Last Updated:January 29, 2026, 21:47 IST
यूजीसी नोटिफिकेशन पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही देश में एक अजीबोगरीब ड देखने को मिला है. फैसले के कानूनी तर्कों को समझने के बजाय, लोग गूगल पर फैसला सुनाने वाले जजों सीजेआई सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की 'जाति' सर्च करने में जुट गए.
सीजेआई सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची.सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का पूरे देश पर असर होता है, इसलिए लोगों की बारीक नजर होती है. मगर गुरुवार को अजीबोगरीब ‘डिजिटल ट्रेंड’ देखने को मिला. यूजीसी नोटिफिकेशन का फैसला आते ही गूगल से लेकर सोशल मीडिया तक लोग सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्य कांत की जाति ढूंढते नजर आए. हजारों लोगों ने जस्टिस जॉयमाल्या बागची की जाति भी सर्च करने की कोशिश की.
सीजेआई सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने ही यूजीसी के विवादित नोटिफिकेशन पर फैसला सुनाया था. फैसला आते ही इंटरनेट पर ‘CJI Surya Kant Caste’ और ‘Justice Joymalya Bagchi Caste’ जैसे कीवर्ड्स की बाढ़ आ गई. गूगल ट्रेंड्स के आंकड़े बताते हैं कि फैसला आने के कुछ ही घंटों के भीतर इन दोनों जजों की जाति जानने की जिज्ञासा चरम पर थी. ‘CJI Surya Kant Caste’ और ‘Joymalya Bagchi Caste’ जैसे कीवर्ड्स 450% से ज्यादा की बढ़त के साथ ‘ब्रेकआउट’ ट्रेंड में शामिल हो गए.
समर्थन और विरोध भी…
जैसे ही कोर्ट ने फैसला सुनाया, सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई. एक वर्ग फैसले के समर्थन में था, तो दूसरा विरोध में. लेकिन चिंताजनक बात यह थी कि विरोध या समर्थन का आधार ‘कानून’ नहीं, बल्कि ‘पहचान’ बन गया. लोगों ने तुरंत अपने मोबाइल उठाए और यह सर्च करना शुरू कर दिया कि ये जज किस जाति से आते हैं, ताकि वे यह तय कर सकें कि फैसला निष्पक्ष है या ‘जातिगत पूर्वाग्रह’ से प्रेरित.
न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल
जज संविधान की शपथ लेते हैं. वे न तो ब्राह्मण होते हैं, न दलित और न ही पिछड़ा वर्ग… कुर्सी पर बैठकर वे सिर्फ ‘न्यायमूर्ति’ होते हैं. लेकिन जब समाज उन्हें उनकी जाति के चश्मे से देखता है, तो यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर एक सीधा हमला होता है. सीजेआई सूर्य कांत देश के मुख्य न्यायाधीश हैं, उनका हर फैसला संविधान की व्याख्या पर आधारित होता है, न कि उनकी निजी पहचान पर.
यह पहली बार नहीं हुआ
यह ट्रेंड नया नहीं है. इससे पहले भी जब सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट पर फैसला दिया था, तब जस्टिस ए.के. गोयल और जस्टिस यू.यू. ललित की जाति सर्च की गई थी. आर्थिक आधार पर आरक्षण (EWS) के फैसले के वक्त भी जजों की पृष्ठभूमि खंगाली गई. अयोध्या फैसले के वक्त भी जजों के धर्म और जाति को लेकर इंटरनेट पर जासूसी की गई. जस्टिस जॉयमाल्या बागची, जो कलकत्ता हाई कोर्ट से आते हैं और अपनी विद्वता के लिए जाने जाते हैं, उन्हें भी इस संकीर्ण मानसिकता का शिकार होना पड़ा है. यूजीसी मामले में उनके रुख को कानूनी नजरिए से देखने के बजाय लोग यह देख रहे हैं कि उनका सरनेम किस समुदाय से जुड़ता है.
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Delhi,Delhi,Delhi
First Published :
January 29, 2026, 21:47 IST

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