Last Updated:January 23, 2026, 22:54 IST
Odisha Elderly Love Story: ओडिशा के 75 वर्षीय बाबू लोहार ने प्यार और समर्पण की ऐसी मिसाल पेश की है जिसे सुनकर आंखें भर आएंगी. अपनी लकवाग्रस्त पत्नी का इलाज कराने के लिए इस बुजुर्ग ने संबलपुर से कटक तक 267 किलोमीटर का सफर पैदल तय किया. हाथ से रिक्शा रिक्शा खींचते हुए उन्होंने बुढ़ापे की थकान और गरीबी को मात दे दी. प्रशासन की मदद ठुकराकर उन्होंने उसी रिक्शा के साथ वापस लौटने का फैसला किया.
ओडिशा के शख्स ने प्यार की मिसाल पेश की. कहते हैं कि प्यार में इंसान सात समंदर पार कर जाता है लेकिन ओडिशा के संबलपुर के एक बुजुर्ग ने जो किया वह किसी चमत्कार से कम नहीं है. गरीबी की मार और अपनों के साथ की कमी के बीच 75 साल के बाबू लोहार ने अपनी बीमार पत्नी को यमराज के चंगुल से छुड़ाने के लिए वो कर दिखाया जिसे सुनकर रूह कांप जाए. अपनी लकवाग्रस्त पत्नी को एक पुरानी रिक्शा रिक्शा पर लिटाकर इस बुजुर्ग ने कटक के अस्पताल तक पहुंचने के लिए 267 किलोमीटर का सफर पैदल तय किया. जब जेब में फूटी कौड़ी न हो और शरीर थककर चूर हो चुका हो तब केवल अंगद जैसा संकल्प ही एक इंसान को इतनी लंबी दूरी तक रिक्शा खींचने की ताकत दे सकता है. यह महज एक यात्रा नहीं बल्कि बुढ़ापे में उस फरिश्ते जैसे प्यार की गवाही है जो आज के दौर में दुर्लभ हो चुकी है.
एंबुलेंस के पैसे नहीं थे तो रिक्शा बनी सहारा
संबलपुर के गोलबाजार इलाके के रहने वाले बाबू लोहार की पत्नी मुनीर देवी उर्फ ज्योति को पैरालिसिस (लकवा) का अटैक आया था. गरीबी ऐसी कि न अस्पताल जाने के लिए गाड़ी का किराया था और न ही कोई सहारा देने वाला. ऐसे में बाबू लोहार ने अपनी पुरानी रिक्शा रिक्शा को ही एंबुलेंस बना लिया. करीब दो महीने पहले उन्होंने संबलपुर से कटक के SCB मेडिकल कॉलेज के लिए सफर शुरू किया. उम्र की ढलान पर खड़े इस बुजुर्ग ने धूप, थकान और अनिश्चितता को मात देते हुए अपनी पत्नी को कटक पहुँचाया और इलाज कराया.
संबलपुर से कटक तक का संघर्ष
| मुख्य पात्र | 75 वर्षीय बाबू लोहार और पत्नी मुनीर देवी |
| तय की गई दूरी | 267 किलोमीटर (संबलपुर से कटक) |
| परिवहन का साधन | पुरानी रिक्शा रिक्शा (पैदल खींचकर) |
| वजह | पत्नी का लकवाग्रस्त होना और आर्थिक तंगी |
सवाल-जवाब
सवाल 1: क्या प्रशासन ने उनकी मदद करने की कोशिश की?
जवाब: हाँ, वापसी के दौरान जब उनका छोटा एक्सीडेंट हुआ और वे टांगी स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती हुए, तब पुलिस और अस्पताल स्टाफ ने उन्हें गाड़ी से घर भेजने का प्रस्ताव दिया था.
सवाल 2: बाबू लोहार ने सरकारी गाड़ी लेने से मना क्यों कर दिया?
जवाब: बाबू लोहार का कहना था, “मैं अपनी पत्नी और इस रिक्शा रिक्शा को नहीं छोड़ सकता. यह रिक्शा ही हमारे संघर्ष की गवाह है.” वे उसी रिक्शे पर वापस जाना चाहते थे जिसने उनके दुख को ढोया था.
सवाल 3: अब यह जोड़ा कहाँ है?
जवाब: वे दोबारा उसी रिक्शा रिक्शा को खींचते हुए अपनी पत्नी के साथ संबलपुर की ओर निकल पड़े हैं. उनके पास एक-दूसरे के सिवा और कोई नहीं है.
बुढ़ापे का सच्चा साथी
बाबू लोहार की यह कहानी साबित करती है कि प्यार केवल अमीरी या सुख-सुविधाओं का मोहताज नहीं होता. जब दुनिया साथ छोड़ देती है, तब केवल ‘जीवनसाथी’ का अटूट बंधन ही पहाड़ जैसी मुसीबतों को पार करने की हिम्मत देता है. आज पूरा ओडिशा इस ‘फरिश्ते’ जैसे पति की निष्ठा को सलाम कर रहा है.
About the Author
पत्रकारिता में 14 साल से भी लंबे वक्त से सक्रिय हूं. साल 2010 में दैनिक भास्कर अखबार से करियर की शुरुआत करने के बाद नई दुनिया, दैनिक जागरण और पंजाब केसरी में एक रिपोर्टर के तौर पर काम किया. इस दौरान क्राइम और...और पढ़ें
First Published :
January 23, 2026, 22:47 IST

1 hour ago
