पटना. बिहार में राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग द्वारा बनाई जा रही किसान रजिस्ट्री पहचान (Farmer Registry ID) को लेकर सियासी और सामाजिक बहस तेज हो गई है. बिहार की नेता रितु जायसवाल ने सवाल उठाया है कि जब राज्य की अधिकांश जमीन पैतृक हैं तो केवल जमाबंदी के नाम पर किसान की पहचान तय करना कितना व्यावहारिक और न्यायसंगत है. रितु जायसवाल ने अपने ट्वीट में कहा है कि राज्य के हजारों किसान खेती तो कर रहे हैं, लेकिन उनके नाम से जमाबंदी नहीं होने के कारण उनकी Farmer Registry ID नहीं बन पा रही है जिससे वे पीएम किसान सम्मान निधि और अन्य कृषि योजनाओं से वंचित हो रहे हैं.
रितु जायसवाल ने ट्वीट के जरिए सीधे तौर पर सरकार से यह सवाल किया है कि- बिहार में अधिकतर जमीन पैतृक है. जमाबंदी कई बार दिवंगत पूर्वजों के नाम पर है. ऐसे में जो किसान पीढ़ियों से जमीन जोत रहा है, उसकी Farmer Registry ID क्यों नहीं बन रही? उनका आरोप है कि नीतिगत सख्ती के नाम पर वास्तविक किसानों को योजनाओं से बाहर किया जा रहा है, जबकि सरकार किसानों की आय बढ़ाने की बात करती है.
रितु जायसवाल ने बिहार की Farmer Registry ID व्यवस्था पर सवाल उठाए,
Farmer Registry ID की व्यवस्था क्या है?
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने हाल ही में Farmer Registry ID बनाना शुरू किया है. सरकार का उद्देश्य है कि किसानों का एक एकीकृत डिजिटल डाटा तैयार किया जाए और पीएम किसान, बीज अनुदान, फसल बीमा जैसी योजनाओं में एक ही पहचान पत्र के आधार पर लाभ दिया जाए. इसके माध्यम से फर्जी या अपात्र लाभार्थियों को रोका जाए, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में Farmer Registry ID केवल उन्हीं किसानों को दी जा रही है, जिनके नाम से जमीन की जमाबंदी दर्ज है.
पूरा मामला विस्तार से समझिये
फार्मर रजिस्ट्री आईडी बिहार सरकार की एग्री स्टैक पहल का हिस्सा है जो किसानों का डिजिटल डेटाबेस तैयार कर रही है. इस आईडी से पीएम किसान की 6000 रुपये सालाना सहायता, फसल बीमा, सब्सिडी आदि योजनाओं का लाभ मिलेगा. नियमों के अनुसार, आईडी बनाने के लिए आधार कार्ड, बैंक खाता और जमीन के रिकॉर्ड की जरूरत है. लेकिन पैतृक जमीन के मामलों में अगर जमाबंदी मूल मालिक के नाम पर है और म्यूटेशन (नामांतरण) नहीं हुआ है, तो उत्तराधिकारी को आईडी नहीं मिलती. पेच यही फंस जाता है क्योंकि बिहार में लाखों किसान ऐसी स्थिति में हैं जहां परिवार के बुजुर्ग की मौत हो चुकी है, लेकिन रिकॉर्ड अपडेट नहीं हैं. ऐसे में वे सरकारी कैंपों में जाकर भी निराश हो रहे हैं यह समस्या ग्रामीण इलाकों में खासतौर पर गोपालगंज, सीवान और छपरा जैसे जिलों में ज्यादा देखी जा रही है जहां पैतृक संपत्ति का चलन आम है.
