Last Updated:February 13, 2026, 13:07 IST
चावल को जितनी देरतक भिगोया जाता है, फिर भिगोकर इसे पकाया जाता है तो ये उतना ही स्वादिष्ट और खिला खिला बनता है. इसे देर तक भिगोकर बनाने की परंपरा की शुरुआत कब और कैसे हुई. क्या है इसके पीछे का साइंस. आइए हम जानते हैं कि चावल को भिगोने की सलाह के पीछे कौन से वैज्ञानिक कारण हैं और इससे इसका स्वाद, बनावट और पोषण किस तरह बेहतर होता है.
चावल दुनिया की आधी से अधिक आबादी का मुख्य भोजन है. भारत सहित एशिया के अधिकांश देशों में इसकी पकाने की विधियां सदियों से विकसित होती रही हैं. इन्हीं में से एक सबसे परखा हुआ तरीका है पकाने से पहले चावल को देर तक भिगोना. वैसे आपको बता दें कि इससे चावल का स्वाद, बनना और पौष्टिकता सभी बेहतर हो जाते हैं. तो हम यहां उसके पीछे की वजहों को बताएंगे.
चावल एक सूखा अनाज है जिसके दानों में नमी की मात्रा बहुत कम होती है. जब इसे पकाने से पहले पानी में डुबोया जाता है, तो इसके दाने पानी को सोख लेते हैं. फूल जाते हैं. चूंकि भीगने के बाद चावल पहले से ही आंशिक रूप से हाइड्रेटेड हो जाते हैं, इसलिए उन्हें पकने में कम समय लगता है. और चावल के अंदर आ गया पानी उसे बेहतर स्वाद देने की भी खास भूमिका निभाता है.
भीगे हुए चावल के दाने समान रूप से पकते हैं, बाहर से ज़्यादा नरम और अंदर से कच्चे नहीं रहते. इससे चावल मुलायम और फूला-फूला बनता है. चावल की चिपचिपाहट उसमें मौजूद स्टार्च (अमाइलोज और एमाइलोपेक्टिन) के कारण होती है. भिगोने की प्रक्रिया में ये सतही स्टार्च पानी में घुलकर अलग हो जाता है. जिससे पकने के बाद चावल कम चिपचिपे और अलग-अलग दाने वाले बनते हैं. यह बिरयानी या पुलाव जैसे व्यंजनों को खास बना देता है. देशभर में जितने भी बेहतरीन बिरयानी पकाने वाले होटल हैं, वो घंटों चावल को भिगोते हैं.
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चावल, विशेष रूप से बासमती जैसे लंबे चावलों में कुछ ऐसे कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं, जिन्हें पचाना शरीर के लिए मुश्किल हो सकता है, जैसे अमाइलोज. भिगोने की प्रक्रिया चावल में प्राकृतिक एंजाइमों को सक्रिय कर देती है जो इन जटिल कार्बोहाइड्रेट्स को सरल शर्करा में तोड़ना शुरू कर देते हैं. इस "प्री-डाइजेशन" की वजह से भीगे हुए चावल पचाने में आसान होते हैं और पेट में गैस या भारीपन की समस्या कम होती है.
भिगोने का सबसे खास फायदा पोषण का होता है. चावल और अन्य अनाजों में प्राकृतिक रूप से "फाइटिक एसिड" नाम का पदार्थ होता है. फाइटिक एसिड एक "एंटी-न्यूट्रिएंट" है, क्योंकि यह शरीर में ज़िंक, आयरन, कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे महत्वपूर्ण खनिजों को शरीर के साथ मिलने में बाधा डालता है. भिगोने की प्रक्रिया चावल में मौजूद "फाइटेज" एंजाइम को सक्रिय कर देती है, जो फाइटिक एसिड को तोड़ देता है. इससे चावल के ये मूल्यवान खनिज शरीर के लिए उपलब्ध हो पाते हैं. उनका पोषण मूल्य बढ़ जाता है.
