ताजमहल समेत वो 6 कमाल जो ईरानी इंजीनियर भारत में कर गए, अब भी बेमिसाल

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भारत और ईरान जिसे फारस भी कहा जाता था, के बीच संबंध सदियों पुराने हैं. यह केवल व्यापार का नहीं, बल्कि हुनर और तकनीक के लेन-देन का भी रिश्ता था. प्राचीन काल से लेकर मुगल काल यानि 18वीं सदी तक फारसी इंजीनियरों और वास्तुकारों ने भारत की धरती पर ऐसे कमाल किए जो आज भी दुनिया को हैरान करते हैं. इसमें ताज महल भी शामिल है.

मध्य काल में ईरान के इंजीनियर और गणितज्ञ दुनिया में बेहतरीन माने जाते थे. उन्हें स्थापत्य, पुलों और जल निकाय सिस्टम को बनाने में महारथ हासिल थी. पूरे एशिया में उन दिनों ईरानी इंजीनियर ही इस काम के लिए बुलाये जाते थे. जिन दिनों मुगल भारत आए तो अपने साथ ईरानी वास्तुकारों और इंजीनियर्स को भी लेकर आए या उन्हें खासतौर पर बुलाया. उन्होंने फिर यहां ऐसे इंजीनियरिंग चमत्कार किए, जो आज भी बेमिसाल हैं.

1. वास्तुकला में ‘डबल डोम’ और ‘मेहराब’

सल्तनत और मुगल काल के दौरान फारसी इंजीनियरों ने भारत में निर्माण की पूरी तकनीक बदल दी. ये हुमायूं के मकबरे से लेकर ताजमहल तक में नजर आता है. हुमायूं का मकबरा फारसी वास्तुकार मिराक मिर्जा गियाथ ने डिजाइन किया था. इसमें पहली बार ‘डबल डोम’ यानि दोहरा गुंबद का इस्तेमाल हुआ, जो बाहर से ऊंचा और भव्य दिखता है, लेकिन अंदर से छत की ऊंचाई सामान्य रहती है.

ताजमहल के मुख्य वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी थे, जिनका परिवार ईरान से आया था. उन्होंने फारसी ज्यामिति और भारतीय कौशल का ऐसा मेल किया कि यह दुनिया का अजूबा बन गया.

2. जल प्रबंधन और ‘कनात’ प्रणाली

ईरान एक सूखा देश रहा है, इसलिए वहां के इंजीनियर पानी बचाने में माहिर थे. उन्होंने भारत में भी क्रांतिकारी बदलाव किए. दक्कन विशेषकर बीजापुर और औरंगाबाद में फारसी इंजीनियरों ने जमीन के नीचे ऐसी सुरंगें बनाईं जो मीलों दूर से पानी लाती थीं, इसे ‘नहर-ए-अंबरी’ के नाम से भी जाना जाता है.

मुगल बागों जैसे शालीमार बाग में पानी का बिना बिजली के ऊपर चढ़ना और फव्वारों का चलना फारसी हाइड्रॉलिक इंजीनियरिंग का कमाल था. जो आज भी एक चमत्कार की तरह है.आज भी बहुत सी जगहों में मुगलों द्वारा ईरानी इंजीनियरों द्वारा बनाई गईं पानी की बावड़ियां या वाटर सिस्टम बेमिसाल हैं, जिसमें उन्हें सीधे नदी से जोड़ा जाता था, जिससे पानी सीधा वहां तक पहुंचता था. फिल्टर होता था और फिर इस्तेमाल में लाया जाता था.

ईरानी इंजीनियरों को तब मुकन्निस कहा जाता था, वो नहर यानि कनात प्रणाली में माहिर थे. ये भूमिगत सुरंगें थीं जो गुरुत्वाकर्षण से पानी को पहाड़ों से मैदानों तक लाती थीं, बिना वाष्पीकरण के नुकसान के. यह तकनीक 3000 साल से अधिक पुरानी है. ये 30 से ज्यादा देशों में फैली, जो कृषि, शहरीकरण और व्यापार को बढ़ावा देती थी. यखचाल यानि प्राचीन फ्रिज जैसी संरचनाओं में भी उनकी महारत थी, जो बर्फ को गर्मी में संरक्षित रखती थीं.

3. बागवानी की चारबाग शैली

ईरानी इंजीनियरों ने भारत को चारबाग का कॉन्सेप्ट दिया. इसमें पूरे बगीचे को नहरों द्वारा चार बराबर हिस्सों में बांटा जाता था. यह केवल खूबसूरती के लिए नहीं था, बल्कि तापमान को नियंत्रित करने और सिंचाई की एक सटीक इंजीनियरिंग प्रणाली थी. भारत में इस स्टाइल के बागीचे कई जगह बनाए गए.