सरकार की भूमिका और नियम
राजस्व विभाग के अनुसार, आईडी बनाने की प्रक्रिया सख्त है, ताकि फर्जी दावों को रोका जा सके. वहीं, पीएम किसान गाइडलाइंस में यह भी स्पष्ट है कि अगर मौत 1 फरवरी 2019 के बाद हुई है तो उत्तराधिकारी लाभ ले सकते हैं, लेकिन लैंड रिकॉर्ड में नाम होना जरूरी है. ऐसे में किसानों के सामने परेशानीय यह भी है कि म्यूटेशन प्रक्रिया में देरी एक बड़ी बाधा है. इसमें सर्किल ऑफिसर की मंजूरी, दस्तावेज और कभी-कभी कोर्ट केस लगते हैं. विभाग कैंप लगा रहा है, लेकिन बिना अपडेट रिकॉर्ड के आईडी नहीं बन रही है. समस्या सामने आने के बाद, कुछ अधिकारियों ने कहा है कि समस्या पर ध्यान दिया जा रहा है और म्यूटेशन को तेज करने के निर्देश दिए गए हैं. लेकिन किसान संगठन शिकायत कर रहे हैं कि ऑनलाइन पोर्टल में तकनीकी दिक्कतें हैं और प्रक्रिया जटिल है.
यहीं से शुरू होती है असली समस्या
इस मामले में जो जटलताएं सामने आ रही हैं रितु जायसवाल ने उसी को आवाज दी है. दरअसल, बिहार के ग्रामीण ढांचे की हकीकत यह है कि अधिकांश जमीन पैतृक हैं और जमाबंदी कई बार दादा-परदादा या दिवंगत पिता के नाम पर हैं. इन जमीनों पर उत्तराधिकारी वर्षों से खेती कर रहे हैं, लेकिन कई मामलों में दाखिल-खारिज नहीं हो पाया है. ऐसे किसान जब शिविरों में Farmer Registry ID बनवाने पहुंचते हैं तो उन्हें यह कहकर लौटा दिया जाता है कि उनके नाम से जमाबंदी नहीं है. ऐसे में रितु जायसवाल ने इसी स्थिति पर सवल उठाते हुए मामले की जटिलता को उजागर किया है.
बिहार में Farmer Registry ID समस्या के बीच पैतृक जमीन वाले किसानों के विभिन्न योजनाओं से वंचित होने को लेकर चिंता जताई जा रही है. (AI जेनरेटेड)
कैम्प से खाली हाथ लौट रहे किसान
दरअसल, जमीनी सच्चाई भी यही है कि राज्य के कई जिलों से सामने आ रहा है कि किसान कागजात लेकर कैंप पहुंच रहे हैं और अपना आधार, बैंक खाता, खतियान दिखा रहे हैं, लेकिन जमाबंदी अपने नाम से न होने के कारण ID नहीं बन पाई. इसका सीधा असर यह है कि ऐसे किसान पीएम किसान निधि (PM-Kisan Nidhi) की अगली किस्त, बीज अनुदान और अन्य लाभों से बाहर हो सकते हैं.
राजनीतिक संकेत और प्रशासन पर दबाव
रितु जायसवाल का जिस मुद्दे को उठाया है वह बेहद अहम है और आने वाले दिनों में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनने के संकेत भी दे रहा है. विपक्ष इसे किसान विरोधी व्यवस्था बता रहा है, वहीं सरकार के सामने अब यह चुनौती है कि वास्तविक किसान की पहचान कैसे तय की जाए और दाखिल-खारिज प्रक्रिया को कैसे तेज किया जाए. वहीं, अहम सवाल यह भी कि बिना जमाबंदी वाले किसानों को अस्थायी राहत कैसे मिले.
जमीनी सच यही कि पीड़ित हो रहे किसान
रितु जायसवाल के ट्वीट ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि किसान की पहचान खेत से होगी या फाइल से? सरकार की Farmer Registry ID की मंशा भले सही हो, लेकिन मौजूदा जमीनी सच्चाई में यह व्यवस्था कई वास्तविक किसानों को बाहर धकेलती दिख रही है. अगर समय रहते इसमें सुधार नहीं हुआ तो यह योजना लाभ से ज्यादा विवाद का कारण बन सकती है.

8 hours ago
