जब जलजले से कांपी 2 देशों की धरती, भूकंप ने बदल दिया भूगोल, सेकेंडों में ही बिछ गईं 20 हजार लाशें

1 hour ago

1934 MahaBhukamp/Bihar-Nepal earthquake: आज करीब 90 साल पहले के इतिहास में चलते हैं. कहानी 15 जनवरी 1934 की है जब दोपहर करीब 2:13 बजे भारत और नेपाल की सीमा पर धरती अचानक थरथराने लगी. यह कोई साधारण कंपन नहीं था. यह हिमालय की गहराइयों से निकला एक महाभूकंप था, जिसने दोनों देशों की जमीन को हिला दिया. लोग दोपहर के भोजन में लगे थे, बच्चे खेल रहे थे, बाजार गुलजार थे- तभी सेकंडों में सब कुछ तबाह हो गया. मकान धड़ाधड़ गिर गए, सड़कें फट गईं, नदियां उफान पर आ गईं और बहाव के मार्ग बदल गए. यह दिन दोनों देशों के इतिहास की सबसे भयानक आपदाओं में से एक बन गया.

हिमालय की गहराई से उठा तूफान

भूकंप का केंद्र पूर्वी नेपाल में था, माउंट एवरेस्ट से करीब 9-10 किलोमीटर दक्षिण में. शुरुआती रिपोर्टों में इसे बिहार के मैदानी इलाके में बताया गया था, लेकिन बाद के वैज्ञानिक अध्ययनों ने सही जगह नेपाल में ही निर्धारित की. इसकी तीव्रता रिक्टर स्केल पर 8.0 से 8.3 के बीच मानी जाती है. इस भूकंप का केंद्र हिमालय की मुख्य थ्रस्ट फॉल्ट पर आया, जहां भारतीय प्लेट यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है. कंपन इतना तेज था कि कोलकाता (650 किमी दूर) तक इमारतें हिल गईं. तिब्बत के ल्हासा और पंजाब तक झटके महसूस हुए.

10,700 से 20,000 की मौत की आशंका

मौतों की संख्या पर अलग-अलग स्रोत अलग-अलग आंकड़े देते हैं. ब्रिटिश रिपोर्टों के अनुसार बिहार में 7,253 मौतें दर्ज हुईं. नेपाल में यह संख्या ज्यादा थी. कुल मिलाकर 10,700 से 12,000 मौतें सबसे विश्वसनीय अनुमान हैं. कुछ स्थानीय और ऐतिहासिक रिपोर्टों में इसे 15,700 से ज्यादा, यहां तक कि 20,000 से अधिक भी बताया जाता है. घटना के बाद तमाम घायलों की मौत हुई थी. नेपाल के दूर-दराज के इलाकों के आंकड़े भी काफी बाद में आए थे. काठमांडू घाटी, भक्तपुर, मुंगेर, मुजफ्फरपुर, दरभंगा जैसे इलाकों में तबाही सबसे ज्यादा थी.

नदियों का रुख बदला, सीमाएं हिल गईं

भूकंप ने सिर्फ इंसानों और मकानों को नहीं, बल्कि भूगोल को भी बदल दिया. कोसी, गंडक, बागमती जैसी नदियां जो भारत-नेपाल सीमा पर बहती थीं, उनके मार्ग में बड़े बदलाव आए. भारी भूस्खलन, भूमि धंसाव और मिट्टी का तरल होना (लिक्विफैक्शन) से नदियां नई दिशा में बहने लगीं. बिहार में 300 किलोमीटर लंबा स्लंप बेल्ट बन गया, जहां जमीन कई मीटरों तक नीचे धंस गई. कई गांव, खेत और सीमा पोस्ट प्रभावित हुए. कुछ जगहों पर सीमा रेखा ही बदल गई. यह बदलाव इतना स्थायी था कि आज भी नदियों के नए कोर्स और बाढ़ पैटर्न में उसकी छाप दिखती है.

मलबे में दबी चीखें

मुंगेर और मुजफ्फरपुर जैसे शहर पूरी तरह तबाह हो गए. नेपाल में भक्तपुर, बिरगंज, काठमांडू घाटी में प्राचीन मंदिर गिरे. सड़कें टूटीं, पुल बह गए, रेलवे लाइनें मुड़ गईं. लोग मलबे तले दब गए. धूल के गुबार में चीखें गूंजती रहीं, लेकिन मदद पहुंचने में समय लगा. पटना तक के बाजार उजड़ गए. यह तबाही देखकर लगता था मानो धरती ने गुस्सा निकाल दिया हो.

बचाव और राहत: एकजुट हुए दोनों देश

उस समय संसाधन सीमित थे, लेकिन प्रयास जबरदस्त थे. ब्रिटिश भारत में बिहार के राहत आयुक्त डब्ल्यूबी ब्रेट ने नेतृत्व किया. स्थानीय नेता श्रीकृष्ण सिंह (श्री बाबू), अनुग्रह नारायण सिंह और मगफूर अहमद आजाजी ने दिन-रात राहत कार्य किया. महात्मा गांधी ने दौरा किया. नेपाल में महाराजा जुद्ध शमशेर के नेतृत्व में नेपाली सेना ने मलबा हटाया, घायलों को निकाला, शिविर लगाए. दोनों तरफ सेना, स्वयंसेवी और आम लोग मिलकर काम करते रहे. भोजन, दवा, कपड़े बांटे गए, लेकिन सर्दी और संचार की कमी से कई जानें चली गईं. अगर आज ऐसा भूकंप आए तो भीषण तबाही हो सकती है. आज जनसंख्या 10-20 गुना ज्यादा है. पटना, मुजफ्फरपुर, काठमांडू जैसे शहर घनी आबादी वाले हैं. अनियोजित निर्माण, ऊंची इमारतें, स्लम क्षेत्र के कारण जोखिम काफी ज्यादा है. 2015 के गोर्खा भूकंप (7.8) में 9,000 मौतें हुईं. अगर 1934 जैसा 8+ का भूकंप आए तो लाखों मौतें हो सकती हैं.

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