Opinion: बंगाल में ममता बनर्जी ने सेट किया गेम, 'साथी' योजनाओं से भाजपा का मुकाबला करेंगी दीदी

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बंगाल में ममता ने सेट किया गेम, 'साथी' योजनाओं से भाजपा का मुकाबला करेंगी दीदी

Last Updated:February 16, 2026, 13:17 IST

Mamata Banerjee Launches Freebie Schemes: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस साल अप्रैल में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर जन कल्याण के कार्यं पर फोकस किया है. राज्य सरकार पहले से ही स्वास्थ्य साथी स्कीम और लक्ष्मीर भंडार योजना चला रही है. अब युवाओं के लिए राज्य सरकार ने स्वास्थ्य साथी योजना शुरू की है. महिलाओं के लिए पहले से चल रही योजना की सम्मान राशि भी बढ़ा दी गई है.

बंगाल में ममता ने सेट किया गेम, 'साथी' योजनाओं से भाजपा का मुकाबला करेंगी दीदीZoom

ममता बनर्जी ने राज्य में बेरोजगारों के लिए एक और लाभार्थी योजना शुरू की है. इससे भाजपा की चुनौती बढ़ी सकती है. फोटो- पीटीआई

Mamata Banerjee Launches Freebie Schemes: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में जनकल्याण के नाम पर ममता बनर्जी ने खूब रेवड़ियां बजट में बांटी हैं. स्वास्थ्य साथी की सफलता के बाद ममता ने अब युवा साथी योजना की शुरुआत की है. ममता की लक्खी भंडार योजना का कमाल भी बंगाल में दिखता रहा है. 2021 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव में ममता की इन्हीं योजनाओं के कारण भाजपा को वैसी कामयाबी नहीं मिल पाई, जितनी उसने कोशिश की थी. युवा साथी योजना की घोषणा ममता बनर्जी ने इस बार बजट में की है. 10वीं और उससे ऊपर तक की पढ़ाई करने वाले 40 साल तक की उम्र वाले युवाओं के लिए ममता ने बेरोजगारी भत्ता देने की घोषणा की है. पहले घोषित और अभी की योजनाओं में नए लाभुकों को जोड़ने की प्रक्रिया भी तेजी से चल रही है. इसके लिए जगह-जगह राज्य सरकार ने कैंप लगाए हैं, जहां बेरोजगार युवाओं की खासा भीड़ उमड़ रही है. कई स्थानों पर हंगामा और मारपीट की खबरें भी आ रही हैं.

स्वास्थ्य साथी स्कीम

पश्चिम बंगाल सरकार ने वैसे तो हर तबके के लोगों को कोई न कोई सरकारी लाभ देकर उन्हें लाभुक बना दिया है, लेकिन इनमें तीन योजनाओं पर सरकार का सर्वाधिक फोकस है. इनमें दो योजनाएं तो पहले से ही चल रही हैं. सिर्फ इनका दायरा और मिलने वाली रकम को बढ़ा दिया गया है. केंद्र सरकार की सेहत क्षेत्र की लोकप्रिय योजना आयुष्मान भारत के तर्ज पर ममता ने पश्चिम बंगाल में स्वास्थ्य साथी योजना 2016 में लांच की थी. इसमें राज्य के लगभग सभी निवासियों को शामिल किया गया है. इसके तहत हर परिवार के सभी सदस्यों को 5 लाख रुपए तक का चिकित्सा लाभ मिलता है. अभी इस योजना के लाभुकों में 2.42 करोड़ से अधिक परिवार शामिल हैं. अगर एक परिवार में औसतन 4 सदस्यों की गणना की जाए तो इसके लाभुकों की संख्या करीब 9 करोड़ है. स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े बताते हैं कि इस योजना के तहत एक करोड़ से अधिक लोग इलाज के लिए अस्पतालों में भर्ती हो चुके हैं. यह योजना बंगाल में रहने वाले सभी लोगों के लिए हैं. आय, उम्र या जाति की कोई बंदिश नहीं है.

