अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की नीतियों ने अमेरिका को दुनिया से अलग-थलग करना शुरु कर दिया है. नाटो के साथ सौतेले व्यवहार की वजह से जर्मनी जैसे पुराने साथी अलग जा रहे हैं. भारत ने भी ट्रंप प्रायोजित आयोजनों और प्रस्तावों से फासला बना रखा है. ट्रंप जिस नई दुनिया को बनाना चाहते हैं, उससे भारत समेत ज्यादातर बड़े देशों ने दूरी बना ली है.
आपको याद होगा जब 22 जनवरी को स्विटजरलैंड के दावोस में ट्रंप द्वारा प्रस्तावित गाजा पीस बोर्ड की बैठक हुई थी. इसमें अरब देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ पाकिस्तान भी शामिल हुआ था. भारत को भी बैठक में शामिल होने का प्रस्ताव मिला था लेकिन कोई भी प्रतिनिधि वहां पर नहीं गया. यानी भारत ने ट्रंप के इस आयोजन से दूरी बनाई है. भारत के इस फैसले के पीछे सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है ट्रंप का वो प्लान जिसका मकसद दुनिया में अपनी धाक जमाना है.
आमतौर पर किसी भी संघर्ष या टकराव में युद्धविराम संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में किया जाता है लेकिन ट्रंप ने गाजा के युद्धविराम से संयुक्त राष्ट्र को दूर रखा था. यानी ट्रंप ने अपना कद संयुक्त राष्ट्र के ऊपर दिखाया था. भारत ने संयुक्त राष्ट्र के सम्मान को ऊपर रखते हुए बैठक में ना जाने का फैसला किया है. इतना ही नहीं गाजा जैसे क्षेत्रों में पुनर्वास जैसी प्रक्रिया भी संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों के अधीन की जाती हैं लेकिन गाजा को दोबारा बसाने के लिए ट्रंप ने प्राइवेट कंपनियों और पक्षों को शामिल कर लिया है. भारत ने बैठक में ना जाकर ये संदेश दिया है कि ग्लोबल संस्थाओं को नकारने वाली ट्रंप नीति भारत को स्वीकार नहीं है.
गाजा के युद्ध को रुकवाने का क्रेडिट लेने के लिए ट्रंप हर हद पार करने के लिए तैयार हैं. गाजा को दोबारा बसाने की प्रक्रिया में अपने दामाद को शामिल करके ट्रंप ने परिवारवाद को बढ़ावा दिया है. ऐसे कदम और फैसले अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का खुला उल्लंघन है. ट्रंप की इसी जिद को भारत ने स्वीकार करने से इंकार किया है. अब हम आपके सामने भारत के इस कदम के पीछे छिपी दूसरी बड़ी वजह बताने जा रहे हैं. ये कारण आपको भी ध्यान से देखना चाहिए क्योंकि इसका कनेक्शन जुड़ा है भारत से नफरत करने वाले पाकिस्तान से.
ट्रंप ने गाजा पीस बोर्ड में पाकिस्तान को शामिल किया है. आतंक प्रायोजित करने वाले मुल्क का किसी शांति प्रक्रिया में शामिल होना बताता है कि इस कथित पीस बोर्ड को लेकर ट्रंप खुद गंभीर नहीं है. पाकिस्तान की मौजूदगी दूसरी बड़ी वजह रही, जिसके चलते भारत ने इस आयोजन से दूरी बनाई है.
पाकिस्तान में फिलिस्तीन के नाम पर सालों से नारे लगाए जाते रहे हैं लेकिन इसी पाकिस्तान ने ट्रंप के उस बोर्ड में अपना नाम लिखवा दिया जिसे लेकर फिलिस्तीनी भी उत्साहित नहीं हैं.
हिंदी की एक कहावत है- अंधा बांटे रेवड़ी फिर भी अपनों को ही दे. ये कहावत ऐसे व्यक्ति के लिए इस्तेमाल की जाती है जिसके हाथ में अधिकार आता है तो वो अपनों पर ही मेहरबानी करता है. न्यायसंगत कदमों को नकार देता है. गाजा बोर्ड ऑफ पीस का ढांचा देखकर आपको पता चलेगा कि ट्रंप ने यहां अपनों को ही रेवड़ी बांटी है. ट्रंप ने इंसाफ नहीं किया है.
