कुमार भास्कर वर्मा कौन थे? जिनके नाम पर बना असम में सेतु, वो 'अजेय' राजा, जिसका चीन तक बजा डंका

1 hour ago

Kumar Bhaskar Varma Setu: असम को एक नया तोहफा मिलने वाला है. यह तोहफा भारत के विकास की नई कहानी है. ब्रह्मपुत्र नदी पर बने छह लेन वाले कुमार भास्कर वर्मा सेतु का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे. करीब 3300 करोड़ रुपए की लागत से तैयार यह 1.24 किलोमीटर लंबा एक्स्ट्राडोज्ड ब्रिज 8.4 किलोमीटर के कनेक्टिविटी कॉरिडोर का अहम हिस्सा है. इस तमाम बातों के बीच एक सवाल जो लोगों के मन में उठ रहा है वह है कुमार भास्कर वर्मा कौन थे और उनके नाम पर ही सेतु का नाम क्यों रखा गया. यह सेतु सिर्फ एक पुल नहीं बल्कि असम के बुनियादी ढांचे, आर्थिक विकास और सामाजिक संपर्क का नया प्रतीक बनकर उभर रहा है.

NDTV की रिपोर्ट के अनुसार सालों से गुवाहाटी और नॉर्थ गुवाहाटी के बीच यात्रा करने वाले लोगों के लिए यह पुल समय और दूरी दोनों को कम करने वाला ऐतिहासिक प्रोजेक्ट माना जा रहा है. यह सेतु शहर के यातायात दबाव को कम करने के साथ-साथ ब्रह्मपुत्र के दोनों किनारों को तेज और सुरक्षित सड़क संपर्क से जोड़ेगा. खास बात यह है कि अब लोगों को घंटों की जाम और मौसम पर निर्भर रहने वाली फेरी सेवा की परेशानी से राहत मिलेगी.

सेतु का नाम कुमार भास्कर वर्मा के नाम पर क्यों रखा गया?

कुमार भास्कर वर्मा प्राचीन इतिहास के प्रभावशाली शासकों में गिने जाते हैं. उनका शासनकाल 7वीं शताब्दी में असम के स्वर्ण युग के रूप में जाना जाता है. उन्होंने न केवल अपने राज्य को राजनीतिक और आर्थिक रूप से मजबूत बनाया बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी असम की पहचान स्थापित की. चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी अपने यात्रा विवरण में कामरूप की समृद्ध संस्कृति और शिक्षा व्यवस्था का उल्लेख किया था.

कुमार भास्कर वर्मा का ऐतिहासिक महत्व क्या रहा?

उन्होंने उत्तर भारत के सम्राट हर्षवर्धन के साथ मजबूत राजनीतिक और सैन्य गठबंधन बनाया था. उनके शासनकाल में कामरूप क्षेत्र का विस्तार बंगाल, सिलहट और त्रिपुरा तक हुआ. उनके समय में असम व्यापार, शिक्षा, कला और उद्योग का प्रमुख केंद्र बन चुका था. बांस, रेशम, अगरवुड और धातु उद्योग उस दौर में काफी विकसित थे.

कुमार भास्कर वर्मा को ‘अजेय’ राजा क्यों कहा जाता है?

कुमार भास्कर वर्मा को उनकी मजबूत सैन्य रणनीति और कूटनीतिक क्षमता के कारण ‘अजेय’ शासक माना जाता है. उनके शासनकाल में कामरूप राज्य ने अपनी सीमाओं का विस्तार किया और बाहरी आक्रमणों का सफलतापूर्वक मुकाबला किया. उन्होंने विशाल सेना और शक्तिशाली नौसैनिक बेड़ा तैयार किया था. इस सेना में हजारों नावें और हाथी शामिल थे. उन्होंने राजनीतिक गठबंधन बनाकर भी अपने राज्य को मजबूत किया. इससे कामरूप उस दौर में उत्तर-पूर्व भारत की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में शामिल हो गया.

ह्वेनसांग के यात्रा विवरण में कुमार भास्कर वर्मा के शासन को कैसे दर्शाया गया है?

चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा विवरण ‘ट्रैवल्स एण्ड लाइफ’ में कुमार भास्कर वर्मा को एक विद्वान, दूरदर्शी और जनता के प्रिय शासक के रूप में बताया है. उन्होंने लिखा कि कामरूप उस समय कृषि, शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में बेहद समृद्ध था. वहां के लोग ज्ञान प्राप्ति के प्रति उत्साही थे और दूर-दूर से विद्वान अध्ययन के लिए आते थे. ह्वेनसांग ने यह भी उल्लेख किया कि कामरूप में सुव्यवस्थित सिंचाई व्यवस्था और संतुलित जलवायु थी, जिससे राज्य आर्थिक रूप से मजबूत बना हुआ था.

कुमार भास्कर वर्मा सेतु गुवाहाटी के लिए कितना महत्वपूर्ण है?

यह पुल गुवाहाटी के शहरी विकास की दिशा में एक गेम चेंजर साबित होगा. अभी तक गुवाहाटी से नॉर्थ गुवाहाटी पहुंचने में 45 मिनट से लेकर एक घंटे तक का समय लग जाता था. लेकिन नए सेतु के बनने से यह सफर घटकर सिर्फ 7 से 10 मिनट रह जाएगा. इससे रोजाना हजारों यात्रियों, छात्रों और व्यापारियों को बड़ी राहत मिलेगी.

इस पुल के बनने से यातायात व्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?

गुवाहाटी में वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है. सड़कों और पुराने पुलों पर भारी दबाव बनता जा रहा है. खासतौर पर सराईघाट ब्रिज पर अक्सर ट्रैफिक जाम की समस्या बनी रहती है. ऐसे में नया सेतु इस दबाव को कम करेगा और वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराएगा. इसके अलावा यह ब्रिज भारी वाहनों और बढ़ते शहरी ट्रैफिक को बेहतर तरीके से संभालने के लिए डिजाइन किया गया है.

मौसम और प्राकृतिक चुनौतियों के बीच यह पुल कितना उपयोगी होगा?

ब्रह्मपुत्र नदी अपने तेज बहाव और बाढ़ के लिए जानी जाती है. मानसून के दौरान फेरी सेवा अक्सर बाधित हो जाती थी, जबकि सर्दियों में घना कोहरा भी आवाजाही को प्रभावित करता था. कुमार भास्कर वर्मा सेतु ऑल-वेदर कनेक्टिविटी प्रदान करेगा. इससे साल भर बिना रुकावट आवाजाही संभव होगी.

इस प्रोजेक्ट के निर्माण की पृष्ठभूमि क्या रही?

इस पुल की प्लानिंग 2016 में असम में एनडीए सरकार बनने के बाद शुरू हुई थी. सिंगापुर की कंपनी सुरबाना जुरोंग को डिजाइन तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई. इसके बाद ब्रिक्स देशों के न्यू डेवलपमेंट बैंक ने इस प्रोजेक्ट को वित्तीय सहायता दी. यह पूर्वोत्तर भारत में इस बैंक की पहली बड़ी परियोजना भी है.

इस पुल से क्षेत्रीय विकास पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

यह सेतु न केवल गुवाहाटी बल्कि पूरे उत्तर असम के आर्थिक विकास को गति देगा. इससे पर्यटन, व्यापार और औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा. साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आसान होगी. यह परियोजना राज्य के इंफ्रास्ट्रक्चर विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है.

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