नई दिल्ली. डोनाल्ड ट्रंप जबसे अमेरिका के राष्ट्रपति बने हैं, काफी आक्रामक हो गए हैं. अगर आपको लगता है कि ट्रंप का यह आक्रामक रवैया उनके अक्खड़ व्यवहार का हिस्सा है तो पूरी तरह गलत हैं. जरा गहराई से सोचेंगे तो साफ दिख जाएगा कि ट्रंप का यह पालगपन अमेरिका की किस्मत से जुड़ा है और इसके तार सीधे दूसरे विश्व युद्ध तक जाते हैं. लग रहा है कि आपका दिमाग और उलझता जा रहा है कि आखिर ऐसी कौन सी चाल अमेरिका चल रहा, जो दूसरे विश्व युद्ध से उसे जोड़ता है. इस पहेली को सुलझाने से पहले यह दोहराना जरूरी है कि ट्रंप ने पहले टैरिफ वॉर शुरू करके दुनिया पर दबाव बनाया और उससे बात नहीं बनी तो सीधे युद्ध पर उतर आए.
अमेरिका ने पहले इजराइल के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया, फिर वेनेजुएला में तख्ता पलट करके अपनी सत्ता जमा ली और अब यूरोपीय यूनियन को भी आंखें दिखा रहे हैं. अमेरिका ने अचानक ग्रीनलैंड को अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी बताते हुए उस पर कब्जा करने का ऐलान कर दिया है. रूस से अमेरिका का 36 का आंकड़ा चल ही रहा है, अब चीन और भारत को भी इस लपेटे में लेना शुरू कर दिया. इतना ही नहीं, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका को भी ट्रंप ने धमकी दे डाली है. ब्राजील को तो वेनेजुएला की तर्ज पर कब्जे में लेने की कवायद अंदरखाने चल रही है. अब आप सोच रहे होंगे आखिर ट्रंप और अमेरिका को ऐसा क्या हो गया है, जो इतना बौखलाए हुए हैं. चलिए, सबसे पहले इसी का जवाब देते हैं.
अब राज से उठाते हैं पर्दा
आपने नोट किया होगा कि भारत और पीएम मोदी को दोस्त बताते-बताते ट्रंप ने अचानक सबसे बड़े दुश्मनों की कतार में लाकर खड़ा कर दिया. उनकी इन सभी अनाप-शनाप फैसलों का एक ही कारण है, डॉलर. जी बिल्कुल सही पढ़ा आपने, वह चीज डॉलर ही है जिसे बचाने के लिए ट्रंप कुछ भी कर सकते हैं. आप पिछले 20-25 साल का इतिहास देखें तो साफ पता चलता है कि जब-जब किसी देश ने डॉलर को कमजोर बनाने की कोशिश की तो अमेरिका ने उसे बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. इस लिस्ट में ज्यादातर आपको तेल का बिजनेस करने वाले देश मिलेंगे, जो डॉलर से दूर भागना चाहते थे.
डॉलर के पीछे कितने देश बर्बाद किए
डॉलर की दादागिरी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भी दुनिया का करीब 88 फीसदी कारोबार डॉलर में होता है. इससे पहले साल 2003 में इराक ने डॉलर से हटकर तेल का कारोबार करने की कोशिश की तो उसे अमेरिका ने बर्बाद कर दिया. इसके बाद साल 2011 में लीबिया ने यही कोशिश की और उसे भी अमेरिका ने बर्बाद कर दिया. इसी तरह, ईरान और वेनेजुएला को भी तेल कारोबार के लिए अमेरिका ने डॉलर के पीछे बर्बाद किया. सीरिया को तो आप अभी तक भूले नहीं होंगे. इन सभी देशों ने एक ही गलती की कि डॉलर को छोड़कर अन्य करेंसी में कारोबार करने की कोशिश की थी.
भारत से क्यों है नाराजगी
ट्रंप की भारत से नाराजगी का कारण तो ऊपर पता ही चल चुका है. भारत और 4 अन्य देशों ने साल 2011 में ब्रिक्स संगठन बनाया. अभी तक तो सब ठीक था, लेकिन इस संगठन का विस्तार हुआ और इसमें कुल 11 देश शामिल हो गए. यहां तक भी सब ठीक था, लेकिन असली मुद्दा तब शुरू हुआ जब ब्रिक्स देशों ने आपसी कारोबार लोकल करेंसी में करने की बात कही और आगे चलकर ब्रिक्स की खुद की करेंसी बनाने की योजना दिखाई. सीधा मतलब ये है कि भारत सहित सभी ब्रिक्स देशों ने एकसाथ मिलकर अमेरिकी डॉलर को फिर चुनौती दे डाली. अब ये देश कोई छोटे-मोटे इस्लामिक कंट्री तो हैं नहीं जिन्हें ट्रंप जब चाहें कुचल दें. यही वजह है कि बौखलाहट में अनाप-शनाप फैसले ले रहे हैं. भारत पर 25 फीसदी की टैरिफ पेनाल्टी सिर्फ इसलिए नहीं लगाई कि हमने रूस से तेल खरीदा, असल वजह ये है कि हमने यह तेल डॉलर के बजाय दोनों देशों की लोकल करेंसी में खरीदा गया.
