फैज-ए-इलाही मस्जिद का इतिहास: पुरानी दिल्ली, जिसे कभी शाहजहानाबाद के नाम से जाना जाता था, अपने अंदर इतिहास की अनगिनत परतें समेटे हुए है. यहां की हर गली, हर इमारत और हर पत्थर एक कहानी कहता है. इन्हीं संकरी गलियों के बीच स्थित ‘फैज-ए-इलाही मस्जिद’. यह मस्जिद केवल ईंट-पत्थरों से बनी एक इमारत नहीं है, बल्कि यह दिल्ली की ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ और सूफी संतों की आध्यात्मिक विरासत का एक जीवित प्रमाण है. आज के समय में जब हम बड़ी-बड़ी इमारतों को देखते हैं, तो फैज-ए-इलाही मस्जिद अपनी सादगी और शांति के कारण भक्तों और इतिहासकारों के बीच एक विशेष स्थान रखती है. लेकिन बीते कई दशकों से इस मस्जिद के इर्द-गिर्द बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हो गया, जिसको हटाने के लिए बीती रात बुलडोजर एक्शन हुआ. जानिए यह मस्जिद कब बना, किसने बनाया और कितना पुराना है?
मस्जिद का निर्माण और संस्थापक का परिचय
फैज-ए-इलाही मस्जिद का इतिहास 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से जुड़ा हुआ है. इस मस्जिद का निर्माण महान सूफी संत हजरत शाह फैज-ए-इलाही ने करवाया था. हजरत शाह फैज-ए-इलाही अपने समय के एक बेहद सम्मानित आध्यात्मिक गुरु थे, जिनका संबंध सूफियों के चिश्तिया सिलसिले से माना जाता है. कहा जाता है कि उन्होंने इस मस्जिद का निर्माण न केवल नमाज के लिए, बल्कि लोगों को रूहानियत और भाईचारे की शिक्षा देने के लिए एक मरकज (केंद्र) के रूप में किया था.
फैज-ए-इलाही मस्जिद की वास्तुकला में मुगल शैली की स्पष्ट झलक देखने को मिलती है.
क्या कहते हैं इतिहासकार
इतिहासकारों के अनुसार, यह मस्जिद लगभग 250 साल पुरानी है. इसका निर्माण मुगल सम्राट अहमद शाह बहादुर या शाह आलम द्वितीय के शासनकाल के आसपास हुआ था. उस दौर में मुगल साम्राज्य अपनी ढलान पर था, लेकिन दिल्ली की सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियां अभी भी चरम पर थीं. शाह फैज-ए-इलाही ने अपनी निजी संपत्ति और अनुयायियों के सहयोग से इस पवित्र स्थान को आकार दिया था.
मुगलकालीन सादगी का बेजोड़ नमूना
फैज-ए-इलाही मस्जिद की वास्तुकला में मुगल शैली की स्पष्ट झलक देखने को मिलती है. हालांकि यह जामा मस्जिद की तरह विशाल नहीं है, लेकिन इसकी बारीकियां देखने लायक हैं. मस्जिद के निर्माण में मुख्य रूप से लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर का उपयोग किया गया है. इसके मेहराब और गुंबद पारंपरिक मुगल इंजीनियरिंग का प्रदर्शन करते हैं. मस्जिद के अंदरूनी हिस्से को इस तरह डिजाइन किया गया है कि गर्मियों में भी यहां ठंडक बनी रहती है, जो उस समय की वास्तुकला की एक बड़ी विशेषता थी.
फैज-ए-इलाही मस्जिद का प्रबंधन ‘दिल्ली वक्फ बोर्ड’ के अंतर्गत आता है.
दीवारों पर कुरान की आयतें
मस्जिद के आंगन में एक छोटा वजूखाना है और दीवारों पर कुरान की आयतें बेहद खूबसूरती से उकेरी गई हैं. वक्त के साथ इसके ढांचे में कुछ बदलाव और मरम्मत कार्य हुए हैं, लेकिन इसकी मूल आत्मा आज भी 18वीं सदी वाली ही है. यहाँ की शांति आगंतुकों को आधुनिक शोर-शराबे से दूर एक अलग ही दुनिया में ले जाती है.
