Last Updated:January 06, 2026, 09:01 IST
India Under Water Tunnel in Brahmputra: भारत को पहली बार पानी के नीचे एक ट्विन-ट्यूब टनल मिलने जा रहा है. इस टनल में गाड़ी और ट्रेन दोनों के आने-जाने की सुविधा होगी, जिससे किसी भी इमरजेंसी में सेना और गोला-बारूद को तेजी से लाने-ले जाने में मदद मिलेगी. दरअसल, एक्सपेंडिचर सेक्रेटरी की अगुवाई वाले एक इंटर-मिनिस्ट्रियल पैनल ने असम में ब्रह्मपुत्र नदी पर गोहपुर और नुमालीगढ़ को जोड़ने वाली 15.8km की ट्विन ट्यूब टनल बनाने को हरी झंडी दे दी है. एक ट्यूब में सिंगल रेल ट्रैक का इंतजाम होगा. (सभी तस्वीरें एआई की मदद से बनाई गईं हैं.)

भारत ने अपनी सामरिक और बुनियादी ढांचे की ताकत को एक नई ऊंचाई देने जा रहा है. देश में पहली बार ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे एक ऐसी 'ट्विन-ट्यूब' (दोहरी नली वाली) सुरंग बनने जा रही है, जिसमें न केवल गाड़ियां दौड़ेंगी, बल्कि ट्रेनें भी गुजर सकेंगी. असम के गोहपुर और नुमालीगढ़ को जोड़ने वाली यह महत्वाकांक्षी परियोजना पूर्वोत्तर भारत की कनेक्टिविटी के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक 'मास्टरस्ट्रोक' साबित होगी.

एक्सपेंडिचर सेक्रेटरी की अध्यक्षता वाले एक अंतर-मंत्रालयी पैनल ने इस 15.8 किलोमीटर लंबी सुरंग के निर्माण को हरी झंडी दे दी है. इस प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा मकसद किसी भी आपात स्थिति में सेना, हथियारों और गोला-बारूद की तेजी से आवाजाही सुनिश्चित करना है. यह सुरंग अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर जैसे सीमावर्ती राज्यों के लिए लाइफलाइन का काम करेगी, जहां चीन के साथ तनाव की स्थिति में लॉजिस्टिक्स पहुंचाना अक्सर चुनौतीपूर्ण होता है.

यह इंजीनियरिंग का एक नायाब नमूना होगी ये टनल. यह सुरंग ब्रह्मपुत्र नदी के सबसे गहरे तल से भी 32 मीटर नीचे बनाई जाएगी. इसमें दो अलग-अलग ट्यूब होंगी. हर ट्यूब में दो लेन होंगी.
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रेल-रोड हाइब्रिड: खास बात यह है कि इनमें से एक ट्यूब में सिंगल रेल ट्रैक की व्यवस्था होगी. डिजाइन के मुताबिक, जब इस ट्यूब से ट्रेन गुजरेगी, तब वहां गाड़ियों की आवाजाही रोक दी जाएगी. यहां बैलिस्टिक ट्रैक बिछाए जाएंगे और ट्रेनें बिजली (इलेक्ट्रिसिटी) से चलेंगी.

आम जनता के लिए यह परियोजना किसी वरदान से कम नहीं है. वर्तमान में गोहपुर और नुमालीगढ़ के बीच की दूरी सड़क मार्ग से करीब 240 किलोमीटर है, जिसे तय करने में 6 से 7 घंटे का समय लगता है.

इस सुरंग के बनने के बाद यह दूरी सिमटकर मात्र 34 किलोमीटर रह जाएगी और सफर का समय घटकर सिर्फ 30 मिनट हो जाएगा. यह न केवल समय की बचत है, बल्कि ईंधन और संसाधनों की भी भारी बचत होगी.

कुल 33.7 किलोमीटर लंबी इस परियोजना (जिसमें सुरंग, एप्रोच रोड और रेलवे ट्रैक शामिल हैं) की लागत लगभग 18,600 करोड़ रुपये आंकी गई है. पहले इस सुरंग का बजट 14,900 करोड़ रुपये था और यह केवल सड़क यातायात के लिए प्रस्तावित थी. लेकिन सरकार ने 'रोड-कम-रेल' (Road-cum-Rail) मॉडल अपनाने का फैसला किया, जिससे लागत में बढ़ गई.

इस भारी-भरकम खर्च को तीन मंत्रालय मिलकर उठाएंगे, जिसमें सड़क परिवहन मंत्रालय, रेल मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय है. अधिकारियों ने बताया कि इस प्रोजेक्ट को अंतिम मंजूरी के लिए जल्द ही केंद्रीय मंत्रिमंडल (Union Cabinet) के समक्ष रखा जाएगा. संभावना जताई जा रही है कि असम विधानसभा चुनाव से पहले इसे हरी झंडी मिल सकती है.

यह फैसला सरकार की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत उन स्थानों पर 'रोड-कम-रेल' सुरंगें बनाने की योजना है जहां यह संभव हो. इससे पहले अक्टूबर 2025 में यह रिपोर्ट आई थी कि सरकार ने पूर्वोत्तर के 'चिकन नेक' कॉरिडोर और कर्नाटक के शिराडी घाट जैसे महत्वपूर्ण स्थानों पर भी ऐसी ही सुरंगों की पहचान की है. इस परियोजना के 5 साल में पूरा होने की उम्मीद है. यह सुरंग न केवल असम के विकास को गति देगी बल्कि उत्तर-पूर्वी सीमाओं पर भारत की रक्षा तैयारियों को अभेद्य बनाएगी.
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1 day ago
