Opinion: अमेरिका को ईरान में वेनेजुएला की तरह दखल क्यों नहीं देना चाहिए? निकल सकती है हाथ से बात!

11 hours ago

Middle East news: अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने वेनेजुएला में तख्तापलट कराने के बाद राष्ट्रपति मादुरो को कैदियों की तरह उठवाकर कोलंबिया को धमकाया. इसके बाद वहां से भी बराबरी का पलटवार आया. हालांकि मादुरो का हाल देख कर कुछ नेताओं ने वार्ता के जरिए हालिया बयानों से पैदा हुई गरमागरमी को पानी डालकर ठंडा कर दिया. ऐसे में दक्षिण अमेरिका में शांति आ गई लेकिन अमेरिकी प्रायद्वीप से दूर मिडिल ईस्ट के ईरान की चिंता खत्म नहीं हुई है.

ईरान में वेनेजुएला जैसा दखल क्यों नहीं होना चाहिए?

ईरान की चिंता क्यों नहीं खत्म हुईं, इसकी दो वजहें हो सकती हैं. पहली ये कि ईरान में सरकार विरोधी चिंगारी ठंडी नहीं पड़ी है. अमेरिका इसका फायदा उठा सकता है. दूसरी वजह ये हो सकती है कि पिछले साल ईरान के परमाणु ठिकानों पर हुए हमले से ईरान पश्चिमी देशों के गुस्से का ट्रेलर देख चुका है. 

Add Zee News as a Preferred Source

वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन के बाद गृह मंत्री डियोसदादो काबेलो ने कहा कि अमेरिका के हमले में करीब 100 लोग मारे गए. जबकि इससे पहले राजधानी काराकास में बैठे सरकारी अधिकारियों ने मृतकों का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं जारी किया था. काबेलो ने कहा, 'शनिवार को हुए अमेरिकी मिलिट्री एक्शन में 100 लोग मारे गए. 

ऐसे में अमेरिका अगर मादुरो की तरह खामनेई पर एक्शन लेता है तो पहले से बारूद के ढेर पर बैठे मिडिल ईस्ट की शांति और खतरे में पड़ जाएगी. वहीं सैकड़ों बेगुनाह लोगों की जान अमेरिकी हमले में जा सकती है, जिनका ट्रंप से कोई लेना-देना नहीं होगा.

दुनिया को धमाकाने की पुरानी अदा और अंदाज के तहत भी ट्रंप को खामनेई पर वेनेजुएला जैसा एक्शन लेने से बचना चाहिए, क्योंकि जरूरी नहीं कि ट्रंप का 'वेनेजुएला प्लान' जैसा आइडिया ईरान में भी उतने स्ट्राइक रेट से कामयाब हो. वेनेजुएला हो या ईरान दोनों जगह जनता में सरकार के प्रति गहरा आक्रोश रहा. इसके बावजूद वेनेजुएला में जो हुआ उसे ईरान में रिपीट करना आसान नहीं है. 

ईरान को धमका रहा अमेरिका!

ईरान के प्रदर्शन अभी थमे नहीं हैं. ईरानी सुरक्षा बलों ने दमनात्मक कार्रवाई करते हुए सत्ता विरोधी प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाया है. पश्चिमी मीडिया का दावा है कि ईरान के सुरक्षा बलों ने कम से कम 36 लोगों की मौत हुई है और 2000 लोगों की गिरफ्तारी हुई है. ट्रंप कह चुके हैं कि अमेरिका हस्तक्षेप के लिए तैयार बैठा है.

ईरान की मुश्किल ये है कि सरकार घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों मोर्चों पर कमजोर है. पिछले साल इजराइल ने उसके परमाणु ठिकानों पर हमला करके उसे काफी नुकसान पहुंचाया. इसके साथ ईरान के करीबी सहयोगियों जैसे सीरिया में असद की सरकार, गाजा में हमास और लेबनान में हिजबुल्लाह तक का सत्यानाश हो गया.

खामेनेई के तमाम दावों बावजूद, ईरान सरकार की नाकामियों का ठीकरा खामनेई के सर ही फूटा. अर्थव्यवस्था की खराब हालत और आसमान छूती महंगाई ने लाखों लोगों को सड़क पर खड़ा कर दिया.

fallback

फायदा उठाना चाहते हैं ट्रंप?

ईरान ने बीते कुछ सालों में विदेशी प्रोजेक्ट्स में बड़ी रकम खर्च की है. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि ईरान को इससे जरा भी फायदा नहीं हुआ. खासकर यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम की बात करें तो इसे भी लोगों ने खामनेई की परमाणु सनक से जोड़कर देखा. माना ये भी गया कि परमाणु हथियार बनाने के संदिग्ध मकसद के चलते ईरान को पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा. इसी वजह से अमेरिका और यूरोप के बड़े देश ईरान के दुश्मन बन गए.

चीन-रूस अपनी-अपनी राजधानियों से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक वेनेजुएला पर हुए एक्शन की निंदा कर रहे हैं. लेकिन अबतक ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे ईरान का डर कम हो. लिहाजा ट्रंप को उकसावे वाली कार्यवाही नहीं करनी चाहिए, जिससे मिडिल ईस्ट में जंग का नया मोर्चा खुल जाए.

पिछले साल जून में जब ईरान पर हमला हुआ था, तब तेहरान को संभलने का मौका नहीं मिला, इस बार वो पहले से तैयार होगा. दूसरी ओर ईरान के लोग बाहरी हमले पर एक बार फिर से एकजुट हो सकते हैं. पिछले साल के हवाई हमलों के बाद ईरानी नेताओं के साथ उनकी जनता की सहानुभुति देखने को मिली थी.

मान लीजिए अमेरिका के सैन्य एक्शन से ईरान की सरकार गिर भी जाती है, तब भी ये गारंटी नहीं है कि नई सरकार अमेरिका के दिखाए रास्ते पर चले. इससे उलट ज्यादा संभावना इस बात की है कि तेहरान की ताकत खामनेई के हाथ से निकलकर अमेरिका के किसी और 'कट्टर' दुश्मन के हाथ चली जाएगी.

एक और वजह ईरान का इस्लामिक देश होना है. भले ही ईरान 'शिया' देश है, लेकिन मुस्लिम ब्रदरहुड के नाम पर सऊदी अरब को छोड़ कई इस्लामिक देश ईरान के साथ आ सकते हैं, ऐसी स्थिति से निपटना अमेरिका के लिए आसान न होगा.

Disclaimer: (ये लेखक के निजी विचार हैं)

Read Full Article at Source