4. युद्ध और धातु विज्ञान

18वीं सदी तक भारतीय तलवारों, विशेषकर ‘दमिश्क स्टील’ या जिसे भारत में ‘वूट्ज’ कहा जाता था, उसे परिष्कृत करने में फारसी उस्तादों का बड़ा हाथ था.मुगलों की तोपें बनाने की तकनीक में फारसी विशेषज्ञों का मार्गदर्शन रहता था. उन्होंने किलों के दरवाजों और बुर्जों को इस तरह डिजाइन किया कि वे भारी गोलाबारी झेल सकें.

5. खगोल विज्ञान और उपकरण

मध्यकाल में ईरान के खगोलशास्त्री और इंजीनियर भारत आए. उन्होंने ‘एस्ट्रोलैब’ जैसे उपकरण भारत में लोकप्रिय बनाए. ये उपकरण तारों की स्थिति देखकर समय, दिशा और अक्षांश बताने के काम आते थे. जयपुर के जंतर-मंतर में इस्तेमाल होने वाले कई सिद्धांतों की जड़ें प्राचीन फारसी और यूनानी गणित में हैं.

6. कपड़ा और बुनाई तकनीक

ईरान से आए ‘जुलाहों’ और इंजीनियरों ने भारत में ‘करघा’ की तकनीक में सुधार किया. कश्मीर और आगरा के कालीन उद्योग की नींव फारसी इंजीनियरों ने ही रखी थी, जिन्होंने जटिल डिजाइनों को धागों में पिरोने के लिए लकड़ी के खाकों का आविष्कार किया था.

ताजमहल को भूकंप और पानी से बचाने की अनोखी तकनीक

ताजमहल को बनाने वाले इंजीनियरों में ज्यादातर ईरान के थे. मुख्य वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी ईरानी मूल के थे. उन्होंने इसे भूकंप और यमुना की गीली मिट्टी से बचाने के लिए एक ऐसी तकनीक का इस्तेमाल किया था, जो उस समय के हिसाब से “फ्यूचरिस्टिक” थी. इसे ‘वेल फाउंडेशन’ तकनीक कहा जाता है.

ताजमहल का पूरा वजन उठाने के लिए इंजीनियरों ने केवल जमीन नहीं खोदी, बल्कि नदी के किनारे की नरम मिट्टी में सैकड़ों गहरे कुएं खोदे. इन कुओं को तब तक खोदा गया जब तक कि वे नीचे की कठोर चट्टान (Hard Rock) तक नहीं पहुंच गए. फिर इन कुओं को पत्थरों, ईंटों और मोर्टार से भर दिया गया. इसके ऊपर एक विशाल पत्थर का प्लेटफॉर्म बनाया गया, जिस पर आज ताजमहल खड़ा है.

इंजीनियर जानते थे कि यमुना की नमी नींव को नुकसान पहुंचा सकती है, इसलिए उन्होंने एक अनोखा प्रयोग किया. उन्होंने नींव के कुओं में आबनूस की लकड़ी के बड़े-बड़े लट्ठों का इस्तेमाल किया. आबनूस एक ऐसी लकड़ी है जो पानी मिलने पर सड़ने के बजाय और ज्यादा मजबूत हो जाती है. जब तक यमुना का पानी इन कुओं तक पहुंचता रहेगा, इसकी नींव पत्थर की तरह सख्त बनी रहेगी.

अगर आप ताजमहल की चारों मीनारों को ध्यान से देखेंगे, तो वे बिल्कुल सीधी नहीं हैं. उन्हें हल्का सा बाहर की तरफ झुकाकर बनाया गया है. ऐसा इसलिए किया गया ताकि अगर कभी बहुत बड़ा भूकंप आए, तो ये मीनारें मुख्य गुंबद पर गिरने के बजाय बाहर की तरफ गिरें। इससे ताजमहल का मुख्य ढांचा हमेशा सुरक्षित रहेगा.

ताजमहल का मुख्य गुंबद बहुत भारी है. इसे संभालने के लिए फारसी ‘आर्क’ तकनीक का इस्तेमाल किया गया. यह वजन को सीधे नीचे नहीं, बल्कि बगल की दीवारों की ओर ट्रांसफर करती है. इसकी वजह से सदियों बाद भी इमारत में कोई बड़ी दरार नहीं आई.

आज हम जिसे ‘शुद्ध भारतीय’ वास्तुकला या तकनीक समझते हैं, उसका एक बड़ा हिस्सा असल में सदियों पहले ईरान से आए हुनरमंदों की देन है.

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