UGC Rules 2026: भेदभाव मिटाने का फॉर्मूला पड़ा भारी! यूजीसी की नई गाइडलाइंस पर क्यों मचा है कोहराम?

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Last Updated:January 26, 2026, 07:50 IST

UGC Anti Discrimination Rules 2026: यूजीसी के नए भेदभाव विरोधी नियम 2026 पर देशभर में घमासान छिड़ा है. स्टूडेंट्स और शिक्षकों के भारी विरोध के बाद केंद्र सरकार इन नियमों को वापस लेने पर विचार कर रही है. आखिर क्यों सुप्रीम कोर्ट पहुंचा यह मामला और क्या है विवाद की मुख्य वजह? जानिए इस रिपोर्ट में.

भेदभाव मिटाने का फॉर्मूला पड़ा भारी! UGC की नई गाइडलाइंस पर क्यों मचा कोहराम?UGC Anti Discrimination Rules 2026: ज्यादातर छात्र, शिक्षक और अभिभावक यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ हैं

नई दिल्ली (UGC Anti Discrimination Rules 2026). देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और सद्भाव का माहौल बनाने के इरादे से लाए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के ‘भेदभाव विरोधी नियम 2026’ विवादों का केंद्र बन गए हैं. 15 जनवरी 2026 को लागू किए गए इन नियमों का मूल उद्देश्य कैंपस के अंदर जातिगत भेदभाव को जड़ से खत्म करना और वंचित वर्ग के छात्रों को सुरक्षित शैक्षणिक परिवेश प्रदान करना था. हालांकि, इन नियमों ने ऐसी बहस को जन्म दे दिय, जिसने न केवल छात्र राजनीति को गरमा दिया, बल्कि सरकार को भी अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया.

विवाद की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यूजीसी मामला अब देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है. जहां एक तरफ शिक्षा मंत्रालय इसे कैंपस रिफॉर्म्स की दिशा में बड़ा कदम बता रहा था, वहीं दूसरी तरफ देशभर के विश्वविद्यालयों से उठ रहे विरोध के सुरों ने इसे ‘भेदभावपूर्ण’ और ‘अधूरा’ करार दिया है. स्टूडेंट्स और शिक्षकों के बीच बढ़ते असंतोष और कानूनी पेचीदगियों को देखते हुए मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो अब केंद्र सरकार इन नियमों को वापस लेने या इनमें थोड़ा बदलाव करने के लिए बीच का रास्ता तलाश रही है।

विवाद की मुख्य वजहें: आखिर नियम में क्या ‘खोट’ है?

यूजीसी के इन नए नियमों को लेकर विरोध की आग 3 मुख्य बिंदुओं पर टिकी है:

जाति की परिभाषा पर रार: नियमों के ‘विनियम 3(ग)’ में जातिगत भेदभाव को मुख्य रूप से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तक सीमित कर दिया गया है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि भेदभाव किसी भी जाति के छात्र के साथ हो सकता है, इसलिए कानून का दायरा ‘यूनिवर्सल’ होना चाहिए. दुरुपयोग का डर: शिक्षक संगठनों का एक वर्ग चिंतित है कि नियमों के सख्त दंडात्मक प्रावधानों का राजनीतिक द्वेष के चलते गलत इस्तेमाल हो सकता है. इससे यूनिवर्सिटी कैंपस का शैक्षणिक माहौल प्रभावित होगा. पुराने नियमों का कमजोर होना: दलित और आदिवासी संगठनों को आशंका है कि 2012 के जो पुराने और स्पष्ट नियम थे, नए नियमों के आने से उनकी धार कुंद हो जाएगी और शिकायतों के निपटारे की प्रक्रिया जटिल हो जाएगी.

कैंपस से क्या आ रही हैं प्रतिक्रियाएं?

छात्रों का पक्ष: दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू और बीएचयू जैसे बड़े संस्थानों में छात्र आंदोलित हैं. उनका कहना है कि सरकार को नियम बनाने से पहले छात्र प्रतिनिधियों से चर्चा करनी चाहिए थी. छात्रों की मांग है कि एंटी-डिस्क्रिमिनेशन सेल में छात्रों की भागीदारी अनिवार्य हो. शिक्षकों की चिंता: प्रोफेसरों का कहना है कि नए नियमों में प्रशासनिक जवाबदेही तो तय की गई है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि अगर कोई संस्थान जानबूझकर शिकायत पर कार्रवाई न करे, तो उस पर क्या लगाम कसी जाएगी.

सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: ‘सबके लिए हो कानून’

बीएचयू के छात्र नेता मृत्युंजय तिवारी ने इस संबंध में याचिका दायर की है. इसने इस विवाद को कानूनी रूप दे दिया है. याचिका में तर्क दिया गया है कि संविधान का अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) किसी भी नागरिक के साथ उसकी जाति के आधार पर भेदभाव को रोकता है. ऐसे में यूजीसी के नियम केवल विशिष्ट वर्गों तक ही सीमित कैसे रह सकते हैं? यह दलील सरकार के लिए बड़ी कानूनी चुनौती बन गई है.

सरकार का ‘डैमेज कंट्रोल’ मोड: अब आगे क्या?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकार इस समय काफी दबाव में है और वह नीचे लिखे कदम उठा सकती है:

संशोधन का ड्राफ्ट: सरकार ‘जाति’ शब्द की परिभाषा को बदलकर इसे सभी स्टूडेंट्स के लिए लागू कर सकती है. 2012 के नियमों की वापसी: सबसे सरल रास्ता यह माना जा रहा है कि विवादित 2026 के नियमों को रद्द कर दिया जाए और 2012 के पुराने नियमों को ही नई सख्ती के साथ लागू किया जाए. समिति का गठन: एक उच्चस्तरीय समिति बनाई जा सकती है जो सभी पक्षों (Stakeholders) से बात करके एक सर्वमान्य ड्राफ्ट तैयार करे.

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Deepali Porwal

With more than 10 years of experience in journalism, I currently specialize in covering education and civil services. From interviewing IAS, IPS, IRS officers to exploring the evolving landscape of academic sys...और पढ़ें

First Published :

January 26, 2026, 07:50 IST

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