विश्व युद्ध से कैसे जुड़े हैं तार
वैसे तो ट्रंप का विश्व युद्ध से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन अमेरिका और डॉलर के तार सीधे तौर पर जुड़े हैं. यह बात तो सभी को पता है कि अमेरिका ने पहले विश्व युद्ध में हिस्सा नहीं लिया था और दूसरे विश्व युद्ध से भी तब तक दूरी बनाए हुए था, जब तक जापान ने पर्ल हार्बर में उसके नेवल बेस को निशाना नहीं बनाया था. इसके बाद की कहानी तो सभी को पता है कि अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहर पर परमाणु बम गिराकर सबसे बड़ी तबाही मचाई थी. विश्व युद्ध से दूर रहकर अमेरिका आर्थिक रूप से तो मजबूत था ही, इस परमाणु हमले ने उसे सबसे ताकतवर देश का भी खिताब दिला दिया. बस यहीं से अमेरिका ने शुरू किया डॉलर वाला खेल.
अमेरिका ने रख लिया दुनिया का सोना
यूरोप, एशिया सहित दुनिया के ज्यादातर बड़े देश जब दूसरा विश्व युद्ध लड़ रहे थे तो अमेरिका ने इन सभी देशों को ऑफर दिया कि उनके सोने पर जोखिम बढ़ रहा है, लिहाजा अपना सोना न्यूयॉर्क फेडरल रिजर्व के वॉल्ट में जमा करा दें, जो सुरक्षित रहेगा. युद्ध समाप्त होने के बाद चाहें तो अपना सोना वापस ले सकते हैं. बात सभी को जमी और 1945 के आसपास अमेरिकी वॉल्ट में दुनिया का 60 से 70 फीसदी सोना जमा हो गया. ब्रिटेन, फ्रांस, नीदरलैंड्स, बेल्जियम, नॉर्वे ने तो अपना सारा सोना अमेरिका भेज दिया. जर्मनी ने 1,200 टन और इटली ने तो 1,060 टन सोना अमेरिका में जमा करा दिया. आलम यह था कि अमेरिका के पास करीब 22 हजार टन सोना जमा हो गया.
सोने के बजाय थमा दिया डॉलर
साल 1945 में दूसरा विश्व युद्ध समाप्त हो गया तो इन देशों ने अपना सोना वापस मांगा. ब्रिटेन जैसे कुछ देशों ने अपने सोने के कुछ हिस्से से अमेरिकी हथियार खरीद लिए और बाकी सभी को अमेरिका ने सोना देने के बजाय इन देशों को डॉलर पकड़ा दिया. इसके लिए करीब 44 देशों के साथ अमेरिकी शहर ब्रेटन वुड्स में एक समझौता किया गया. इस समझौते में सभी देशों को 1 औंस सोने के बदले 35 डॉलर अमेरिका ने थमाए और उनसे कहा कि वे अपना कारोबार डॉलर में कर सकते हैं, जिसकी कीमत उनके सोने के बराबर होगी. अमेरिका ने इन देशों का भरोसा जीतने के लिए डॉलर को गोल्ड से जोड़ दिया. बस, यहीं से डॉलर दुनिया का राजा बन गया. जैसा कि हमने बताया कि ग्लोबल ट्रेड का 88 फीसदी आज भी डॉलर में होता है.
1971 में खेला सबसे बड़ा दांव
साल 1971 के पहले तक दुनिया के तमाम देशों को लग रहा था कि वे जब चाहेंगे, अमेरिका को डॉलर देकर अपना सोना छुड़ा लेंगे. लेकिन, तत्कालीन राष्ट्रपति निक्सन ने यहां सबसे बड़ा दांव खेला और डॉलर को सोने से अलग कर दिया. उन्होंने ऐलान किया कि अमेरिका के पास डॉलर के मुकाबले पर्याप्त सोना नहीं है और अब डॉलर एक स्वतंत्र मुद्रा है. इस घटना को आज भी दुनिया निक्सन शॉक यानी निक्सन के झटके के रूप में याद रखती है. अब इन देशों के पास सोना वापस आने का रास्ता बंद हो गया और मजबूरन उन्हें डॉलर में अपना लेनदेन जारी रखना पड़ा.
डॉलर खत्म तो अमेरिका खलास
अब तक इतना तो समझ आ ही गया होगा कि अगर डॉलर में कारोबार खत्म हो जाए तो अमेरिका की इकनॉमी घुटनों पर आ जाएगी. इसे ऐसे समझें कि भारत जैसे दुनिया के सभी देश अपनी करेंसी सिर्फ उतना ही छाप सकते हैं जितनी उनकी परचेजिंग पॉवर है, लेकिन अमेरिका जितना मर्जी डॉलर छाप सकता है. उसके डॉलर छापने से जो महंगाई बढ़ेगी, उसका खामियाजा पूरी दुनिया को उठाना होगा, क्योंकि हम सभी डॉलर में कारोबार करते हैं और यही अमेरिका की इकनॉमी का छुपा हुआ राज है. इसे जब-जब किसी ने चुनौती दी तो अमेरिका पूरी ताकत से उस पर टूट पड़ा. जाहिर है कि भारत, चीन और रूस की तिकड़ी ने ब्रिक्स के जरिये जैसे ही डी-डॉलराइजेशन की बात कही, ट्रंप का पारा हाई हो गया.

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