पश्चिम बंगाल का सिंगूर दो दशकों से राजनीतिक चर्चा का स्थायी केंद्र बना हुआ है. वह जमीन जहां कभी टाटा मोटर्स की नैनो कार फैक्ट्री के लिए करीब 1000 एकड़ जमीन आबंटित की गई था, आज भी ज्यादातर बंजर पड़ी हुई है. इस बंजर जमीन के साथ ही किसानों और युवाओं के रोजगार के अवसर अधूरे सपने बनकर रह गए हैं. यही विवादित भूमि अब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर राजनीतिक लड़ाई का प्रतीक बन गई है, जिसके जरिये भाजपा अब कमल खिलाने की उम्मीद में है.
बीजेपी सिंगूर के मुद्दे को राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग करने की तैयारी में है. यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज हुगली जिले के सिंगूर में रैली करने वाले हैं. पीएम मोदी यहां लगभग 830 करोड़ रुपये की विभिन्न विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और आधारशिला भी रखेंगे. प्रधानमंत्री के इस कार्यक्रम के जरिये बीजेपी इसे ‘औद्योगिक पुनरुत्थान’ का प्रतीक बता रही है और वादा कर रही है कि सत्ता में आई तो टाटा वापस लाएगी.
बीजेपी यहां सिंगूर के सियासी चक्रव्यूह में घेरकर ममता बनर्जी की टीएमसी को मात देने की तैयारी में है. इस लड़ाई में बीजेपी के ‘पांडव’ सुवेंदुअधिकारी, शमिक भट्टाचार्य, सुकांत मजुमदार, दिलीप घोष और फाल्गुनी पात्रा सीएम ममता बनर्जी के चक्रव्यूह को भेदने के लिए तैयार हैं. ये पांचों नेता सिंगूर को बीजेपी की चुनावी रणनीति का केंद्र बनाने और ममता की ‘परिवर्तन’ वाली कहानी को उलटने की कोशिश में जुटे हैं.
सिंगूर के ‘योद्धा’ सुवेंदु अधिकारी
सुवेंदु अधिकारी सिंगूर आंदोलन के समय ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद सहयोगी थे. नंदीग्राम और सिंगूर में उन्होंने टीएमसी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर विरोध किया था. लेकिन 2020 में बीजेपी में शामिल होने के बाद वे सीएम ममता की सबसे बड़े आलोचक बन गए. अधिकारी बार-बार कहते हैं कि सिंगूर आंदोलन किसानों के लिए नहीं, बल्कि ममता की राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए था. उन्होंने कहा है कि ‘सिंगूर में टाटा आया था, लेकिन ममता ने किसानों को धोखा दिया. अब बीजेपी आएगी तो टाटा वापस आएगा और रोजगार आएगा.’
सुवेंदु अधिकारी सिंगूर को ‘ममता की राजनीतिक चाल’ बताकर बीजेपी की चुनावी रणनीति में अहम भूमिका निभा रहे हैं. वे दावा करते हैं कि अगर बीजेपी सत्ता में आई तो सिंगूर में बड़ा इंडस्ट्रियल कॉरिडोर बनेगा. उनकी लोकप्रियता और संगठन कौशल बीजेपी के लिए पूर्वी मिदनापुर और हूगली में गेमचेंजर साबित हो सकता है.
सिंगूर को ‘औद्योगिक कब्रिस्तान’ बताने वाले शमिक भट्टाचार्य
बंगाल बीजेपी के अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य सिंगूर को पश्चिम बंगाल के ‘औद्योगिक कब्रिस्तान’ का प्रतीक बताते हैं. उन्होंने कहा कि ‘सिंगूर में टाटा का प्लांट लगता तो हजारों रोजगार मिलते, लेकिन ममता की राजनीति ने सब बर्बाद कर दिया.’ भट्टाचार्य मोदी की सिंगूर रैली को ‘परिवर्तन का नया अध्याय’ बताते हैं और दावा करते हैं कि बीजेपी सत्ता में आई तो टाटा मोटर्स को वापस लाएगी. वे संगठन स्तर पर काम कर रहे हैं और सिंगूर किसानों को बीजेपी की ओर लाने की कोशिश में जुटे हैं. भट्टाचार्य की रणनीति है कि सिंगूर को विकास बनाम राजनीति के मुद्दे पर पेश किया जाए, ताकि टीएमसी की ‘भूमि बचाओ’ वाली छवि ध्वस्त हो.
