रशीद किदवई का लेख: सियासी इफ्तार दावतों पर लगे ब्रेक, गैर भाजपाइयों ने भी तौबा की!

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इस्लामी महीने रमजान 2026 के 25 दिन गुजर चुके हैं, लेकिन दिल्ली की सियासी महफिलों से इफ्तार की रौनक लगभग नदारद है. ज्यादातर इफ्तार अब आम मुस्लिम महफिलों और घरेलू दायरों तक ही सीमित रह गए हैं. किसी समय राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री आवास और कैबिनेट मंत्रियों के घर इफ्तार की दावतों से गुलजार हुआ करते थे. वह परिपाटी अब अतीत का हिस्सा बन चुकी है. भाजपा और एनडीए नेताओं को तो छोड़िए, अब तो कांग्रेस और गैर कांग्रेस-गैर एनडीए मुख्यमंत्रियों ने भी इस रिवाज से तौबा कर लिया है.

इस सीजन में राष्ट्रीय राजधानी में दो खास इफ्तार जरूर चर्चा में रहे. इनमें से एक का आयोजन भारत में ब्रिटेन के कार्यवाहक उच्चायुक्त बेन मेलॉर ने किया था, जबकि दूसरी इफ्तार पार्टी कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने दी थी. शायर से राज्यसभा सांसद बने प्रतापगढ़ी की इफ्तार पार्टी कुछ मायनों में असामान्य कही जा सकती है. ऐसा इसलिए क्योंकि आम तौर पर गैर मुस्लिमों द्वारा ही रोजेदारों के लिए इफ्तार की दावत रखने का रिवाज रहा है. किंतु यहां एक मुस्लिम सांसद ने राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और कुछ अन्य नेताओं को आमंत्रित किया था. ऐसा लगा, जैसे इस महफिल का मकसद बस इतना था कि कुछ फोटो हो जाएं और इंस्टाग्राम के लिए रील्स बन जाए.

वैसे देखा जाए तो इफ्तार की यह परंपरा कोई सरकारी या रस्मी कार्यक्रम नहीं है, लेकिन 1970 के दशक से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों और कई मुख्यमंत्रियों द्वारा मुस्लिम समाज के साथ सद्भाव दिखाने के लिए इफ्तार दावत देने की परिपाटी बन गई थी. इन दावतों में आम तौर पर बड़े उलेमा, नामी मुस्लिम शख्सियतें, इस्लामी देशों के राजदूत और अलग-अलग दलों के नेता शामिल होते थे.

अब इफ्तार की दावतें मानो फैशन से बाहर हो गई हैं. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बाकी विपक्षी दलों ने भी इफ्तार से दूरी बना ली है. सोनिया गांधी और राहुल गांधी भी इनसे दूर ही रहते हैं. 2014 के बाद से ही हिंदी टीवी न्यूज चैनलों ने इफ्तार और सहरी के वक्त को स्क्रॉल के रूप में दिखाना बंद कर दिया है. कई अखबारों ने भी ऐसा ही किया. इसे शायद ‘इत्तेफाक’ ही कहा जाएगा था कि यह बदलाव रायसीना हिल्स पर सरकार बदलने के कुछ महीनों बाद ही नजर आने लगा था!

इमरान प्रतापगढ़ी की इफ्तार दावत में ठीकठाक सियासी जमघट हुई. फोटो- पीटीआई

वैसे अब मुस्लिम उलेमा भी इसे ज्यादा अहमियत नहीं दे रहे. उनके मुताबिक यह महज एक ‘सियासी तमाशा’ बन गया था, जिसमें दौलत का दिखावा ही ज्यादा होता था. कई मुस्लिम संगठनों, इमामों और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कुछ मेंबरों ने तो इनका ‘बायकॉट’ करने तक की अपील कर दी थी. उनकी दलील थी कि रमजान तो इबादत का महीना है, न कि मेलजोल और सियासतगीरी का.

किसने शुरू किया था सियासी इफ्तारी का रिवाज?

सियासी इफ्तार की शुरुआत का सेहरा आम तौर पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सिर बांधा जाता है, जिन्होंने 1980 में यह रिवाज शुरू किया था. लेकिन गैर कांग्रेसी दल इस दावे से इत्तेफाक नहीं रखते. उनका कहना है कि रोजेदारों के लिए इफ्तार की दावत देने की शुरुआत सबसे पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा ने 1973 से 1975 के बीच की थी.

प्रधानमंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह अपने 7 रेस कोर्स रोड वाले घर पर लगभग हर साल इफ्तार की दावत दिया करते थे. उन्होंने सिर्फ तब इसे रद्द किया था, जब उत्तराखंड में आई बाढ़ के बाद उन्होंने इफ्तार न रखने का फैसला किया. अटल बिहारी वाजपेयी ने भी 2003 में आम चुनाव से एक साल पहले अपना इफ्तार रद्द कर दिया था. वजह उन्होंने विदेश यात्रा बताई थी, लेकिन उन्होंने अपने जूनियर मंत्री शाहनवाज हुसैन को इफ्तार दावत का इंतजाम करने को जरूर कहा था. उसी साल तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम, जो खुद मुसलमान थे, ने भी राष्ट्रपति भवन में होने वाली सालाना इफ्तार दावत बंद कर दी. उन्होंने इससे बची रकम तीन अनाथालयों को देने का फैसला लिया. कलाम के इस फैसले की काफी सराहना हुई. उनका एक और तर्क यह था कि एक मुसलमान होने के नाते उनके लिए इफ्तार दावत देना कुछ अजीब होगा, क्योंकि आम तौर पर गैर मुसलमान अपने मुस्लिम भाइयों से एकजुटता और मोहब्बत दिखाने के लिए इफ्तार की दावत देते हैं.

पिछले साल एक इफ्तार पार्टी में बिहार के सीएम नीतीश कुमार और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान. फोटो- पीटीआई

जब भाजपा ने भी किया था इफ्तार का आयोजन…

साल 1996 में भारतीय जनता पार्टी ने भी एक इफ्तार का आयोजन किया था. उस समय पार्टी के अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण थे, जो नई दिल्ली के 11 अशोक रोड स्थित पार्टी मुख्यालय में इस दावत के मेजबान बने. लेकिन वह इफ्तार कुछ और वजहों से चर्चा में आ गई. एक वजह तो यह थी कि रोजा खोलने के बाद होने वाली मगरिब की नमाज के लिए वहां कोई इंतजाम नहीं किए गए थे. फिर जल्दबाजी में इंतजाम किए गए, लेकिन नमाज की दिशा बदल गई. नमाज पश्चिम की जगह किसी दूसरी दिशा में अदा की गई.

जहां तक कांग्रेस सरकारों की बात है, उन्होंने इंदिरा गांधी की इस पहल के बाद इफ्तार को लगभग एक जरूरी ‘रिवाज’ की तरह माना. हालांकि सोनिया गांधी ने पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद सिर्फ 2001 में एक बार ही इफ्तार की मेजबानी की और उसके बाद इस परिपाटी को छोड़ दिया. अब तो लगभग तमाम राज्यों के मुख्यमंत्री निवासों और राजभवनों से भी इफ्तार के आयोजन नदारद हो गए हैं.

दिल्ली में इफ्तार की घटती अहमियत का असर अब बॉलीवुड में भी दिखने लगा है. अभी तक ऐसा कोई इफ्तार नजर नहीं आया, जहां सलमान खान और शाहरुख खान गले मिलते दिखें. फिर भले ही बाकी वक्त वे दोनों अलग-अलग कोनों में गुजारते नजर आएं.

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