हर पार्टी की आन-बान-शान समोसा… देसी नहीं, बल्कि विदेशी! पहले इसमें आलू की जगह ये भरी जाती थी

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भारत में समोसा हर पार्टी और मेहमान नवाजी का हिस्सा बन गया है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह असल में हमारा नहीं है? समोसे की पैदाइश ईरान में हुई थी. दसवीं सदी की फारसी किताबों में एक तिकोनी पेस्ट्री का जिक्र है. इसमें कीमा, प्याज और मेवे भरे जाते थे. फारसी व्यापारी इसे लंबी यात्रा में खाते थे क्योंकि यह जल्दी खराब नहीं होता था. भारत में व्यापारियों के जरिए आने के बाद इसमें मसाले और आलू भर दिए गए. यही बन गया भारत का अपना समोसा. इंडो-इरानी मिलन का असर हमारे खाने में और भी दिखता है. मुगलई स्वाद जैसे बिरयानी, पुलाव और कबाब भी इसी रिश्ते की देन हैं. पुलाव फारसी पिलाफ से आया और गलावटी कबाब में फारसी ग्रिलिंग तकनीक और भारतीय मसालों का जादू है. खाने के साथ-साथ संगीत में भी असर दिखा. तेरहवीं सदी में दिल्ली सल्तनत में अमीर खुसरो ने फारसी संगीत और भारतीय ध्वनों को मिलाकर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत बनाया. उन्होंने सितार बजाने का तरीका भी विकसित किया. इस तरह भारत और ईरान की दोस्ती ने हमारे खाने और संगीत को अमर बना दिया. हमारी गंगा-जमुनी तहजीब इसी मिलन की देन है.

Last Updated:March 05, 2026, 16:23 ISTदेश

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