जजों की ट्रांसफर-पोस्टिंग में सरकार की कोई भूमिका नहीं- जस्टिस भुयान

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Last Updated:January 25, 2026, 13:16 IST

जस्टिस उज्ज्वल भुयान ने ILS लॉ कॉलेज पुणे में कहा जजों का तबादला न्यायपालिका का आंतरिक मामला है, सरकार का कोई दखल नहीं होना चाहिए, संविधान सर्वोच्च है, न्यायिक स्वतंत्रता अटल है.

जजों की ट्रांसफर-पोस्टिंग में सरकार की कोई भूमिका नहीं- जस्टिस भुयानसुप्रीम कोर्ट के जज उज्ज्वल भुयान ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर बड़ी बात कही है.

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुयान ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जजों का तबादला न्यायपालिका का आंतरिक मामला है और इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं है. न्यायपालिका की स्वतंत्रता चर्चा का विषय नहीं हो सकता. इसे हर कीमत पर बनाए रखना जरूरी है, ताकि संस्था की प्रासंगिकता और वैधता बनी रहे. शनिवार को आईएलएस लॉ कॉलेज, पुणे में जी वी पंडित मेमोरियल लेक्चर देते हुए जस्टिस भुयान ने कहा कि जज का तबादला हमेशा न्याय प्रशासन को बेहतर बनाने के लिए होता है. यह न्यायपालिका का आंतरिक मामला है. सरकार इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकती. केंद्र सरकार यह नहीं कह सकती कि फलां जज को ट्रांसफर नहीं करना चाहिए या ट्रांसफर करना चाहिए और अगर ट्रांसफर हो तो किस हाईकोर्ट में.

उन्होंने जोर देकर कहा कि संविधान की मूल संरचना का एक अहम हिस्सा न्यायपालिका की स्वतंत्रता है. यह अटल है. न्यायपालिका के सदस्यों की जिम्मेदारी है कि वे इसे हर हाल में संरक्षित रखें. अगर हम अपनी विश्वसनीयता खो देंगे, तो न्यायपालिका का दिल और आत्मा दोनों खत्म हो जाएंगे. अदालतें रहेंगी, जज रहेंगे, फैसले होते रहेंगे, लेकिन उसकी सार्थकता और सम्मान खत्म हो जाएगा.

जस्टिस भुयान ने भारत के संवैधानिक ढांचे की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर भी प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि देश के संविधान निर्माताओं ने संसद की संप्रभुता के बजाय संविधान की सर्वोच्चता को चुना. भारत में संसद सर्वोच्च नहीं है, संविधान सर्वोच्च है. इसके दो मुख्य कारण थे. पहला, यह सुनिश्चित करना कि देश कुछ बुनियादी और आवश्यक सिद्धांतों से शासित हो, जिनसे समझौता नहीं किया जा सकता. दूसरा, औपनिवेशिक अतीत के कारण हमारे नेताओं ने संसद को बिना उचित नियंत्रण और संतुलन के असीमित शक्ति नहीं देना चाहा.

इस संदर्भ में उन्होंने संवैधानिक नैतिकता की अहमियत पर बल दिया. संवैधानिक नैतिकता यह सुनिश्चित करती है कि लोकतांत्रिक संस्थाएं स्वतंत्रता और न्याय के मूल मूल्यों का सम्मान करें. सत्ता में बैठे लोगों को संयम दिखाना पड़ता है और संवैधानिक मूल्यों का पालन करना पड़ता है, न कि संख्या, अधिकार या शक्ति के बल पर फैसले थोपने चाहिए.

बहुमत नहीं कानून के शासन से चले देश

जस्टिस भुयान ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक नैतिकता का मतलब है कि देश व्यक्तियों या बहुमत के शासन से नहीं, बल्कि कानून के शासन से चले. एक स्वतंत्र न्यायपालिका न केवल कानून के शासन की रक्षा करती है, बल्कि लोकतंत्र का केंद्रीय स्तंभ भी है.

उनके इस बयान का महत्व तब और बढ़ जाता है, जब हाल के वर्षों में जजों के तबादले और कॉलेजियम सिस्टम को लेकर केंद्र सरकार और न्यायपालिका के बीच समय-समय पर मतभेद सामने आते रहे हैं. जस्टिस भुयान ने साफ कर दिया कि जजों की नियुक्ति और तबादले में सरकार का कोई दखल नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह न्यायिक स्वतंत्रता की बुनियाद को कमजोर कर सकता है.

लेक्चर में मौजूद विधि छात्रों, वकीलों और शिक्षाविदों ने जस्टिस भुयान के विचारों की सराहना की. कई लोगों ने इसे वर्तमान संदर्भ में न्यायपालिका की मजबूती और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का मजबूत संदेश बताया. यह लेक्चर ऐसे समय में आया है जब देश में न्यायिक स्वतंत्रता, कॉलेजियम प्रणाली की पारदर्शिता और कार्यपालिका-न्यायपालिका के बीच संतुलन जैसे मुद्दे बार-बार चर्चा में रहते हैं.

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संतोष कुमार

न्यूज18 हिंदी में बतौर एसोसिएट एडिटर कार्यरत. मीडिया में करीब दो दशक का अनुभव. दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, आईएएनएस, बीबीसी, अमर उजाला, जी समूह सहित कई अन्य संस्थानों में कार्य करने का मौका मिला. माखनलाल यूनिवर्स...और पढ़ें

First Published :

January 25, 2026, 13:08 IST

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