आजकल चावल की खेती में कई तरह के कीटनाशकों और रसायनों का इस्तेमाल होता है. भिगोने से बहुत से अवांछित रसायन दूर हो जाते हैं. आर्सेनिक जैसी भारी धातु की मात्रा का स्तर भी काफी हद तक कम हो जाता है. ये बात शोधों से भी साबित हुई है कि चावल को 6-8 घंटे तक पानी में भिगोकर रखने और फिर अच्छी तरह धोने से उसमें मौजूद अकार्बनिक आर्सेनिक का स्तर काफी हद तक कम हो जाता है.
माना जा सकता है कि चावल को पकाने से पहले भिगोने और धोने की परंपरा की शुरुआत हज़ारों साल पहले तब हुई जबकि मनुष्य ने चावल को पकाना शुरू किया होगा. तब लकड़ी या उपलों जैसे ईंधन को इकट्ठा करना मुश्किल काम था. लिहाजा प्राचीन समय में लोगों ने महसूस किया होगा कि भीगे हुए चावल जल्दी पक जाते हैं, जिससे ईंधन की भी बचत होती है. ये व्यावहारिक कारण शायद चावल को देर तक भिगोने की सबसे बड़ी वजह रही होगी.
पहले के लोगों ने ये भी देखा होगा कि भीगे हुए चावल पकाने पर स्वादिष्ट और मुलायम बनते हैं, बनिस्बत सीधे पकाए गए सूखे चावलों के. तो ये अनुभव पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता गया. वैसे भारतीय उपमहाद्वीप में चावल की खेती लगभग 5000 साल पुरानी है. मुगलई और अन्य शाही रसोइयों ने पाया कि लंबे दाने वाले बासमती चावल को भिगोकर पकाने से वह अलग-अलग दाने वाला, सुगंधित और राजसी बनावट वाला बनता है, जिसे बिरयानी और पुलाव की शान समझा जाता है.
दक्षिण भारत में भी चावल और उड़द दाल को कई घंटे तक भिगोकर पीसा जाता है. फिर उसे खमीर उठने के लिए रख दिया जाता है. भिगोना न केवल उन्हें पीसने में आसान बनाता है, बल्कि फरमेंटेशन प्रक्रिया को भी शुरू करता है, जो इडली और डोसा को हल्की और स्पंजी बनावट देता है. आयुर्वेद जैसी प्राचीन चिकित्सा पद्धतियां पाचन पर बहुत ज़ोर देती हैं. आयुर्वेद के सिद्धांतों के अनुसार, भिगोना चावल को पचाने में हल्का बनाता है, जिससे शरीर पर इसका बोझ कम पड़ता है.
वैसे अलग अलग तरह के चावल को अलग अलग देर तक पकाना चाहिए. ब्राउन राइस को 6-8 घंटे तक भिगोना चाहिए, क्योंकि उसकी ऊपर परत बहुत सख्त होती है. बासमती चावल सबसे कम देर तक भिगोने पर भी बेहतर रिजल्ट देता है. इडली के लिए भी चावल को कम से कम छह घंटे भिगोया जाता है. वैसे बासमती चावल की खुशबू सीधे पके हुए चावलों की तुलना में ज्यादा तेज और सुखद लगती है.
अब आपको आखिर में ये भी बताते चलें कि क्या चावल को भिगोने से उसका स्वाद भी बेहतर हो जाता है. हां, ऐसा पक्के तौर पर होता है. चावल के दाने सजीव बीज होते हैं और उनमें प्राकृतिक एंजाइम्स मौजूद होते हैं. जब आप चावल को पानी में भिगोते हैं, तो यह पानी उन "सुप्त" एंजाइम्स को सक्रिय कर देता है. ये एंजाइम्स चावल में मौजूद जटिल स्टार्च और प्रोटीन को तोड़ना शुरू कर देते हैं. स्टार्च टूटकर सरल शर्करा में बदलने लगता है. ये शर्करा प्राकृतिक रूप से मीठी होती है, लिहाजा चावल के स्वाद को मीठा और बेहतर बना देती है.
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First Published :
February 13, 2026, 13:07 IST

1 hour ago
