यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन यानि यूजीसी की नई गाइडलाइंस को लेकर पूरे देश में गुस्सा बढ़ रहा है. एक बड़ा वर्ग इसे एकतरफा बता रहा है तो ये भी मान रहा है कि नए नियमन जनरल कैटेगरी खुद ब खुद आफेंडर मान रहे हैं. क्या आपको मालूम है कि हमारे देश में यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में अगड़ों और पिछड़ों का अनुपात क्या है. खुद आंकड़े क्या कहते हैं कि इन उच्च शिक्षा संस्थाओं में जनरल, ओबीसी, एससी और एसटी श्रेणियों के छात्रों का अनुपात क्या है.
भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों यानि (कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज में छात्रों के सामाजिक-जातिगत अनुपात का सबसे भरोसेमंद उपलब्ध डेटा सरकारी स्रोत AISHE यानि All India Survey on Higher Education में मिलता है. इससे पता लगता है कि हमारे हायर स्टडीज इंस्टीट्यूट्स में कितने सवर्ण, OBC, SC, और ST श्रेणी के छात्र पढ़ते हैं.
उच्च शिक्षा में छात्रों का जातिगत अनुपात
AISHE 2020-21 के अनुसार अलग अलग कैटेगरी में छात्रों का अनुपात इस तरह है.
श्रेणी कुल छात्रों में हिस्सा (%)
OBC – 35.8%
SC – 14.2%
ST – 5.8%
जनरल अन्य – 44.2%
इस रिपोर्ट में जनरल और अन्य में आमतौर पर सवर्ण, आर्थिक रूप से कमजोर श्रेणी और कुछ अन्य श्रेणियां शामिल रहती हैं.
आईआईएम का एक हालिया अध्ययन बताता है
– SC + ST + OBC छात्रों का सामूहिक हिस्सा 60.8% तक पहुंच चुका है.
– सामान्य (सवर्ण + EWS) का हिस्सा जल्दी घटकर लगभग 39% रह गया है.
यानी अब उच्च शिक्षा में आरक्षण श्रेणियां (SC/ST/OBC) कुल नामांकन के ज्यादातर हिस्से पर हावी हैं.
1970 और 80 का दशक
उस समय राष्ट्रीय-स्तरीय जातिगत नामांकन डेटा उपलब्ध नहीं था. 1970 तथा 1980 के दशक में उच्च शिक्षा में भागीदारी का औपचारिक सर्वेक्षण नहीं हुआ करता था. OBC आरक्षण की नीति भी लागू नहीं हुई थी, जो मंडल कमीशन की संस्तुतियों के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने लागू की. इस वजह से उच्च शिक्षा में सवर्ण बहुत अधिक बहुमत में थे .
1990 का दशक
1990 के दशक में जब मंडल कमीशन की संस्तुयियों का लागूकरण शुरू हुआ तो ओबीसी के लिए 27% आरक्षण नौकरियों और शिक्षा में लागू हुआ. जिसका असर 1990 के दशक के मध्य और अंत में छात्रों के नामांकन में दिखने लगा. सामान्य अनुमान के अनुसार अनुपात इस तरह था.
सवर्ण जनरल – 50–65%
OBC – 15–30%
SC -10–18%
ST – 5–10%
SC/ST/OBC के नामांकन में वृद्धि 2000 के आसपास होनी शुरू हुई. 2010 के बाद तेजी से बढ़ी.
आरक्षण इस तरह
सरकारी कॉलेज विश्वविद्यालयों में नियमित सीट आरक्षण इस तरह होता है. ये केंद्र सरकार की नीति के आधार पर तय होते हैं, अलग-अलग संस्थानों में लागू होते हैं.कुछ संस्थानों में यह अलग भी हो सकता है. जैसे IIT, IIM में जनरल छात्रों की हिस्सेदारी अधिक हो सकती है. वैसे आबादी में SC/ST/OBC का प्रतिशत अधिक होने और समय के साथ इनकी शिक्षा तक पहुंच बढ़ रही है.
OBC – 27%
SC – 15%
ST – 7.5%
EWS – 10%
जातिगत भेदभाव के कितने मामले
भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव और एससी/एसटी एक्ट से संबंधित मामलों में शिकायत की संख्या बढ़ रही है. जनवरी 2026 में यूजीसी द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 5 वर्षों में इन मामलों में 118.4% की भारी वृद्धि देखी गई.
– 2019 से 2024 के बीच यूजीसी को कुल 1,160 शिकायतें मिलीं.
– रिपोर्ट के अनुसार, करीब 90.68% मामलों का समाधान कर लिया गया.
लंबित मामलों की संख्या भी 18 (2019) से बढ़कर 108 (2024) हो गई.
ये आंकड़े देश के 704 विश्वविद्यालयों और 1,553 कॉलेजों के समान अवसर प्रकोष्ठों (Equal Opportunity Cells) और एससी/एसटी सेल द्वारा रिपोर्ट किए गए. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने छात्र आत्महत्याओं पर भी चिंता जताई, जिसमें जातीय भेदभाव को एक बड़े ‘स्ट्रेसर’ यानि तनाव कारक के रूप में पहचाना गया.
शिकायतों पर कैसे कार्रवाई होती है
दिल्ली यूनिवर्सिटी और जेएनयू में शिकायतों के लिए ‘SC/ST/OBC Grievance Cell’ और लायजन अफसर तैनात हैं. यदि कोई प्रोफेसर या कर्मचारी दोषी पाया जाता है, तो उसे निलंबित किया जाता है या पदोन्नति रोक दी जाती है. हाल के वर्षों में डीयू के कुछ कॉलेजों में प्रिंसिपलों के खिलाफ भी एससी/एसटी एक्ट के तहत जांच शुरू की गई, जहां पुलिस ने कोर्ट के आदेश पर प्राथमिकी दर्ज की.
उत्तर प्रदेश और राजस्थान में शिक्षण संस्थानों में दर्ज मामलों में एफआईआर की दर अधिक है. शिकायतों पर पुलिस जांच के बाद कानूनी कार्रवाई की जाती है.
तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में उच्च शिक्षा विभाग ने अलग से ‘डिस्क्रिमिनेशन मॉनिटरिंग सेल’ बनाया है जो सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय को रिपोर्ट करता है.
नई गाइडलाइंस क्या करेगी
– किसी भी संस्थान को शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर ‘इक्विटी कमेटी’ की बैठक बुलाना अनिवार्य है. यह कमेटी शिकायत की गंभीरता को देखते हुए प्राथमिक कदम उठाएगी.
– कमेटी को अपनी पूरी जांच पूरी कर संस्थान के प्रमुख यानि कुलपति या प्रिंसिपल को 15 कार्य दिवसों के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी.
– रिपोर्ट मिलने के बाद संस्थान प्रमुख को अगले 7 दिनों के भीतर दोषी पर कार्रवाई शुरू करनी होगी.

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