क्या आपको मालूम है कि एक औसत अमेरिकी किसान और भारतीय किसान में क्या अंतर है. इसका जवाब दो अलग बगल लगी तस्वीरों से हो सकता है, जिसमें से एक में एक किसान लंबे चौड़े सैकड़ों हेक्टेयर के लहलहाते खेतों में अपनी हर तरह की कृषि मशीनों के साथ खड़ा है, मुस्कुरा रहा है. नोटों की गड्डियां अपने हर जेब में रखे हुए है. शानोशौकत के साथ रहता है. दूसरी तस्वीर उस किसान की होगी, जिसमें एक में भारतीय किसान छोटे मोटे खेत में खड़ा है. उसकी चिंता है कि किराए का ट्रैक्टर कैसे लाए. अपनी खेती को किस बाजार में कैसे सही कीमत में बेचे. उसके चेहरे पर चिंताएं हैं और मामूली घर.
तो भारतीय और अमेरिकी किसान के बीच ये अंतर कोई कल्पना या फैंटेसी नहीं है बल्कि सौ फीसदी हकीकत. एक को सरकार मोटा मुनाफा कमाने के लिए सब्सिडी दे रही है तो दूसरे को गरीबी और कृषि घाटे से उबरने के लिए मामूली सब्सिडी घिसट घिसटकर मिलती है. सही बात तो ये है कि दोनों में कोई तुलना ही नहीं है.
भारतीय और अमेरिकी किसानों के बीच का अंतर केवल आय का नहीं, बल्कि खेती के तरीके, पैमानों और सरकारी समर्थन का भी है. अमेरिकी किसान एक व्यवसायी की तरह काम करते हैं, जबकि भारत में खेती अब भी एक जीवनशैली और गुजारे का साधन अधिक है.यहां विस्तार से उनके बीच के मुख्य अंतर दिए गए हैं.
खेत का आकार
दोनों देशों के किसानों के बीच सबसे बड़ा अंतर जमीन के आकार का है. अमेरिका में एक किसान के पास औसतन 175 से 180 हेक्टेयर (लगभग 440-445 एकड़) जमीन होती है. कई बड़े कमर्शियल फार्म तो हजारों एकड़ में फैले होते हैं. भारत में औसत खेत का आकार केवल 1.08 हेक्टेयर (लगभग 2.7 एकड़) है. भारत के लगभग 80-85% किसान छोटे और सीमांत श्रेणी में आते हैं.
तकनीक और मशीनीकरण
अमेरिकी किसान प्रिसिजन फार्मिंग का उपयोग करते हैं, जो खेती को वैज्ञानिक और सटीक बनाती है. अमेरिका में GPS और AI से चलने वाले ट्रैक्टरों का इस्तेमाल आम है, जो बिना ड्राइवर के भी सटीक बुवाई और जुताई कर सकते हैं. किसान सैटेलाइट डेटा और ड्रोन्स के जरिए अपनी फसलों की निगरानी करते हैं. इससे उन्हें पता चल जाता है कि खेत के किस हिस्से में पानी या खाद की जरूरत है.
मिट्टी में नमी और पोषक तत्वों की जांच के लिए डिजिटल सेंसर लगे होते हैं, जो सीधे किसान के स्मार्टफोन पर जानकारी भेजते हैं. भारत में किसानों के लिए ये सारी बातें अभी दूर की कौड़ी हैं. उनके बहुत से तरीके अब भी पुराने हैं. तकनीक का मतलब केवल ट्रैक्टर का आ जाना है.
किसानों की अमीरी
अमेरिकी किसानों की अमीरी के पीछे बड़े खेत के अलावा सरकारी मदद का भी बड़ा हाथ है. 2026 की रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी किसानों को औसतन $30,000 (करीब ₹26 लाख) की सीधी सरकारी सहायता सालाना मिलती है. इसके मुकाबले भारतीय किसान को ‘पीएम-किसान’ जैसी योजनाओं से केवल ₹6,000 मिलते हैं. वहां फसल खराब होने पर या कीमतों में गिरावट होने पर सरकार भारी भरकम मुआवजा देती है, जिससे किसान को कभी घाटा नहीं होता.
अमेरिकी किसान अमीर है क्योंकि उसके पास खेत बड़े हैं. सरकार उसे एक बिजनेस पार्टनर की तरह मोटी रकम देती है. भारत में सब्सिडी का उद्देश्य किसान को अमीर बनाना नहीं, बल्कि उसे कर्ज और भुखमरी से बचाना है क्योंकि यहां खेत बहुत छोटे हैं.
