ट 1980 में प्रस्तुत हुई थी, लेकिन इंदिरा और राजीव गांधी सरकारों ने इसे 10 वर्ष तक नजरंदाज किया. वी.पी. सिंह ने इसे सामाजिक न्याय के लिए उठाया, हालांकि इससे व्यापक विरोध और राजनीतिक उथल-पुथल हुई. इसने देश की दशा-दिशा ही आने वाले सालों के लिए बदल दी.
वीपी सिंह ने इसे लागू क्यों किया
इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वीपी सिंह का यह कदम केवल सामाजिक न्याय के लिए नहीं था बल्कि इसके पीछे मंडल बनाम कमंडल की राजनीति भी थी.
तत्कालीन उप-प्रधानमंत्री चौधरी देवी लाल सरकार से नाराज थे. उन्होंने 9 अगस्त 1990 को दिल्ली में एक विशाल रैली बुलाई. वीपी सिंह ने उनकी ताकत को कम करने के लिए 7 अगस्त को ही मंडल कार्ड खेल दिया.
भाजपा उस समय राम मंदिर आंदोलन (कमंडल) के जरिए हिंदुओं को एकजुट कर रही थी. मंडल आयोग को लागू करना पिछड़ी जातियों को गोलबंद करने का एक तरीका माना गया, जिससे बीजेपी की हिंदू एकता की राजनीति को चुनौती मिली. वीपी सिंह की सरकार इस फैसले के कुछ ही समय बाद गिर गई थी, क्योंकि बीजेपी ने सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया.
लागू होने में देरी क्यों हुई
भले ही घोषणा 1990 में हुई थी, लेकिन इसे तुरंत जमीनी स्तर पर लागू नहीं किया जा सका, क्योंकि मामला सुप्रीम कोर्ट चला गया. सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी. आखिरकर 16 नवंबर 1992 को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद इसे अंतिम रूप से लागू करने का रास्ता प्रशस्त हुआ. इसे पूरे तरीके से सितंबर 1993 में पीवी नरसिंह राव की सरकार के दौरान लागू किया गया.

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