Ex नेवी चीफ को SIR का नोटिस, 82 की उम्र में 18 KM दूर बुलाने पर भड़के एडमिरल अरुण प्रकाश

5 hours ago

नई दिल्ली: देश में वोटर लिस्ट की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर चल रही बहस के बीच अब एक नया मोड़ आ गया है. इस बार सवाल उठाने वाले कोई आम नागरिक नहीं, बल्कि भारतीय नौसेना के पूर्व प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश हैं. 82 साल की उम्र में पहचान सत्यापन के लिए 18 किलोमीटर दूर बुलाए जाने पर उन्होंने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सार्वजनिक रूप से सवाल खड़े कर दिए हैं.

यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि एडमिरल अरुण प्रकाश न सिर्फ देश के पूर्व नेवी चीफ रह चुके हैं, बल्कि 1971 युद्ध के वीरता पुरस्कार विजेता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई अहम पदों पर काम कर चुके हैं. ऐसे में SIR नोटिस को लेकर उनकी नाराजगी ने SIR प्रक्रिया की व्यावहारिकता पर नई बहस छेड़ दी है.

I neither need, nor have ever asked for any special privileges since retirement 20 yrs ago. My wife & I had filled the SIR forms as reqd & were pleased to see our names figured in the Goa Draft Electoral Roll 2026 on the EC website. We will, however comply with EC notices. 1/2 https://t.co/l5iqtjoO8D

क्या है पूरा मामला?

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR के तहत चुनाव आयोग वोटर लिस्ट को अपडेट कर रहा है. इसी प्रक्रिया में पूर्व नेवी चीफ एडमिरल अरुण प्रकाश को भी अपनी पहचान स्थापित करने के लिए एक बैठक में उपस्थित होने का नोटिस मिला. नोटिस में उन्हें और उनकी पत्नी को अलग-अलग तारीखों पर 18 किलोमीटर दूर बुलाया गया था. इस पर एडमिरल प्रकाश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर खुलकर नाराजगी जताई और प्रक्रिया की खामियों की ओर इशारा किया.

SIR प्रक्रिया पर एडमिरल प्रकाश ने क्या कहा?

एडमिरल अरुण प्रकाश ने अपने पोस्ट में साफ शब्दों में कहा कि अगर SIR फॉर्म नागरिकों से जरूरी जानकारी नहीं ले पा रहे हैं, तो उन्हें बदला जाना चाहिए. उन्होंने यह भी बताया कि बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) तीन बार उनके घर आया था और उसी समय अतिरिक्त जानकारी ली जा सकती थी. उन्होंने लिखा कि वे और उनकी पत्नी 82 और 78 वर्ष के हैं और इसके बावजूद उन्हें अलग-अलग तारीखों पर दूर बुलाया जाना असुविधाजनक है. साथ ही यह नोटिस प्रक्रिया की संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़े करता है.

चुनाव आयोग के मुताबिक SIR अभियान वोटर लिस्ट को सटीक बनाने के लिए जरूरी है.

सोशल मीडिया पर क्यों भड़का गुस्सा?

एडमिरल प्रकाश की पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं. कई लोगों ने इसे चुनाव आयोग की बड़ी चूक बताया. यूजर्स ने यह भी याद दिलाया कि एडमिरल प्रकाश ने चार दशक से ज्यादा समय तक देश की सेवा की है और INS विराट जैसे विमानवाहक पोत की कमान संभाली है. कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि आयोग को उनके घर पर ही BLO भेजकर सत्यापन करना चाहिए था.

विशेष सुविधा लेने से क्यों किया इनकार?

जब सोशल मीडिया पर यह सुझाव दिया गया कि चुनाव आयोग को उनके लिए विशेष व्यवस्था करनी चाहिए थी, तो एडमिरल अरुण प्रकाश ने इसे विनम्रता से ठुकरा दिया. उन्होंने साफ कहा कि उन्होंने कभी किसी तरह की विशेष सुविधा नहीं मांगी और न ही चाहते हैं. उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने और उनकी पत्नी ने तय प्रक्रिया के तहत SIR फॉर्म भरे थे और उन्हें यह देखकर खुशी हुई थी कि उनके नाम गोवा की ड्राफ्ट इलेक्टोरल रोल 2026 में शामिल हैं. इसके बावजूद वे चुनाव आयोग के नोटिस का पालन करेंगे.

एडमिरल अरुण प्रकाश का रिकॉर्ड क्यों अहम है?

एडमिरल अरुण प्रकाश भारतीय नौसेना के उन अधिकारियों में रहे हैं, उनका करियर असाधारण रहा है. वे पेशे से नौसैनिक पायलट रहे और 1971 के युद्ध में भारतीय वायुसेना के फाइटर स्क्वाड्रन के साथ उड़ान भरते हुए वीर चक्र से सम्मानित हुए. नेवी चीफ के रूप में उनके कार्यकाल में नौसेना की रणनीति, सिद्धांत, अंतरराष्ट्रीय समुद्री सहयोग और आधुनिकीकरण को नई दिशा मिली. रिटायरमेंट के बाद भी वे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य रहे और नेशनल मैरीटाइम फाउंडेशन के अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा चुके हैं.

SIR अभियान क्यों चलाया जा रहा है?

चुनाव आयोग के मुताबिक SIR अभियान वोटर लिस्ट को सटीक बनाने के लिए जरूरी है. तेजी से हो रहे शहरीकरण, लगातार माइग्रेशन, नए मतदाताओं का जुड़ना, मौतों की सूचना न मिलना और अवैध विदेशी नागरिकों के नाम शामिल होने जैसी वजहों से यह प्रक्रिया शुरू की गई है. BLO घर-घर जाकर दस्तावेजों की जांच कर रहे हैं, ताकि योग्य मतदाताओं को जोड़ा जा सके और अयोग्य नाम हटाए जा सकें.

यह विवाद क्यों अहम है?

एडमिरल अरुण प्रकाश का मामला यह सवाल उठाता है कि क्या SIR जैसी प्रक्रियाओं में बुजुर्गों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए पर्याप्त संवेदनशीलता बरती जा रही है. यह बहस अब केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरी प्रणाली की व्यवहारिकता पर चर्चा का विषय बन गई है.

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