लक्ष्मीर भंडार योजना

महिलाओं को केंद्र कर शुरू की गई महत्वाकांक्षी ‘लक्ष्मीर भंडार योजना’ को ममता बनर्जी ने अब और आकर्षक बना दिया है. बजट प्रावधानों के मुताबिक पहले से मिल रही रकम फरवरी 2026 से बढ़ा कर 1500/1700 रुपए मासिक कर दी गई है. सामान्य श्रेणी की महिलाओं को इस योजना के तहत 1500 रुपए मिलेंगे तो अनुसूचित जाति/ जनजाति की महिलाओं को 1700 रुपए दिए जाएंगे. पहले यह राशि 1,000 सामान्य वर्ग की महिलाओं को और 1,200 रुपए SC/ST वर्ग से आने वाली महिलाओं को मिलती थी. इस बार ममता ने बजट में 500 रुपए की बढ़ोतरी कर दी है. इस योजना के तहत 25-60 आयु वर्ग की महिलाओं को कवर किया जाता है. अपनी इस योजना से तृणमूल कांग्रेस ने आधी आबादी पर जबरदस्त पकड़ बना ली है. 2021 में ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनाव के दौरान इसका लाभ तो लिया ही, 2024 के लोकसभा चुनाव में भी उसे इस योजना ने काफी मदद पहुंचाई. इस योजना की कुल लाभार्थी 2.42 करोड़ महिलाएं हैं इसमें हाल ही में 20.62 लाख नई महिलाओं को जोड़ा गया है. इसमें भी नाम जोड़ने का सिलसिला जारी है. इस योजना की लोकप्रियता इसी से समझी जा सकती है कि महानगर कोलकाता में लाभुकों की संख्या करीब 7.84 लाख है.

पिछले दिनों पेश हुए अंतरिम बजट के बाद प्रेस कांफ्रेंस करतीं ममता बनर्जी. फोटो- पीटीआई

और अब युवा साथी

ममता बनर्जी ने इस बार बजट में बेरोजगार युवकों के लिए ‘युवा साथी’ योजना शुरू की है. युवा साथी योजना नई है और इसके लाभ के लिए रजिस्ट्रेशन चल रहा है. जहां-जहां इसके लिए कैंप लगाए गए हैं, वहां युवाओं की उमड़ती भीड़ से यह स्पष्ट होता है कि बंगाल में बेरोजगारी किस कदर है. ममता बनर्जी की सरकार ने इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले बेरोजगार युवाओं को लक्ष्य कर इस योजना की शुरुआत की है. इस योजना के तहत बेरोजगार युवाओं को हर महीने 1,500 रुपए की आर्थिक मदद दी जाएगी. इसका लाभ लेने के लिए न्यूनतम 10वीं पास की शैक्षिक योग्यता होनी चाहिए. इसके तहत अधिकतम 5 साल तक या नौकरी मिलने तक 1500 रुपए भत्ता मिलेगा. उम्र न्यनतम 21 और अधिकतम 40 साल होनी चाहिए. इसकी शुरुआत 1 अप्रैल 2026 से होगी. 15 फरवरी 2026 से आवेदन की प्रक्रिया शुरू हुई है. इसके लिए सभी 294 विधानसभा क्षेत्रों में विशेष कैंप लगाए गए हैं.

