कौन हैं ट्रंप के वो खास दूत, जो दिल्‍ली आकर जयशंकर से मिले, ठीक उस वक्‍त जब EU से हो रही डील फाइनल

1 hour ago

एक तरफ भारत और यूरोपियन यूनियन (EU) के बीच एक बड़े व्यापार समझौते की चर्चाएं अंतिम दौर में हैं, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका ने अपने ‘पावर हाउस’ कहे जाने वाले तीन दिग्गजों को विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर से मिलने भेजा. यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब वाशिंगटन और नई दिल्ली के रिश्ते एक नाजुक मोड़ पर हैं. अमेरिका ने भारतीय सामानों पर 50% टैरिफ लगा रखा है. इस तनाव के बीच, ट्रंप प्रशासन के करीबी राजदूत सर्जियो गोर की अगुवाई में माइक रोजर्स, एडम स्मिथ और जिमी पैट्रोनिस का भारत आना यह बताता है कि अमेरिका, भारत को अपने पाले से दूर नहीं जाने देना चाहता. आइए जानते हैं कौन हैं ये तीन ‘खास दूत’, क्यों अमेरिका में इनकी तूती बोलती है और भारत के लिए इनका आना क्यों मायने रखता है.

माइक रोजर्स: ड‍िफेंस डील के मास्‍टर

अलाअबामा से रिपब्लिकन सांसद माइक रोजर्स अमेरिकी संसद (कांग्रेस) के सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों में से एक हैं. वे ‘हाउस आर्म्ड सर्विसेज कमेटी’ (HASC) के चेयरमैन हैं. अमेरिकी सेना को कब, कहां और कितना पैसा मिलेगा, यह माइक रोजर्स तय करते हैं. पेंटागन का बजट उनकी कलम से होकर गुजरता है. वे अमेरिकी ड‍िफेंस पॉलि‍सी के हेड हैं. ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी से होने के कारण उनकी व्हाइट हाउस में सीधी पैठ है. वे चीन के कट्टर विरोधी माने जाते हैं और अमेरिकी सैन्य शक्ति को बढ़ाने के पक्षधर हैं.

भारत के लिए इनका आना क्यों महत्वपूर्ण है?
माइक रोजर्स का भारत आना यह संकेत है कि भले ही ट्रेड को लेकर दोनों देशों में झगड़ा हो, लेकिन ड‍िफेंस के मामले में अमेरिका भारत को नाराज नहीं कर सकता. भारत और अमेरिका के बीच जेट इंजन (GE-414), ड्रोन्स और सेमीकंडक्टर को लेकर जो समझौते हुए हैं, उन्हें संसद से मंजूरी दिलाने में रोजर्स की भूमिका अहम है. रोजर्स यह सुनिश्चित करने आए हैं कि इंडो-पैसिफिक में चीन को रोकने के लिए भारत और अमेरिका की सेनाएं साथ मिलकर काम करती रहें, भले ही व्यापारिक मोर्चे पर तनाव हो.

एडम स्मिथ : व‍िपक्ष का बड़ा चेहरा

वाशिंगटन राज्य से डेमोक्रेटिक सांसद एडम स्मिथ, ‘हाउस आर्म्ड सर्विसेज कमेटी’ में ‘रैंकिंग मेंबर’ हैं. इसका मतलब है कि वे इस कमेटी में विपक्ष (डेमोक्रेट्स) के सबसे बड़े नेता हैं. इससे पहले वे इस कमेटी के चेयरमैन रह चुके हैं. रक्षा मामलों में उनकी पकड़ उतनी ही मजबूत है जितनी माइक रोजर्स की. वे अक्सर मानवाधिकार और उदारवादी मूल्यों की बात करते हैं लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा पर समझौता नहीं करते. उनका डेलिगेशन में होना यह दिखाता है कि भारत के साथ रिश्तों को लेकर अमेरिका में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स दोनों एकमत हैं.

भारत के लिए इनका आना क्यों महत्वपूर्ण है?
जहां ट्रंप प्रशासन (रिपब्लिकन) आक्रामक फैसले ले रहा है, एडम स्मिथ की मौजूदगी बातचीत को संतुलित करती है. एडम स्मिथ उस वाशिंगटन राज्य से आते हैं जो टेक्नोलॉजी का गढ़ है. भारत को जो ‘क्रिटिकल टेक्नोलॉजी’ चाहिए, उसके लिए स्मिथ का समर्थन जरूरी है. उनका भारत आना यह संदेश देता है कि “टैरिफ वार” के कारण तकनीक का लेन-देन नहीं रुकेगा.

