10000 KMPH रफ्तार वाली हाइपरसोनिक मिसाइलों के उड़ेंगे परखच्‍चे, DRDO बना रहा ऐसा ढाल, दुश्‍मन का वार होगा बेकार

1 hour ago

Next Geneation Missile Defence: मॉडर्न वॉरफेयर में जिस तरह से मिसाइल अटैक किए जा रहे हैं, उससे खुद को सुरक्षित रखना कतई आसान काम नहीं रह गया है. मिसाइल के भी एक से ज्‍यादा वर्जन डेवलप किए जा चुके हैं, जिन्‍हें सामान्‍य रडार सिस्‍टम से इंटरसेप्‍ट कर उन्‍हें न्‍यूट्रालाइज करना आसान काम नहीं रहा गया है. बैलिस्टिक मिसाइल के साथ ही क्रूज और मल्‍टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्‍हीकल्‍स (MIRV) जैसी तकनीक से लैस मिसाइल्‍स ड‍िफेंस सिस्‍टम के लिए चुनौती बन चुके हैं. इन खतरों से देश को सुरक्षित रखना आसान काम नहीं है. खासकर हाइपरसोनिक मिसाइल्‍स (जिनकी रफ्तार 6000 किलोमीटर प्रति घंटे से ज्‍यादा) बड़ी चुनौती है. इस कैटेगरी की मिसाइलों की रफ्तार इतनी ज्‍यादा होती है कि इन्‍हें सामान्‍य रडार सिस्‍टम या एयर डिफेंस सिस्‍टम से इंटरसेप्‍ट करना आसान काम नहीं है. इसे देखते हुए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) नया मिसाइल डिफेंस सिस्‍टम डेवलप कर रहा है, ताकि हाइपरसोनिक और MIRV एरियल थ्रेट को प्रभावी तरीके से निष्‍क्र‍िय किया जा सके. DRDO बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) के तहत ऐसे इंटरसेप्‍टर के डेवलपमेंट पर काम कर रहा है, जो हाइपरसोनिक ग्‍लाइड व्‍हीकल (HGV), हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल और MIRV जैसे अल्‍ट्रा मॉडर्न टेक्‍नोलॉजी से डेवलप थ्रेट से प्रभावी तरीके से निपट सके. DRDO खासकर हाइपरसोनिक खतरों से निपटने के लिए AD-AH और AD-AM इंटरसेप्‍टर डेवलप कर रहा है.

भारत की बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) क्षमता को अगली पीढ़ी की चुनौतियों के अनुरूप ढालने की दिशा में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने दो अत्याधुनिक इंटरसेप्टर परियोजनाओं (AD-AH और AD-AM) पर काम तेज कर दिया है. ये दोनों सिस्‍टम BMD प्रोग्राम के प्रस्तावित फेज-III का आधार स्तंभ होंगे और खास तौर पर हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल (HGV), हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल और मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल्स (MIRVs) जैसी उभरती खतरनाक खतरों से निपटने के लिए विकसित की जा रही हैं. क्षेत्रीय सुरक्षा में तेजी से बदलाव आ रहा है. पड़ोसी देशों द्वारा हाइपरसोनिक हथियारों के विकास ने मिसाइल रक्षा प्रणालियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. मैक-5 से अधिक गति, अनिश्चित मार्ग और वायुमंडल के भीतर लंबी उड़ान प्रोफाइल वाले ये हथियार पारंपरिक एग्‍जो-एटमॉस्फेरिक इंटरसेप्टर्स को चकमा देने में सक्षम माने जाते हैं. ऐसे में DRDO की नई परियोजनाएं भारत के डिफेंस स्‍ट्रक्‍चर में गुणात्मक छलांग के रूप में देखी जा रही हैं.

