India US Trade Deal: भारत और अमेरिका ने सोमवार को ट्रेड डील पर सहमति की घोषणा कर दी. दोनों देशों के रिश्तों के लिए यह डील एक बहुत बड़ी उपलब्धि है. इस डील के तहत अमेरिका ने भारत पर लगने वाला टैरिफ घटाकर 18 फीसदी कर दिया गया है. इसके साथ ही रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर लगाई गई 25 फीसदी की पेनाल्टी भी हटाने की बात कही गई है. इसके बदले में भारत, अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर का सामान खरीदेगा और अमेरिकी चीजों पर लगने वाले शुल्क को घटाएगा. इससे भारत और अमेरिका दोनों देशों के बीच कारोबारी रिश्ते और मजबूत होंगे. मौजूदा वक्त में अमेरिका भारत का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है. 2024 में दोनों देशों के बीच कुल व्यापार करीब 212 बिलियन डॉलर का था. भारत ने गुड्स और सर्विसेज दोनों मिलाकर करीब 130 बिलियन डॉलर का निर्यात किया. इसमें 45 बिलियन डॉलर का ट्रेड सरप्लस था. ट्रेड सरप्लस का मतलब भारत के कुल निर्यात से आयात 45 बिलियन डॉलर कम था.
व्यापार में बढ़ोतरी की उम्मीद
अब ट्रेड डील होने के बाद दोनों देशों के बीच व्यापार में अच्छी बढ़ोतरी की उम्मीद है. पीएम नरेंद्र मोदी के साथ फोन पर बातचीत के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ पर लिखा कि यह समझौता तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है, जिसमें अमेरिका भारतीय सामानों पर लगाए गए टैरिफ को 25 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी कर देगा. टैरिफ के नजरिये से देखें तो भारत यह टैरिफ दर प्रतियोगी देशों की तुलना में काफी कम है. इंडोनेशिया पर अमेरिकी टैरिफ 19 फीसदी, वियतनाम पर 20 फीसदी, बांग्लादेश पर 20 फीसदी और चीन पर 34 फीसदी है.
भारत और अमेरिका के बीच यह सहमति एक बड़ी उपलब्धि है.
क्या भारत बंद करेगा रूस से तेल खरीद
डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि पीएम मोदी ने रूसी तेल की खरीद रोकने पर सहमति जताई है और इसके बदले अमेरिका से ज्यादा तेल खरीदेंगे, साथ ही संभावित रूप से वेनेजुएला से भी. ट्रंप ने लिखा- मोदी ने रूसी तेल खरीदना बंद करने पर सहमत हो गए हैं और अमेरिका से बहुत ज्यादा तेल खरीदेंगे. उन्होंने आगे कहा कि भारत अमेरिकी टैरिफ और गैर-टैरिफ बैरियर्स को शून्य तक कम करेगा. इसके अलावा, मोदी ने अमेरिकी ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, कृषि, कोयला और अन्य उत्पादों में 500 अरब डॉलर से अधिक की खरीदारी का वादा किया है.
अमेरिका के साथ यह डील विकासशील देशों खासकर ग्लोबल साउथ के लिए एक बड़ी उपलब्धि है. भारत ग्लोबल साउथ की मुखर आवाज है. इससे उन देशों को बल मिलेगा कि वे भी भारत की तरह अमेरिका के साथ डील करें. किसी दबाव में झुकने की बजाय अमेरिका के साथ बातचीत करें.
ग्लोबल साउथ क्या है?
दरअसल, ग्लोबल साउथ एक भौगोलिक, आर्थिक और राजनीतिक अवधारणा है, जो मुख्य रूप से विकासशील, कम विकसित या उभरते हुए देशों को संदर्भित करती है. यह शब्द थर्ड वर्ल्ड की जगह इस्तेमाल होता है. इसमें ज्यादातर दक्षिणी गोलार्ध में स्थित देश शामिल है. हालांकि यह पूरी तरह भौगोलिक नहीं बल्कि सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर आधारित है. ये देश ऐतिहासिक रूप से औपनिवेशिक शोषण, गरीबी, असमानता और वैश्विक संस्थाओं में कम प्रतिनिधित्व से जूझते हैं. संयुक्त राष्ट्र ट्रेड एंड डेवलपमेंट (UNCTAD) के अनुसार ग्लोबल साउथ में अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरिबियन, एशिया (इजराइल, जापान, दक्षिण कोरिया को छोड़कर) और ओशिनिया (ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड को छोड़कर) के अधिकांश देश आते हैं. इसमें भारत, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, नाइजीरिया, मेक्सिको, अर्जेंटीना, मिस्र, केन्या, इथियोपिया, घाना, बांग्लादेश, पाकिस्तान, वियतनाम आदि प्रमुख देश शामिल हैं. ये देश विश्व की लगभग 75-85 फीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं और वैश्विक जीडीपी में तेजी से बढ़ती हिस्सेदारी रखते हैं. ग्लोबल साउथ का उदय ब्रिक्स, G-77, गुट निरपेक्ष आंदोलन (NAM) जैसे मंचों से जुड़ा है, जहां ये देश वैश्विक उत्तर (विकसित देश जैसे अमेरिका, यूरोप, जापान) के प्रभुत्व वाली संस्थाओं में सुधार की मांग करते हैं.

1 hour ago