कौन संभालता है प्रबंधन और देखरेख की जिम्मेदारी?
वर्तमान में, फैज-ए-इलाही मस्जिद का प्रबंधन ‘दिल्ली वक्फ बोर्ड’ के अंतर्गत आता है. सरकारी नियमों के अनुसार, वक्फ बोर्ड ही इसकी संपत्तियों और रखरखाव की देखरेख के लिए जिम्मेदार है. हालांकि, स्थानीय स्तर पर मस्जिद के दैनिक कार्यों, जैसे नमाज का समय, साफ-सफाई और धार्मिक उत्सवों का आयोजन एक स्थानीय प्रबंधन समिति द्वारा किया जाता है.
वक्फ बोर्ड की भूमिका
मस्जिद के प्रशासन में एक ‘मुतवल्ली’ (ट्रस्टी) की भूमिका अहम होती है, जो स्थानीय समुदाय के सहयोग से यहां की व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से चलाता है. चूंकि यह एक ऐतिहासिक स्थल है, इसलिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और अन्य संरक्षण निकायों का भी इस पर ध्यान रहता है, ताकि इस विरासत को भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जा सके.
पूरा इलाका छावनी में तबदील है.
ऐतिहासिक घटनाओं की गवाह रही है यह मस्जिद
फैज-ए-इलाही मस्जिद ने दिल्ली के कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हो या 1947 का भारत विभाजन, इस मस्जिद ने हर दौर में स्थानीय निवासियों को शरण और शांति प्रदान की है. 1857 के विद्रोह के दौरान जब पुरानी दिल्ली के कई हिस्सों को अंग्रेजों ने निशाना बनाया था, तब इन छोटी मस्जिदों और दरगाहों ने ही लोगों के विश्वास को बनाए रखा था. आज भी यहां हजरत शाह फैज-ए-इलाही का उर्स बड़े अकीदत के साथ मनाया जाता है, जिसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग शिरकत करते हैं.
तुर्कमान गेट दिल्ली के ऐतिहासिक पुराने शहर का एक केंद्र है, जहां संकीर्ण गलियों, बाजारों और पुरानी इमारतों के बीच कई मस्जिदें, दरगाहें और स्मारक देखने को मिलते हैं. यहां का इलाका शाहजहां बाद के समय से आपकी आंखों के सामने पुरानी दिल्ली की कहानी कहता है. आज फैज-ए-इलाही मस्जिद दिल्ली की एक ऐसी धरोहर है, जिसे और अधिक प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है. पर्यटन के मानचित्र पर भले ही इसका नाम लाल किले या कुतुब मीनार जितना बड़ा न हो, लेकिन इसका आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व कम नहीं है. यह मस्जिद हमें याद दिलाती है कि दिल्ली केवल सत्ता का केंद्र नहीं, बल्कि संतों और फकीरों की नगरी भी रही है.
पूरा इलाका छावनी में तबदील है.
ऐसे दिल्ली पुलिस ने मस्जिद के अगल-बगल अवैध अतिक्रमण हटाकर इसे फिर से पुराने रूप में लाने की कोशिश की है. दिल्ली हाईकोर्ट और डिमोलिशन ड्राइव के तहत दिल्ली नगर निगम ने मस्जिद के आसपास के दवाखाना और बारात घर जैसे अतिक्रमित ढांचों को अवैध घोषित कर उन्हें हटाने का आदेश दिया था. 7 जनवरी 2026 की सुबह और देर रात एमसीडी के बुलडोजर और जेसीबी मशीनों ने अतिक्रमित निर्माण को हटाना शुरू किया. कुछ लोगों ने इसके विरोध में पत्थरबाजी की और पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़कर स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की.

22 hours ago