सुकांत मजुमदार ने सिंगूर में ‘टाटा वापसी’ का किया वादा
केंद्रीय मंत्री सुकांत मजुमदार सिंगूर को बंगाल के ‘खोए हुए अवसर’ का प्रतीक बताते हैं. उनका कहना है कि ‘जिस दिन टाटा सिंगूर से चला गया, तभी से सारे उद्योग बंगाल छोड़कर चले गए.’ मजुमदार ने सिंगूर जाकर किसानों से मुलाकात की और वादा किया कि बीजेपी सत्ता में आई तो टाटा मोटर्स वापस आएगी और नई फैक्ट्री लगेगी. वे मोदी की रैली को ‘औद्योगिक क्रांति’ का संदेश बताते हैं और दावा करते हैं कि ‘सिंगूर में कमल खिलेगा और बंगाल में विकास आएगा.’ मजुमदार की सक्रियता से बीजेपी सिंगूर को चुनावी मुद्दा बनाने में सफल हो रही है.
सिंगूर मुद्दे पर ममता को घेरते रहे दिलीप घोष
बंगाल बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष दिलीप घोष सिंगूर को ‘किसानों के साथ धोखा’ का सबसे बड़ा उदाहरण बताते हुए ममता बनर्जी सरकार को घेरते रहे हैं. उनका कहना है कि ममता बनर्जी ने किसानों को लुभाया, लेकिन सत्ता में आकर उन्हें छोड़ दिया. घोष संगठन स्तर पर काम कर रहे हैं और सिंगूर में बीजेपी की जमीनी तैयारी मजबूत कर रहे हैं. वे कहते हैं कि सिंगूर में बीजेपी आएगी तो किसानों को रोजगार मिलेगा, टाटा आएगी और बंजर जमीन हरी-भरी हो जाएगी. घोष की आक्रामक शैली और हिंदुत्व एजेंडा बीजेपी के लिए सिंगूर में ध्रुवीकरण का हथियार बन सकता है.
फाल्गुनी पात्रा ने संभाला महिला मोर्चा
पश्चिम बंगाल भाजपा की महिला नेतृत्व में फाल्गुनी पात्रा का भी उल्लेखनीय योगदान रहा है. फाल्गुनी पात्रा पीएम मोदी की रैली में सिंगूर की महिलाओं को आगे लाकर ‘नारी शक्ति’ का नैरेटिव पेश कर रही हैं. वे दावा करती हैं कि बीजेपी सत्ता में आई तो महिलाओं को रोजगार और सम्मान मिलेगा. पात्रा की सक्रियता से बीजेपी सिंगूर में महिला वोट बैंक मजबूत करने की कोशिश कर रही है.
सिंगूर बीजेपी के लिए गेमचेंजर क्यों?
सिंगूर बीजेपी के लिए महज एक जगह नहीं, बल्कि ममता बनर्जी की राजनीतिक विरासत पर हमला है. 2008 का आंदोलन ममता को सत्ता दिलाने वाला था, लेकिन आज वही किसान निराश हैं. बीजेपी इसे ‘विकास बनाम राजनीति’ का मुद्दा बना रही है. पीएम मोदी की रैली से बीजेपी का संदेश साफ है, ‘हम टाटा लाएंगे, रोजगार लाएंगे, सिंगूर को फिर से हरा-भरा बनाएंगे.’
सिंगूर के इस सियासी रण में बीजेपी के ये पांचों नेता ममता के चक्रव्यूह को भेदने में माहिर हैं. सुवेंदु की जमीनी ताकत, शमिक की संगठन क्षमता, सुकांत का केंद्रीय कनेक्शन, दिलीप का आक्रामक हिंदुत्व और फाल्गुनी की महिला अपील… ये सब मिलकर सिंगूर को बीजेपी की चुनावी जीत का केंद्र बना सकते हैं. हालांकि इस सबके बीच एक अहम सवाल वही है कि क्या सिंगुर की बंजर जमीन पर अब कमल खिल पाएगा? इसका जवाब इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में मिल जाएगा.

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