19 जनवरी को तीन घटे के लिए संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान भारत आए. तब उन्होंने और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए. इसी के तहत दोनों देशों में डिजिटल एंबेसी खोलने की बात भी है. आपके दिमाग में भी सवाल उठ रहा होगा कि ये कैसी एंबेसी है. क्या ये पारंपरिक दूतावास ही हैं या उनसे बिल्कुल अलग. ये क्यों खोले जाएंगे. इनमें क्या होगा.
भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच जिस डिजिटल एंबेसी या डेटा एंबेसी की चर्चा हो रही है, वह पारंपरिक दूतावासों से बिल्कुल अलग है. यह कोई ईट-पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि एक सुरक्षित डिजिटल किला है. भारत ने अपने 2023-24 के बजट में भी डेटा एंबेसी का जिक्र किया था. अब UAE के साथ इसे हकीकत में बदलने की ओर बढ़ रहा है.
डिजिटल एंबेसी क्या होती है?
सरल शब्दों में डिजिटल एंबेसी एक ऐसा डेटा सेंटर होता है जो किसी दूसरे देश की धरती पर स्थित होता है, लेकिन उस पर अधिकार और कानून आपके अपने देश का चलता है.
जिस तरह पारंपरिक दूतावास की जमीन उस देश का हिस्सा मानी जाती है जिसका वह दूतावास है, ठीक वैसे ही डिजिटल एंबेसी में रखा डेटा भी मेजबान देश के कानूनों से मुक्त होता है. उस देश की मिल्कियत होती है, जिसका ये होता है.
क्यों डिजिटल एंबेसी समय की जरूरत
यदि किसी देश पर बड़ा साइबर हमला हो जाए, कोई प्राकृतिक आपदा आ जाए या युद्ध की स्थिति पैदा हो जाए, तो उसका जरूरी डेटा जैसे नागरिकों के रिकॉर्ड, बैंकिंग डेटा, सरकारी फाइलें दूसरे देश में सुरक्षित रहें. वहीं से डिजिटल सेवाएं चालू रखी जा सकें.
इसे भी डिप्लोमेटिक प्रोटेक्शन
डेटा एंबेसी यानि डिजिटल एंबेसी में रखे गए सर्वर और डेटा को ‘डिप्लोमैटिक प्रोटेक्शन’ मिलता है. मेजबान देश की सरकार उसे न तो जब्त कर सकती है और न ही बिना अनुमति के देख सकती है.
भारत और यूएई ऐसा क्यों कर रहे
यह दोनों देशों के बीच गहरे भरोसे का प्रतीक है. भारत अपना कुछ महत्वपूर्ण डेटा UAE में सुरक्षित रख सकता है. बदले में UAE भारत में अपना डेटा सेंटर बना सकता है. इससे साइबर सुरक्षा बढ़ेगी और डिजिटल सेवाओं में कभी रुकावट नहीं आएगी. भारत अपनी ‘AI India Mission’ के तहत सुपरकंप्यूटिंग क्लस्टर बनाने में भी UAE का सहयोग ले रहा है.
UAE भारत में अपना पहला डेटा एंबेसी स्थापित करने की योजना बना रहा है, शायद आंध्र प्रदेश में. विदेश सचिव विक्रम मिसरी के अनुसार, यह साझीदारी डेटा सुरक्षा और साइबर खतरों से निपटने के लिए नियम-कानून विकसित करेगी.
पारंपरिक दूतावास से क्या कोई रिश्ता
डिजिटल एंबेसी का पारंपरिक दूतावास के कामकाज से सीधा लेना-देना नहीं है. पारंपरिक दूतावास राजनयिक संबंध, वीजा सेवाएं, नागरिक सहायता और व्यापारिक संपर्कों के लिए भौतिक कार्यालय होते हैं. डिजिटल एंबेसी केवल डेटा सुरक्षा और संप्रभु सूचनाओं के भंडारण पर केंद्रित होती है.
पारंपरिक दूतावास मानवीय सेवाएं प्रदान करते हैं, जैसे पासपोर्ट नवीनीकरण या कांसुलर सहायता. डिजिटल एंबेसी साइबर सुरक्षा के लिए डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग करती है, जिसमें कोई भौतिक उपस्थिति या राजनयिक स्टाफ नहीं होता.
क्या भारत अन्य देशों में भी ऐसा करेगा
फिलहाल तो भारत ने केवल संयुक्त अरब अमीरात के साथ ही डिजिटल एंबेसी समझौता किया है. अन्य देशों के साथ डिजिटल सहयोग मौजूद है, लेकिन डिजिटल दूतावास बनाने संबंधी कोई बात नहीं है.