जिमी पैट्रोनिस: ट्रंप के ‘फायदा-नुकसान’ के हिसाब-किताब रखने वाले

जिमी पैट्रोनिस फ्लोरिडा राज्य के चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर हैं. हालांकि वे सांसद नहीं हैं, लेकिन डेलिगेशन में उनकी मौजूदगी सबसे दिलचस्प है. वे फ्लोरिडा से आते हैं, जो डोनाल्ड ट्रंप का गृह राज्य है. वे ट्रंप के बेहद करीबी माने जाते हैं और रिपब्लिकन पार्टी के बिजनेस विंग का प्रतिनिधित्व करते हैं. पैट्रोनिस वाशिंगटन की पारंपरिक राजनीति से ज्यादा ‘व्यापारिक हितों’ का प्रतिनिधित्व करते हैं. वे वित्तीय मामलों के जानकार हैं और ट्रंप की उस विचारधारा का प्रतीक हैं जो हर रिश्ते को “प्रॉफिट और लॉस” (लाभ-हानि) के तराजू पर तौलती है.

भारत के लिए इनका आना क्यों महत्वपूर्ण है?

पैट्रोनिस का डेलिगेशन में होना साफ करता है कि मुख्य मुद्दा ‘पैसा’ और ‘मार्केट एक्सेस’ है. अमेरिका चाहता है कि भारत अपने डेरी (दूध-दही) और कृषि क्षेत्र को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोले. वे संभवतः ट्रंप का वह संदेश लेकर आए हैं कि अगर भारत ने अमेरिकी सामानों पर टैक्स कम नहीं किया, तो आर्थिक परिणाम भुगतने होंगे. उनकी उपस्थिति बातचीत को शुद्ध रणनीतिक से हटाकर व्यापारिक सौदेबाजी पर लाती है.

मुलाकात की टाइमिंग खास

यूरोपियन यूनियन का डर: भारत और EU के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट लगभग फाइनल होने वाला है. अगर यह हो जाता है, तो जर्मन और फ्रेंच कंपनियों को भारत के विशाल बाजार में बिना टैक्स के एंट्री मिल जाएगी, जबकि अमेरिकी कंपनियों को भारी टैक्स देना होगा. अमेरिका कभी नहीं चाहेगा कि उसकी कंपनियां जैसे फोर्ड, टेस्ला या एप्पल यूरोपियन कंपनियों से पिछड़ जाएं. माइक रोजर्स और उनकी टीम का उद्देश्य यह टटोलना था कि भारत-EU डील कितनी आगे बढ़ी है और अमेरिका इसमें कहां फिट बैठता है.

टैरिफ वॉर का ‘शॉक एब्जॉर्बर’ : डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय सामानों पर 50% टैरिफ लगाकर एक तरह से आर्थिक युद्ध का ऐलान किया है. इसके जवाब में भारत ने भी कड़े तेवर दिखाए हैं. इतिहास गवाह है कि जब-जब अमेरिका के राष्ट्रपति भारत के खिलाफ सख्त होते हैं, तब-तब वहां की संसद रिश्तों को बचाने के लिए आगे आती है. यह डेलिगेशन एक ‘शॉक एब्जॉर्बर’ की तरह काम कर रहा है. उनका संदेश है- व्हाइट हाउस के फैसलों से घबराइए मत, अमेरिकी संसद अभी भी भारत को एक दीर्घकालिक साझेदार मानती है.

रूस-यूक्रेन का पेच: जयशंकर के साथ बातचीत में यूक्रेन का मुद्दा भी उठा. अमेरिका इस बात से नाराज है कि भारत रूस से तेल खरीदकर उसकी अर्थव्यवस्था को मदद कर रहा है. माइक रोजर्स और एडम स्मिथ, जो अमेरिकी रक्षा मशीनरी को चलाते हैं, उन्होंने संभवतः भारत को यह समझाने की कोशिश की है कि रूसी हथियारों और तेल पर निर्भरता कम की जाए और अमेरिकी विकल्पों को अपनाया जाए.

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