व्यापारिक मॉडल
अमेरिकी किसान अपनी फसलों का निर्यात बड़े स्तर पर करते हैं, जिससे उन्हें वैश्विक बाजार की कीमतें मिलती हैं. भारत में कृषि उत्पादों का निर्यात तो बड़े पैमाने पर बेशक होता है लेकिन उसका मुनाफा किसान तक नहीं पहुंचता है. तंत्र ऐसा है कि किसानों को समर्थन मूल्य तो मिलता है लेकिन उसके बाद की मलाई दूसरे लोग खाते हैं. अगर विदेशों में बेचे जा रहे कृषि उत्पादों पर मुनाफा होता भी है तो भारतीय किसानों के पास कभी नहीं पहुंचता.
अमेरिकी किसान अपनी फसल खुले बाजार में बेचने के बजाय एक सुनियोजित सिस्टम के जरिए बेचता है. अधिकांश बड़े किसान बड़ी कंपनियों जैसे पेप्सीको, कारगिल या टिसन फूड्स के साथ पहले ही कॉन्ट्रैक्ट कर लेते हैं. फसल उगाने से पहले ही दाम और खरीदार तय होता है.
क्या उगाते हैं और कैसे
अमेरिका में खेती का मुख्य फोकस एकल खेती पर होता है, जहां एक ही बड़े खेत में एक ही फसल उगाई जाती है. फसल मुख्य क्षेत्र मक्का है. इसे “कॉर्न बेल्ट” में उगाया जाता है. यह अमेरिका की सबसे बड़ी फसल है.सोयाबीन दूसरी सबसे बड़ी फसल, जिसका उपयोग तेल और पशु आहार के लिए होता है.गेहूं पश्चिमी मैदानी इलाकों में बड़े स्तर पर उगाया जाता है. दक्षिणी राज्यों में आधुनिक तरीके से कपास की खेती होती है. भारत में किसानों की मुख्य फसल गेहूं, चावल और गन्ना है. इसके बाद छिटपुट स्तर पर दूसरी फसलें हैं. सब्जियों की बात करें तो आलू, प्याज और टमाटर की खासी पैदावार है.
खेती का तरीका
वहां की खेती पूरी तरह से कॉरपोरेट स्टाइल में होती है. फसल काटने के लिए विशाल ‘कंबाइन हार्वेस्टर’ का उपयोग किया जाता है, जो एक दिन में सैकड़ों एकड़ फसल काट सकते हैं. साथ ही वे आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी से तैयार बीजों का उपयोग करते हैं, जो कीड़ों और बीमारियों से लड़ने में सक्षम होते हैं.
स्टाफ और मजदूर
खुद करते हैं या कर्मचारी रखते हैं? अमेरिका में 95% खेत ‘फैमिली फार्म’ हैं, यानी मालिक किसान खुद ही होता है, लेकिन काम का पैमाना बिल्कुल अलग है. एक अमेरिकी किसान और उसका परिवार मशीनों की मदद से अकेले 500 एकड़ तक की खेती संभाल सकता है. जहां भारत में 100 मजदूर चाहिए, वहां अमेरिका में एक आधुनिक ‘कंबाइन हार्वेस्टर’ काफी है. बहुत बड़े खेतों पर किसान अकेले काम नहीं करता. उसके पास एग्रोनोमिस्ट, मैकेनिक और अकाउंटेंट का स्टाफ होता है.
सब्सिडी
भारत और अमेरिका के बीच कृषि सब्सिडी का अंतर केवल पैसे की मात्रा का नहीं है, तरीके का भी है. जहां भारत में खेती को बचाने के लिए सब्सिडी दी जाती है, वहीं अमेरिका में इसे एक लाभदायक बिजनेस बनाए रखने के लिए दी जाती है. अमेरिका मुख्य रूप से ‘डायरेक्ट इनकम सपोर्ट’ देता है. यानी किसान के बैंक खाते में सीधे बड़ी रकम भेज दी जाती है ताकि उसकी आय शहरी लोगों के बराबर बनी रहे. वहां खाद या बिजली पर छूट नहीं मिलती.
भारत मुख्य रूप से ‘इनपुट सब्सिडी’ देता है. सरकार यूरिया, बिजली, पानी और बीजों के दाम कम रखने के लिए कंपनियों को पैसा देती है, ताकि किसान को ये चीजें सस्ती मिलें. अमेरिका में किसानों और कुछ बड़े कॉर्पोरेट फार्म्स को बहुत मोटी सब्सिडी भी मिलती है.

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