कितने देशों में चल रही है ऐसी एंबेसी
दुनिया भर में यह एक बहुत ही नया कॉन्सेप्ट है. अभी बहुत देशों ने इसे अपनाया है. एस्तोनिया यह दुनिया का पहला देश है जिसने 2017 में लक्ज़मबर्ग में अपनी डेटा एंबेसी स्थापित की थी. मोनाको ने भी 2021 में लक्ज़मबर्ग के साथ समझौता करके अपनी ‘ई-एंबेसी’ बनाई है.बहरीन ने अपने यहां डेटा एंबेसी होस्ट करने के लिए कानून बनाए हैं.
एस्तोनिया की डिजिटल एंबेसी
मोनाको, एस्टोनिया और बहरीन में ‘डिजिटल एंबेसी’ का इंफ्रास्ट्रक्चर और उनके काम करने का तरीका तकनीक और कानून का एक अनूठा संगम है. एस्तोनिया ने 2017 में लक्ज़मबर्ग में अपनी डेटा एंबेसी स्थापित की थी. यह लक्ज़मबर्ग के एक सरकारी डेटा सेंटर के भीतर स्थित है, जिसे ‘टियर 4’ सुरक्षा रेटिंग प्राप्त है. एस्टोनिया के अपने सर्वर वहां रखे गए हैं.
वियना कन्वेंशन के तहत इस डेटा सेंटर को वही इम्युनिटी और सुरक्षा मिली हुई है जो एक भौतिक दूतावास को मिलती है. लक्ज़मबर्ग की पुलिस या अधिकारी एस्टोनिया की अनुमति के बिना इन सर्वरों को छू भी नहीं सकते. एस्टोनिया के 10 सबसे महत्वपूर्ण डेटाबेस जैसे भूमि रजिस्टर, नागरिक रजिस्टर, बिजनेस रजिस्टर और पेंशन डेटा यहां रीयल-टाइम में सिंक होते हैं.
यदि एस्टोनिया पर कोई बड़ा साइबर हमला या भौतिक हमला होता है, तो वह लक्ज़मबर्ग के इन सर्वरों से अपनी पूरी सरकार और डिजिटल सेवाएं चला सकता है.
मोनाको की डिजिटल एंबेसी
मोनाको ने भी लक्ज़मबर्ग के साथ समझौता करके 2021 में अपनी ‘ई-एंबेसी’ शुरू की. लक्ज़मबर्ग के बिसेन में स्थित एक सुरक्षित डेटा सेंटर में मोनाको के ‘सोवरेन क्लाउड’ का एक ‘डिजिटल ट्विन’ यानी हुबहू नकल रखी गई है.
सुरक्षा मानकों के अनुसार, मुख्य डेटा और बैकअप के बीच कम से कम 120-150 किमी की दूरी होनी चाहिए. मोनाको एक बहुत छोटा देश है, इसलिए उसने 1000 किमी दूर लक्ज़मबर्ग को सुरक्षित स्थान के रूप में चुना.
मोनाको की संसद ने विशेष कानून पारित किया है जिससे लक्ज़मबर्ग में रखे इस डेटा पर भी मोनाको का ही कानून लागू होता है. यदि वहां कोई साइबर हमला होता है, तो मोनाको के अधिकारियों के पास दोषियों के खिलाफ मुकदमा चलाने का अधिकार है.
बहरीन की डेटा एंबेसी
बहरीन का मॉडल थोड़ा अलग है; वह खुद को एक ‘डिजिटल एंबेसी हब’ के रूप में विकसित कर रहा है. बहरीन ने 2018 में ‘क्लाउड लॉ’ लागू किया. इसके तहत विदेशी सरकारों और निजी संस्थाओं को बहरीन के डेटा सेंटर्स में अपना डेटा रखने के लिए आमंत्रित किया जाता है.
यदि कोई देश बहरीन के डेटा सेंटर में अपनी ‘डिजिटल एंबेसी’ बनाता है, तो उस डेटा पर बहरीन का नहीं, बल्कि उसी देश का कानून लागू होगा जिसका वह डेटा है.
बहरीन के कानून के अनुसार, स्थानीय अदालतें या अधिकारी उन विदेशी सर्वरों के खिलाफ कोई आदेश जारी नहीं कर सकते. यह मॉडल डेटा सुरक्षा और संप्रभुता का भरोसा देकर विदेशी निवेश को आकर्षित करता है.

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