भारत ने जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर सावलकोट जलविद्युत परियोजना पर काम शुरू कर दिया है. इस मेगा प्रोजेक्ट की लागत करीब 5,129 करोड़ रुपये है. खास बात यह है कि सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को ठंडे बस्ते में डालने के बाद यह नरेंद्र मोदी सरकार की मंजूरी पाने वाली पहली नई बड़ी जलविद्युत परियोजना है.
News18 को नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (NHPC) के ऐसे दस्तावेज मिले हैं, जिनके मुताबिक 5 फरवरी को कंपनियों को इस परियोजना के निर्माण के लिए आमंत्रित किया गया है. यह परियोजना जम्मू-कश्मीर के उधमपुर और रामबन जिलों में स्थित होगी. सावलकोट परियोजना दो चरणों में बनेगी- पहले चरण में 1,406 मेगावाट और दूसरे चरण में 450 मेगावाट बिजली उत्पादन किया जाएगा. यह परियोजना चिनाब नदी पर बागलीहार प्रोजेक्ट के नीचे और सलाल डैम के ऊपर स्थित होगी. यह एक ‘रन ऑफ द रिवर’ परियोजना होगी, यानी इसमें बड़े पैमाने पर पानी का भंडारण नहीं किया जाएगा.
तेजी से बढ़ेगा डैम का काम
दस्तावेजों के मुताबिक, परियोजना को जल्द से जल्द पूरा करने के लिए निर्माण की योजना और उपकरणों का चयन किया गया है. पिछले साल अक्टूबर में पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति ने इस 1,856 मेगावाट क्षमता वाली परियोजना को मंजूरी दी थी. अब NHPC ने इसके निर्माण के लिए बोलियां आमंत्रित कर दी हैं, जिससे साफ है कि सरकार इसे तेजी से आगे बढ़ाना चाहती है.
दस्तावेजों में यह भी बताया गया है कि शुरुआती तैयारियों के बाद मुख्य निर्माण कार्य शुरू होगा. परियोजना क्षेत्र में भूमिगत काम पूरे 12 महीने चल सकेगा, जबकि सतही काम मानसून के बाहर पूरी गति से और मानसून के दौरान 50 प्रतिशत रफ्तार से होगा. अनुमान है कि इस परियोजना को पूरा होने में करीब 9 साल लग सकते हैं.
चिनाब पर बन रहे चार बड़े डैम
इससे पहले News18 ने रिपोर्ट किया था कि केंद्र सरकार ने चिनाब नदी पर चार बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं को तेजी से पूरा करने के सख्त निर्देश दिए हैं. अधिकारियों को पाकल डुल और किरू परियोजनाएं दिसंबर 2026 तक, क्वार परियोजना मार्च 2028 तक और रतले बांध के निर्माण में तेजी लाने को कहा गया है.
इनमें सबसे अहम परियोजना किश्तवाड़ जिले की पाकल डुल जलविद्युत परियोजना है. इसकी क्षमता 1,000 मेगावाट है और यह चिनाब बेसिन की सबसे बड़ी परियोजना है. इसकी ऊंचाई 167 मीटर है, जो इसे भारत का सबसे ऊंचा बांध बनाती है. यह भारत की पहली स्टोरेज परियोजना है जो ऐसी पश्चिमी नदी पर बनी है, जिसका पानी पाकिस्तान में जाता है. इस परियोजना का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मई 2018 में किया था.
अब जबकि सिंधु जल संधि प्रभावी रूप से स्थगित है, केंद्र सरकार ने आदेश दिया है कि पाकल डुल परियोजना को दिसंबर 2026 तक चालू किया जाए. इसके शुरू होने से भारत को न सिर्फ बिजली उत्पादन का फायदा मिलेगा, बल्कि पानी के बहाव को नियंत्रित करने की क्षमता भी मिलेगी, जिसे लेकर पाकिस्तान लंबे समय से चिंतित रहा है.
इसके साथ ही किरू परियोजना भी किश्तवाड़ जिले में ही स्थित है. यह 135 मीटर ऊंचा एक रन ऑफ द रिवर बांध है. इसकी रणनीतिक अहमियत इस बात में है कि यह चिनाब पर बनने वाली परियोजनाओं की एक श्रृंखला का हिस्सा है. केंद्र सरकार ने किरू परियोजना के लिए भी दिसंबर 2026 की समय-सीमा तय की है.
तीसरी बड़ी परियोजना क्वार है, जो चिनाब पर ही एक और रन ऑफ द रिवर बांध है और इसकी ऊंचाई 109 मीटर है. जनवरी 2024 में इस परियोजना के लिए चिनाब नदी का सफलतापूर्वक मार्ग परिवर्तन किया गया था, जिस पर पाकिस्तान की करीबी नजर रही. अब केंद्र ने इसे मार्च 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य तय किया है.
इसके अलावा रतले डैम भी काफी विवादित रही है. यह 850 मेगावाट की परियोजना है और इसमें 133 मीटर ऊंचा बांध बनाया जा रहा है. पाकिस्तान ने वर्षों से इसके डिजाइन, खासकर स्पिलवे को लेकर आपत्ति जताई है. हाल ही में ऊर्जा मंत्री ने इस परियोजना के कंक्रीटिंग कार्य की आधारशिला रखी, जिससे साफ है कि इसे भी तेज़ी से आगे बढ़ाया जा रहा है. 2024 में चिनाब का पानी इस परियोजना के लिए सुरंगों से मोड़ा गया था और उम्मीद है कि 2028 तक बांध तैयार हो जाएगा.
इनके अलावा भारत दुलहस्ती स्टेज-2 परियोजना पर भी आगे बढ़ रहा है. इसे पिछले साल दिसंबर में पर्यावरण मंत्रालय की समिति से मंजूरी मिली थी. दुलहस्ती-1 पहले से चालू है. पाकिस्तान ने इस मंजूरी पर भी यह कहते हुए आपत्ति जताई है कि उसे इसकी जानकारी नहीं दी गई, लेकिन भारत ने इस आपत्ति को खारिज कर दिया है.
पाकिस्तान क्यों चिंतित है?
चिनाब नदी सिंधु बेसिन का हिस्सा है, जो पाकिस्तान की जीवनरेखा मानी जाती है. पाकिस्तान के करीब 75 प्रतिशत पानी उन पश्चिमी नदियों से आता है, जो भारत से होकर वहां जाती हैं. पाकिस्तान की 90 प्रतिशत से ज्यादा खेती इसी बेसिन पर निर्भर है और उसके लगभग सभी बड़े बांध और नहरें इसी प्रणाली से जुड़ी हैं. सीधे शब्दों में कहें तो पाकिस्तान के 10 में से 9 लोग ऐसे पानी पर निर्भर हैं, जो पहले भारत की जमीन से होकर बहता है.
हाल ही में पहलगाम हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि से जुड़ी सभी बैठकों और प्रक्रियाओं में हिस्सा लेना छोड़ दिया है, जिससे पाकिस्तान की चिंता और बढ़ गई है.

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