जब से ऑपरेशन सिंदूर शुरू हुआ है, पाकिस्तान ने भविष्य की तैयारियां शुरू कर दी हैं. कुछ घंटे पहले आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने चेतावनी देते हुए कहा कि पिछले साल मई में भारतीय सेना ग्राउंड ऑपरेशन के लिए बिल्कुल तैयार हो गई थी. भविष्य में पाकिस्तान ने कोई गलती की तो करारा जवाब मिलेगा क्योंकि ऑपरेशन सिंदूर अभी जारी है. पाकिस्तान को भी इस बात का अंदाजा है. यही वजह है कि वह मुस्लिम देशों को एकुजट करते हुए नाटो की तर्ज पर इस्लामिक नाटो बनाने की तैयारी कर रहा है. यह 'सेफ्टी छाता' ऐसे समय में खड़ा हो रहा है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद नाटो से खुश नहीं हैं. वह इसे तोड़ने के मूड में दिख रहे हैं. ऐसे में यह समझना महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तान इस्लामिक नाटो बनाकर क्या हासिल करना चाहता है?
1. पाकिस्तान का साथ दे रहा है तुर्किये. दोनों देश सऊदी अरब के साथ सुरक्षा समझौते पर आगे की बातचीत शुरू कर चुके हैं. अगर यह बना तो नाटो की तरह का सुरक्षा समझौता होगा. नाटो के आर्टिकल 5 में कहा गया है कि किसी भी सदस्य देश पर कोई भी हमला होता है तो इसे सभी पर हमला माना जाएगा.
2. पाकिस्तान को समझ में आ रहा है कि भविष्य में भारत की इस तरह की स्ट्राइक से बचने के लिए परमाणु धमकी भी काम नहीं करेगी. ऐसे में कुछ देशों से गठबंधन के जरिए वह एक प्रेशर खड़ा करना चाहता है. शुरुआती मीटिंग हो चुकी है.
3. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक अंकारा के थिंक टैंक TEPAV के रणनीतिकार निहत अली ने बताया है कि इस गठबंधन में सब देशों की भूमिका अलग-अलग होगी.
- सऊदी अरब पूरी वित्तीय सहायता देगा.
- पाकिस्तान अपनी परमाणु क्षमता, बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता और मैनपावर देगा.
- तुर्किये की ओर से सैन्य विशेषज्ञता और घरेलू रक्षा उद्योग से मदद उपलब्ध कराई जाएगी. आपको याद होगा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी पाकिस्तान को तुर्किये से ड्रोन और दूसरे हथियार मिले थे.
निहत अली ने कहा है कि जिस तरह से अमेरिका इस क्षेत्र में अपने और इजरायल के हितों को प्राथमिकता दे रहा है, बदलते घटनाक्रम और क्षेत्रीय संघर्षों के कारण दोस्त और दुश्मन की पहचान करने के लिए नए तंत्र विकसित कर रहे हैं. 'इस्लामिक नाटो' के बारे में जानकारी रखने वालों ने बताया है कि यह गठबंधन वक्त की जरूरत है क्योंकि तुर्किये के रणनीतिक हित दक्षिण एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ तेजी से मिल रहे हैं.
अब तक क्या-क्या हुआ
- तीनों देशों ने मिलकर आपसी तालमेल और समन्वय बनाना शुरू कर दिया है. तुर्की के रक्षा मंत्रालय के अनुसार उन्होंने इस सप्ताह की शुरुआत में अंकारा में अपनी पहली नौसैनिक बैठक की.
- गौर करने वाली बात यह है कि तुर्किये इस समझौते में महज एक रीजनल प्लेयर नहीं है. यह अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो गठबंधन का भी लंबे समय से सदस्य है. अमेरिका के बाद नाटो में तुर्किये की दूसरी सबसे बड़ी सेना है.
सऊदी अरब और तुर्की दोनों शिया-बहुल ईरान के बारे में अपनी चिंताएं जाहिर करते रहते हैं. हालांकि दोनों सैन्य टकराव नहीं चाहते. वे तेहरान के साथ भी जुड़ना चाहते हैं. वे एक स्थिर सुन्नी-नेतृत्व वाले सीरिया का समर्थन करते हैं और फिलिस्तीनी राष्ट्र का भी मिलकर सपोर्ट करते हैं.
इधर, पाकिस्तान के तुर्की के साथ अच्छे रक्षा संबंध हैं. तुर्किये पाकिस्तानी नौसेना के लिए युद्धपोत बना रहा है. उसने पाकिस्तान के दर्जनों F-16 लड़ाकू विमानों का आधुनिकीकरण किया है. वह पहले से ही रियाद और इस्लामाबाद दोनों के साथ ड्रोन तकनीक साझा कर रहा है.

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