मिसाइल डिफेंस सिस्टम क्या होता है?
मिसाइल डिफेंस सिस्टम एक ऐसी सुरक्षा तकनीक है जो दुश्मन की बैलिस्टिक, क्रूज या ड्रोन आधारित मिसाइलों को हवा में ही पहचानकर नष्ट करने के लिए बनाई जाती है. इसका उद्देश्य शहरों, सैन्य ठिकानों और अहम बुनियादी ढांचे को हमलों से सुरक्षित रखना होता है.

यह सिस्टम कैसे काम करता है?
यह रडार, सैटेलाइट निगरानी और इंटरसेप्टर मिसाइलों के संयोजन से काम करता है. जैसे ही किसी दुश्मन मिसाइल का प्रक्षेपण होता है, रडार उसे ट्रैक करता है और इंटरसेप्टर मिसाइल को निर्देश देकर लक्ष्य से पहले ही उसे नष्ट कर देता है.

भारत का मिसाइल डिफेंस सिस्टम कितना सक्षम है?
भारत डबल फेज बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) सिस्टम विकसित कर रहा है, जिसमें पृथ्वी एयर डिफेंस (PAD) और एडवांस्ड एयर डिफेंस (AAD) इंटरसेप्टर शामिल हैं. डीआरडीओ के अनुसार, कई परीक्षण सफल रहे हैं और देश की राजधानी समेत प्रमुख क्षेत्रों की सुरक्षा की दिशा में इसे तैनात किया जा रहा है.

दुनिया में किन देशों के पास उन्नत मिसाइल डिफेंस सिस्टम हैं?
अमेरिका, रूस, इजराइल और चीन के पास अत्याधुनिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम हैं. इजराइल का ‘आयरन डोम’ सिस्टम कम दूरी की रॉकेट और मिसाइल हमलों को रोकने में बेहद प्रभावी माना जाता है, जबकि अमेरिका के पास THAAD और पैट्रियट सिस्टम हैं.

बदलते सुरक्षा माहौल में इसकी अहमियत क्यों बढ़ रही है?
क्षेत्रीय तनाव, परमाणु और मिसाइल तकनीक के प्रसार तथा ड्रोन हमलों की बढ़ती घटनाओं के चलते मिसाइल डिफेंस सिस्टम देशों की रणनीतिक सुरक्षा का अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य के युद्धों में यह तकनीक निर्णायक भूमिका निभाएगी.

क्‍या है AD-AH और AD-AM प्रोजेक्‍ट?

AD-AH को विशेष रूप से हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल्स को निष्क्रिय करने के लिए डिजाइन किया जा रहा है. HGV पहले ऊंचाई तक पहुंचते हैं और फिर वायुमंडल के भीतर तेज गति से ग्लाइड करते हुए दिशा बदल सकते हैं, जिससे इन्हें ट्रैक करना और इंटरसेप्ट करना बेहद कठिन होता है. वहीं, AD-AM का उद्देश्य हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइलों को मार गिराना है, जो पूरे समय अत्यधिक गति बनाए रखती हैं. दोनों इंटरसेप्टर्स में हाई-स्‍पीड, अत्यधिक तापमान साहने की क्षमता, बेहतर मैन्युवरबिलिटी और अपग्रेडेड गाइडेंस सिस्टम शामिल किए जाने की योजना है, ताकि चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी सटीक ‘हिट-टू-किल’ क्षमता हासिल की जा सके. ‘इंडियन डिफेंस रिसर्च विंग’ की रिपोर्ट के मुताबिक, कार्यक्रम से जुड़े सूत्रों ने बताया कि DRDO इन दोनों परियोजनाओं के प्रारंभिक विकास चरण में पहुंच चुका है. इनके स्केल मॉडल और विंड टनल ट्रायल वर्जन पिछले कुछ समय से सार्वजनिक मंचों पर दिखाई देते रहे हैं. खास तौर पर 2024 के अंत में हैदराबाद स्थित DRDO की हाइपरसोनिक विंड टनल सुविधा में इन उन्नत प्रणालियों के मॉडल प्रदर्शित किए गए थे, जिससे इनके एयरोडायनामिक डिजाइन और एंटी-हाइपरसोनिक भूमिकाओं के लिए किए जा रहे परीक्षणों की झलक मिली थी. यह संकेत देता है कि फेज-III BMD ढांचे के लिए आवश्यक तकनीकी आधार पहले ही तैयार किया जा रहा है.

