चमोली, वायनाड, सिलक्‍यारा...कुदरत के कहर का जिम्‍मेदार कौन? NDMA ने बताया किस वजह से हुई विनाशलीला

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चमोली, वायनाड, सिलक्‍यारा...कुदरत के कहर का जिम्‍मेदार कौन?

Last Updated:February 27, 2026, 08:02 IST

NDMA Report: देश और दुनिया में प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता के साथ ही इस तरह की घटनाओं की संख्‍या भी बढ़ गई है. व्‍यापक पैमाने पर जनहानि होने के साथ ही संपत्तियों का नुकसान भी हो रहा है. चमोली एवलांच, वायनाड लैंडस्‍लाइड, सिलक्‍यारा टनल हादसा कुछ उदाहरण भर हैं. इसके अलावा अत्‍यधिक गर्मी और जोरदार बारिश होने की घटनओं में भी वृद्धि दर्ज की जा रही है.

चमोली, वायनाड, सिलक्‍यारा...कुदरत के कहर का जिम्‍मेदार कौन?Zoom

NDMA ने अपनी रिपोर्ट में प्राकृतिक आपदाओं पर कई बातों का खुलासा किया है. वायनाड लैंडस्‍लाइड वाली घटना में व्‍यापक पैमाने पर नुकसान हुआ था. (फाइल फोटो)

NDMA Report: वायनाड और चमोली जैसी प्राकृतिक आपदाओं को रोका जा सकता था? NDMA यानी Disaster Management Authority ने इन दोनों जैसी प्राकृतिक आपदाओं को लेकर एक विस्‍तृत रिपोर्ट जारी की है. इसमें कई चौंकाने वाली बातों का उल्‍लेख है. NDMA ने साल 2021 के चमोली डिजास्‍टर, 2024 के वायनाड भूस्खलन और सिलक्यारा सुरंग हादसे सहित कई आपदाओं को टालने योग्य बताते हुए परियोजना आकलन और दीर्घकालिक जोखिम प्रबंधन (लॉन्‍ग टर्म रिस्‍क मैनेजमेंट) में गंभीर कमियों की ओर इशारा किया है. 10 प्रमुख आपदाओं पर आधारित यह रिपोर्ट भविष्य की इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर प्रोजेक्‍ट के लिए संदर्भ दस्तावेज के रूप में तैयार किया गया है, जिसका उद्देश्य संकट की परिस्थितियों में बेहतर निर्णय क्षमता को बढ़ावा देना है.

साल 2021 में उत्तराखंड के चमोली में हुए हादसे ने दो जलविद्युत परियोजनाओं को तबाह कर दिया था. रिपोर्ट के अनुसार, इस आपदा में 204 लोगों के मारे जाने की आशंका जताई गई थी, जिनमें से 77 मौतों की पुष्टि हो सकी, जबकि 127 लोग अब भी लापता हैं. एनडीएमए ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में भू-वैज्ञानिक अस्थिरता, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न जोखिम कन्‍वेंशनल इंजीनियरिंग मान्यताओं से कहीं अधिक जटिल हैं. ऐसे में भविष्य की परियोजनाओं में डायनेमिक रिस्क मॉडलिंग, विस्तृत भू-वैज्ञानिक, भूकंपीय और जलवायु जोखिम आकलन को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि हिमालय जैसे अति-संवेदनशील क्षेत्रों में विकास कार्यों की योजना बनाते समय पर्यावरण से जुड़े हालात और आपदा को ध्यान में रखना आवश्यक है. एनडीएमए का कहना है कि प्रोजेक्‍ट्स इवेल्‍युएशन के कन्‍वेंशनल तरीके इन जटिलताओं को नहीं पकड़ पा रहे हैं.

सिलक्‍यारा हादसा: चेतावनियों की अनदेखी

‘हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स’ की रिपोर्ट के अनुसार, NDMA ने अपनी रिपोर्ट में नवंबर 2023 में सिलक्यारा सुरंग धंसने की घटना का उल्लेख करते हुए इसे सिस्टमेटिक फेल्‍योर का नतीजा बताया है. रिपोर्ट के मुताबिक, निर्माण शुरू होने के बाद से सुरंग में अलग-अलग गंभीरता के 21 धंसाव दर्ज किए गए थे, जो संभावित बड़े हादसे के स्पष्ट संकेत थे. इसके बावजूद पर्याप्त सुरक्षात्‍मक कदम नहीं उठाए गए. रिपोर्ट में कहा गया कि उत्तराखंड की कई अन्य इंफ्रा प्रोजेक्‍ट्स में भी भू-वैज्ञानिक रिस्‍क का कम आकलन, अपर्याप्त सुरक्षा मार्जिन और सक्रिय की बजाय प्रतिक्रियात्मक रिस्‍क मैनेजमेंट का पैटर्न देखने को मिला. पर्यावरण विशेषज्ञों और भू-वैज्ञानिकों ने चारधाम परियोजना की गति और पैमाने को हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र (Himalayan Ecological System) की वहन क्षमता से अधिक बताया था. सिलक्यारा हादसे को दीर्घकालिक नीतिगत कमियों का नतीजा बताया गया है.

वायनाड लैंडस्‍लाइड: जलवायु संकट और मानवीय वजहें

केरल के वायनाड में 2024 में हुए लैंडस्‍लाइड में 225 मौतों की पुष्टि हुई, जबकि 138 लोग अब भी लापता हैं. एनडीएमए के अनुसार, वायनाड में ग्रीन कवर में 1950 से 2018 के बीच लगभग 62% तक कमी आई है. चाय बागानों के विस्तार और अनियोजित विकास ने ढलानों की स्थिरता और प्राकृतिक जल धारण क्षमता को कमजोर किया. रिपोर्ट में कहा गया कि व्यापक पैमाने पर वनों की कटाई से नेचुरल सिस्‍टम खत्म हुआ है, जिससे मिट्टी का बंधन कमजोर पड़ा और भारी वर्षा की स्थिति में भूस्खलन की आशंका बढ़ गई. जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम में आए बदलाव ने इस तरह की घटनाओं को और बढ़ाया है.

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Manish Kumar

बिहार, उत्‍तर प्रदेश और दिल्‍ली से प्रारंभिक के साथ उच्‍च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्‍ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्‍लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु...और पढ़ें

Location :

New Delhi,Delhi

First Published :

February 27, 2026, 08:02 IST

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