Last Updated:February 28, 2026, 07:33 IST
CJI on Nuclear Policy: सुप्रीम कोर्ट इन दिनों बेबाक टिप्पणी और फैसलों के कारण सुर्खियों में है. NCERT विवाद के बाद एक बार फिर SC ने एक अहम टिप्पणी की है. सुप्रीम कोर्ट ने परमाणु ऊर्जा नीति से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अदालतों को नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप करते समय सावधानी बरतनी चाहिए. चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि न्यायिक हस्तक्षेप से निवेशकों में डर का माहौल नहीं बनना चाहिए और राष्ट्रीय हित तथा आशंकाओं के बीच संतुलन जरूरी है.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट इन दिनों काफी सुर्खियों में है. ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ वाले NCERT चैप्टर पर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने NCERT ने खूब लताड़ा था. अब CJI सूर्यकांत ने न्यायिक दखलअंदाजी पर बड़ी बात कही है. NCERT विवाद के बाद अब सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक नई जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने अदालतों के अति-हस्तक्षेप पर सवाल उठाए. परमाणु ऊर्जा नीति से जुड़ी इस सुनवाई में कोर्ट ने साफ संकेत दिया कि हर सरकारी नीति को न्यायिक जांच के दायरे में लाना जरूरी नहीं है. कोर्ट ने कहा कि विकास, निवेश और राष्ट्रीय हित जैसे बड़े मुद्दों को ध्यान में रखे बिना केवल आशंकाओं के आधार पर हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने याचिकाकर्ता ईएएस शर्मा की तरफ से अदालत में कहा कि न्यूक्लियर पावर प्लांट में शामिल निजी कंपनियों की जिम्मेदारी (देनदारी) सीमित क्यों रखी गई है. उन्होंने इस नियम पर सवाल उठाते हुए तर्क दिया कि किसी दुर्घटना की स्थिति में कंपनियों की जवाबदेही स्पष्ट और पर्याप्त होनी चाहिए. इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा कि देश में ऐसा माहौल बनना चाहिए जहां निवेशक बिना डर के निवेश कर सकें. अदालत ने यह भी चेताया कि अगर हर नीति लंबे मुकदमों में उलझेगी तो बड़े प्रोजेक्ट आर्थिक रूप से असफल हो सकते हैं और इससे देश के डेवलवपमेंट पर असर पड़ेगा.
न्यूक्लियर दायित्व पर बहस
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिका में संसद द्वारा पारित SHANTI कानून को चुनौती दी गई है. वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि सरकार ने न्यूक्लियर एनर्जी क्षेत्र में निजी कंपनियों को अनुमति तो दी है. लेकिन दुर्घटना की स्थिति में उनकी नागरिक देनदारी 3000 करोड़ रुपए तक सीमित कर दी गई है. उन्होंने तर्क दिया कि किसी बड़े परमाणु हादसे में नुकसान लाखों करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है. उन्होंने चेर्नोबिल और फुकुशिमा परमाणु दुर्घटनाओं का उदाहरण भी दिया. इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा कि आज कोयला आधारित ऊर्जा को हतोत्साहित किया जा रहा है और देश परमाणु ऊर्जा के बिना आगे नहीं बढ़ सकता. इसलिए राष्ट्रीय हित और काल्पनिक आशंकाओं के बीच संतुलन जरूरी है. जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने भी कहा कि ऊर्जा नीति तय करना सरकार का अधिकार है और कोर्ट केवल यह देखेगी कि नीति असंवैधानिक तो नहीं.प्रशांत भूषण ने SC में कहा कि निजी परमाणु कंपनियों की देनदारी सीमित करना जनता के हित के खिलाफ है. (फाइल फोटो)
कोर्ट ने निवेश माहौल को लेकर क्या चिंता जताई?
अदालत ने कहा कि न्यायपालिका को कानूनों की समीक्षा करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उसके हस्तक्षेप से निवेशकों में डर का माहौल न बने. लंबी कानूनी प्रक्रियाएं परियोजनाओं को आर्थिक रूप से असफल बना सकती हैं. इससे देश में निवेश प्रभावित होता है.
प्रशांत भूषण ने कोर्ट में क्या दलील दी?
प्रशांत भूषण ने कहा कि निजी परमाणु कंपनियों की देनदारी सीमित करना जनता के हित के खिलाफ है. उनका तर्क था कि किसी परमाणु दुर्घटना में वास्तविक नुकसान तय सीमा से कई गुना ज्यादा हो सकता है, इसलिए जिम्मेदारी का ढांचा मजबूत होना चाहिए.
अदालत ने अंतरराष्ट्रीय नियमों का हवाला क्यों मांगा?
कोर्ट ने कहा कि भारत का परमाणु दायित्व ढांचा अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे देशों के नियामक सिस्टम से मेल खाना चाहिए. इससे वैश्विक निवेश आसान होता है और ऊर्जा सहयोग मजबूत बनता है.
वैश्विक मानकों से तालमेल पर जोर
अदालत ने याचिकाकर्ता से अमेरिका, यूरोप और जापान के सिविल न्यूक्लियर दायित्व कानूनों का पूरा विवरण पेश करने को कहा है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका नीति नहीं बनाती, बल्कि उसकी संवैधानिक वैधता की जांच करती है. मामले की अगली सुनवाई अगले महीने होगी.
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सुमित कुमार News18 हिंदी में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं. वे पिछले 3 साल से यहां सेंट्रल डेस्क टीम से जुड़े हुए हैं. उनके पास जर्नलिज्म में मास्टर डिग्री है. News18 हिंदी में काम करने से पहले, उन्ह...और पढ़ें
First Published :
February 28, 2026, 07:32 IST

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