फ्रीबीज की शुरुआत

जनकल्याण के नाम पर मुफ्त रेवड़ियां (फ्रीबीज) बांटने की शुरुआत हाल के वर्षों में अरविंद केजरीवाल से मानी जाती है. हालांकि सच यह है कि इसे सबसे पहले दक्षिण के राज्यों में ही शुरू किया था. तमिलनाडु के सीएम रहते कांग्रेस नेता के. कामराज ने 2 ऐसी योजनाएं शुरू की थीं, जिन्हें जन कल्याण का काम माना गया. हालांकि बाद में तमिलनाडु की दूसरी सरकारों ने भी यह सिलसिला जारी रखा. कामराज ने फ्री एजुकेशन और मिड मील की योजना शुरू की थी. 1967 में डीएमके नेता सीएन अन्नादुराई ने एक रुपए में 4.50 किलो चावल का वादा किया. उनका यह वादा कामयाब रहा. वे सरकार बनाने में सफल रहे. बाद में एमजी रामचंद्रन भी फ्रीबीज योजनाओं के सहारे ही 3 बार मुख्यमंत्री बने. 1989 से 2016 के दौरान करुणानिधि और जयललिता ने भी फ्रीबीज पर जोर दिया. डीएमके नेता एम करुणानिधि ने 2006 के चुनाव में हर घर रंगीन टीवी सेट देने का वादा किया. उनकी जीत हुई. एआईडीएके नेता जे जयललिता ने भी लैपटॉप, मिक्सर-ग्राइंडर, फैन, गैस सिलेंडर, सोना, फ्री बिजली/ पानी देने के वादे पर चुनाव जीता. आंकड़े बताते हैं कि 2006 से 2016 के दौरान तमिलनाडु में फ्रीबीज योजनाओं पर राज्य सरकार को करीब 11,561 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े. एमके स्टालिन ने फ्रीबीज योजनाओं को जारी रखा है.

बढ़ता आर्थिक बोझ

फ्रीबीज के दुष्प्रभाव के रूप में सरकारी खजाने पर बढ़ता बोझ सामने आया है. इससे कई राज्यों की आर्थिक हालत खराब है. रिजर्व बैंक आफ इंडिया से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने इसे लेकर राज्यों को चेताया है. पर, कोई भी पार्टी अब इसके बिना चुनाव मैदान में उतरना नहीं चाहती. पंजाब, राजस्थान, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश जैसे राज्य फ्रीबीज की योजनाओं से सबसे अधिक प्रभावित हैं. तमिलनाडु का कुल कर्ज 8 लाख करोड़ से ज्यादा है. इसमें ब्याज पर ही 40,000 करोड़ सालाना चुकाने पड़ रहे हैं. आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ने अपने उधार सीमा का 95-107 प्रतिशत तक इस्तेमाल कर लिया है. कई राज्यों में विकास के काम अवरुद्ध हैं तो कुछ में वेतन-पेंशन जैसे जरूरी काम के लिए पैसे की कमी महसूस हो रही है. झारखंड को मईयां सम्मान योजना के तहत महिलाओं को 2500 रुपए मासिक देने में पसीने छूट रहे हैं. कर्नाटक और हिमाचल भी बुरी तरह प्रभावित हैं. बिहार भी अछूता नहीं है. बंगाल की तो बात ही निराली है. देश में 8वें वेतनामान लागू करने की तैयारी चल रही है तो बंगाल के कर्मचारी अब भी छठे वेतनमान पर ही आश्रित हैं. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी बंगाल सरकार कर्मचारियों को डीए का भुगतान नहीं कर पा रही.

चिंता है, पर हाथ खुले

समय-समय पर फ्रीबीज को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दाखिल होते रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट भी इसे लेकर चिंतित है. कोर्ट ने हाल ही एक पीआईएल पर सुनवाई के दौरान कहा कि फ्रीबीज से भवी पीढ़ी पर बोझ पड़ता है. इसे कल्याणकारी योजनाओं की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. चुनाव आयोग भी फ्रीबीज पर चिंता जता चुका है. इन सब से बेफिक्र राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव जीतने के लिए इसे आवश्यक हथियार बना लिया है. यह अलग बात है कि सत्ताधारी पार्टियों को ऐसी घोषणाओं का अधिक लाभ मिलता है. कम से कम साल-डेढ़ साल के भीतर हुए कई राज्यों के चुनावों में यह दिख चुका है. मध्य प्रदेश में लाडली बहना योजना तो महाराष्ट्र में लाडकी योजना, झारखंड में मईयां सम्मान योजना तो बिहार में महिलाओं को 10 हजार नकद देने की योजना का कमाल लोग देख चुके हैं. झारखंड और हरियाणा के चुनावों में भी इसी तरह की योजना से ही सत्ताधारी पार्टियां या गठबंधन को पुनर्वापसी का मौका मिला है.0′

First Published :

February 16, 2026, 13:16 IST

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