Next Geneation Missile Defence: नेक्‍स्‍ट जेनरेशन बैल‍िस्टिक मिसाइल डिफेंस बदले वक्‍त की मांग के अनुरूप है. य‍ह आगे चलकर मिशन सुदर्शन चक्र का हिस्‍सा बन सकता है. (फाइल फोटो/Reuters)

नेक्‍स्‍ट जेनरेशन वेपन से निपटने में कारगर

DRDO के रोडमैप के अनुसार, AD-AH और AD-AM की डेवलपमेंटल फ्लाइट ट्रायल प्रोसेस 2030 के बाद शुरू होने की संभावना है. यह समयसीमा भारत की रणनीतिक योजना के अनुरूप है, जिसमें अगले दशक में हाइपरसोनिक और अत्यधिक मैन्युवर करने वाले हथियारों से सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है. इन सिस्‍टम्‍स के ऑपरेशन में आने के बाद भारत की मिसाइल रक्षा प्रणाली न केवल पारंपरिक बैलिस्टिक खतरों, बल्कि अगली पीढ़ी के जटिल हथियारों से भी निपटने में सक्षम होगी. यह पहल BMD कार्यक्रम के पहले दो चरणों में हासिल की गई उपलब्धियों पर आधारित है. फेज-I के तहत पृथ्वी डिफेंस व्हीकल (PDV) और एडवांस्ड एयर डिफेंस (AAD) जैसे इंटरसेप्टर्स को तैनात किया गया, जो लगभग 2,000 किलोमीटर रेंज तक की बैलिस्टिक मिसाइलों को निष्क्रिय करने में सक्षम हैं. इसके बाद फेज-II में और उन्नत क्षमताओं वाले सिस्टम विकसित किए गए. नवंबर 2022 में AD-1 इंटरसेप्टर का सफल परीक्षण हुआ और जुलाई 2024 में फेज-II का पूर्ण परीक्षण भी संपन्न हुआ. इसके साथ ही AD-2 इंटरसेप्टर का निर्माण कार्य जारी है, जिसे लंबी दूरी (करीब 5,000 किलोमीटर) की बैलिस्टिक मिसाइलों और MIRV से लैस खतरों के खिलाफ एग्‍जो-एटमॉस्फेरिक तथा लो-एग्‍जो-एटमॉस्फेरिक फेज में इंटरसेप्शन के लिए तैयार किया जा रहा है.

फेज-III क्‍यों है खास?

फेज-III के माध्यम से DRDO का उद्देश्य उन महत्वपूर्ण कमजोरियों को दूर करना है, जो मौजूदा मल्‍टीलेवल डिफेंस स्‍ट्रक्‍चर में हाइपरसोनिक और अत्यधिक मैन्युवर करने वाले हथियारों के सामने बनी हुई हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले वर्षों में हाइपरसोनिक हथियारों का प्रसार वैश्विक सुरक्षा संतुलन को प्रभावित कर सकता है, ऐसे में इनके खिलाफ प्रभावी रक्षा प्रणाली किसी भी देश की सामरिक स्थिरता के लिए अनिवार्य बन जाएगी. AD-AH और AD-AM के ऑपरेशन में आने से भारत को अपने रणनीतिक प्रतिष्ठानों, प्रमुख शहरी केंद्रों और राष्ट्रीय संपत्तियों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत और भरोसेमंद ढाल मिलेगी. यह न केवल देश की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाएगा, बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर भारत की तकनीकी और सैन्य विश्वसनीयता को भी मजबूत करेगा. तेजी से बदलते मिसाइल वॉर के युग में DRDO की ये पहल भारत को अगली पीढ़ी की रक्षा क्षमताओं की दौड़ में आगे बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही हैं.

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