ट्रंप ने इस कथित बोर्ड में इजरायल को तो शामिल किया है लेकिन जिस गाजा के नाम पर पीस बोर्ड बनाया गया है उसका कोई वरिष्ठ प्रतिनिधि इस बोर्ड में नहीं शामिल किया गया है. वेस्ट बैंक में मौजूद फिलिस्तीनी अथॉरिटी ने बोर्ड में शामिल होने की अपील की थी लेकिन फिलिस्तीनी अथॉरिटी को भी बोर्ड में जगह नहीं दी है. गाजा पीस बोर्ड के लिए जो नियम कायदे तय किए गए हैं उनके लिए भी ट्रंप ने इजरायल से ही बात की थी. यहां भी गाजा के किसी प्रतिनिधि को बात करने के लिए नहीं बुलाया गया था.
ट्रंप का यही पक्षपात तीसरी वजह है जिसके चलते भारत ने गाजा पीस बोर्ड से दूरी बना रखी है. भारत हमेशा इस नीति का पक्षधर रहा है कि गाजा का मुद्दा फिलिस्तीन और इजरायल का द्विपक्षीय मुद्दा है. इसलिए इन दोनों पक्षों को ही कोई फैसला लेने का अधिकार है लेकिन ट्रंप ने अपनी ताकत का इस्तेमाल करके फिलिस्तीनी पक्ष की अनदेखी की है जो भारत को किसी सूरत में स्वीकार नहीं है. भारत ने गाजा पीस बोर्ड से दूरी बनाकर ना सिर्फ अपनी मूल नीति का पालन किया है बल्कि ट्रंप को ये भी बता दिया है कि उनकी मनमर्जी दुनिया के हर हिस्से पर नहीं चलेगी. भारत के इसी मजबूत रूख की वजह से अब दुनिया में ट्रंप विरोधी खेमा भारत के इर्द गिर्द लामबंद होने लगा है. अब हम आपको दुनिया की इसी भारत केंद्रित नीति की जानकारी देने जा रहे हैं.
ट्रंप से आर्थिक और सामरिक मुद्दों पर तकरार के बीच यूरोपीयन यूनियन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेयर 26 जनवरी को भारत आ रही हैं. 27 जनवरी को उर्सुला की मौजूदगी में ही भारत और यूरोपीयन यूनियन के बीच सामरिक समझौते पर दस्तखत होंगे. उर्सुला के बाद टैरिफ के मुद्दे पर ट्रंप का खुलकर विरोध करने वाले ब्राजील के राष्ट्रपति लूला डि सिल्वा भी भारत आएंगे. ब्राजील के राष्ट्रपति का भारत दौरा 3 दिन का होगा और इस यात्रा में दोनों देशों के बीच अहम समझौते होंगे.
इन अहम नेताओं से पहले ट्रंप के पारंपरिक प्रतिद्वंदी रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी भारत आ चुके हैं. नाटो के मुद्दे पर ट्रंप से हुई खटपट के बाद जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज भी भारत का दौरा कर चुके हैं. यानी पश्चिम से लेकर मध्य यूरोप के देश ये स्वीकार रहे हैं कि ट्रंप की दबंगई को जवाब देने की तैयारी भारत के इर्द गिर्द ही की जाएगी.
ट्रंप ने गाजा के लिए जो पीस बोर्ड बनाया है उसमें 20 देशों ने शामिल होने पर सहमति दी है. गौर से देखेंगे तो पता चलेगा कि इन 20 देशों में से 10 इस्लामिक मुल्क हैं. इस वजह से सवाल उठता है कि गाजा पीस बोर्ड बनाने चले ट्रंप कहीं मुनीर के प्रोजेक्ट इस्लामिक नाटो तो नहीं पूरा कर रहे हैं.

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