Diego Garcia Controversy: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अभी ग्रीनलैंड के मुद्दे पर तीखे बयान दे ही रहे थे कि इसी बीच उन्होंने डिएगो गार्सिया मिलिट्री बेस पर भी टिप्पणी कर दी है. ट्रंप ने कहा कि वो डिएगो गार्सिया मिलिट्री बेस का कंट्रोल मॉरीशस को सौंपने और फिर उसे वापस लीज पर लेने की ब्रिटिश योजना के खिलाफ हैं, उन्होंने सवाल किया कि लंदन उस चीज को क्यों छोड़ेगा जिसे वो बहुत महत्वपूर्ण और रणनीतिक संपत्ति बताता है. ऑफिस में वापसी के एक साल पूरे होने पर व्हाइट हाउस में मीडिया से बात करते हुए, ट्रंप ने कहा कि वह हिंद महासागर में एक संयुक्त अमेरिका-ब्रिटेन मिलिट्री बेस 'डिएगो गार्सिया' से जुड़े इस अरेंजमेंट का समर्थन नहीं करते हैं. उन्होंने कहा कि मैं इसके खिलाफ हूं और कहा कि यह इलाका दुनिया का एक काफी महत्वपूर्ण इलाका है.'
ट्रंप ने कहा कि पहले की चर्चाओं में लगता है कि मालिकाना हक जारी रखने की बात थी, लेकिन उन्होंने तर्क दिया कि मौजूदा प्रस्ताव एक लीज और बिक्री स्ट्रक्चर जैसा है. उन्होंने कहा,'जब वे इसे मूल रूप से करने वाले थे तो वे मालिकाना हक के किसी कॉन्सेप्ट के बारे में बात कर रहे थे अब वे असल में सिर्फ लीज पर देना और बेचना चाहते हैं और मैं इसके खिलाफ हूं.' उन्होंने इस कदम के लिए ब्रिटेन के मकसद पर सवाल उठाया. ट्रंप ने कहा,'मुझे नहीं पता कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं, क्या उन्हें पैसे की जरूरत है?'
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चागोस द्वीप पर है डिएगो गार्सिया
ट्रंप की बयानबाजी के बाद अब हम इस द्वीप और सैन्य बेस के बारे में थोड़ा डिटेल में समझते हैं. डिएगो गार्सिया हिंद महासागर के चागोस द्वीपसमूह का सबसे बड़ा और दक्षिण में स्थित द्वीप (एटोल) है. यह समुद्र के बीचों-बीच मौजूद है और भारत से लगभग 1700 किमी दक्षिण में है. नीचे आप मैप में देख सकते हैं. चागोस द्वीपसमूह मूल रूप से मॉरीशस का हिस्सा था. इसके लिए आज भी मॉरीशस और अंतरराष्ट्रीय अदालतों में कानूनी लड़ाई चलती रही है. यहां तक कि UN कोर्ट ने भी इसपर मॉरिशस का हक बताया है. दरअसल 1965 में जब मॉरीशस को आजादी मिली तो ब्रिटेन ने हिंद महासागर में मौजूद चागोस द्वीपसमूह को अलग कर दिया. इसी का एक हिस्सा है डिएगो गार्सिया.
1960 में लोगों को निकाला
1960 के दशक में ब्रिटेन ने स्थानीय लोगों को निकाल दिया और इस द्वीप को ब्रिटेन के 'British Indian Ocean Territory' का हिस्सा बनाया. फिर अमेरिका और ब्रिटेन ने 1970 के आसपास एक संयुक्त सैन्य अड्डा स्थापित किया. इस इलाके के बदले यूके अमेरिका से कोई किराया भी नहीं लेता है. यूं समझिए अमेरिका यहां से एशिया खासतौर से चीन, ईरान-इराक, अफ्रीका समेत एक बड़े भूभाग में किसी भी एक्शन के लिए तैयार रहता है.
अमेरिका क्यों कर रहा है विरोध
अब अगर बात करें कि ट्रंप ब्रिटेन के इस फैसले क्यों नाराज हैं तो इसकी वजह है कि अगर मालिकाना हक बदला या लीज की शर्तें ढीली हुईं तो अमेरिका की पकड़ कमजोर होगी और यहां पर अमेरिकी पकड़ कमजोर होने का मतलब है कि अमेरिका की एशिया, अफ्रीका, मिडिल ईस्ट में पकड़ कमजोर हो जाएगी.
भारत-चीन के लिए दिक्कत या राहत?
यहां से अमेरिका की दादागिरी खत्म होना भारत के लिए भी राहत की बात होगी. 1971 में जब भारत और पाकिस्तान में जंग चल रही थी तो तब भारतीय रणनीतिकारों ने डिएगो गार्सिया में अमेरिका की मौजूदगी पर चिंता जाहिर की थी. क्योंकि उन दिनों अमेरिका पाकिस्तान के साथ खड़ा हुआ था. ऐसे में खदशा था कि वह अपना सैन्य बेड़ा पाकिस्तान की मदद के लिए भेज सकता है. युद्ध में भारत की जीत हुई लेकिन वो खतरा कहीं न कहीं बना रहता है. हालांकि भारत का इस मुद्दे पर कोई बयान नहीं है लेकिन स्वाभाविक तौर पर भारत मॉरिशस के ही साथ है क्योंकि दोनों देशों के रिश्ते बहुत बेहतर हैं. यही समस्या चीन की भी है, कि दोनों देश अपने आसपास अमेरिकी दखल अंदाजी को बर्दाश्त नहीं करना चाहते. इसका एक उदाहरण 1971 की जंग में देखने को मिला था.

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