Last Updated:February 18, 2026, 17:34 IST
ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को नीचा दिखाने के लिए बांग्लादेशी चुनावों की तारीफ की, लेकिन अब यही दांव उनके लिए बैकफायर कर गया है. इंटेलिजेंस सोर्सेज ने फैक्ट-चेक में खुलासा किया है कि जिस चुनाव को ममता 'शांतिपूर्ण' बता रही हैं, वहां अल्पसंख्यकों को सुनियोजित साजिश के तहत डराया गया और आबादी के मुकाबले आधा प्रतिनिधित्व भी नहीं दिया गया.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव आयोग से नाराज हैं, यह कोई छिपी बात नहीं है. लेकिन हद तो तब हो गई जब उन्होंने चुनाव आयोग की आलोचना करने के लिए बांग्लादेश के चुनावों को सहारा बना लिया. ये तक कह डाला कि वहां का चुनाव देख लीजिए…लेकिन अब उनका ये बांग्लादेश मॉडल उन्हीं पर भारी पड़ता दिख रहा है. भारतीय इंटेलिजेंस सोर्सेज ने ममता बनर्जी के दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री के पास पड़ोसी देश के चुनावों का पूरा और सटीक डेटा नहीं है.
ममता बनर्जी ने हाल ही में कहा था, बांग्लादेश में चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुए. सबको लगा था कि हिंसा होगी, लेकिन सब कुछ शांति से हो गया. वहीं भारत एक लोकतांत्रिक देश होने के बावजूद, यहां का चुनाव आयोग ‘थ्रेट कल्चर’ के साथ लोकतंत्र को बुलडोज करेगा. लेकिन, इंटेलिजेंस की आंतरिक असेसमेंट रिपोर्ट कुछ और ही डरावनी कहानी बयां कर रही है.
अल्पसंख्यकों के खिलाफ सुनियोजित साजिश
खुफिया सूत्रों के मुताबिक, बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर की गई हिंसा और डराने-धमकाने का सिलसिला एक साल से भी ज्यादा समय से चल रहा था. खासकर राजनीतिक रूप से संवेदनशील और सीमावर्ती जिलों में यह ज्यादा देखा गया. अधिकारियों ने इसे एक ‘डेलिब्रेट प्लेबुक’ (सुनियोजित साजिश) करार दिया है, जिसका मकसद अल्पसंख्यकों के खिलाफ भावनाएं भड़काना और उन्हें चुनाव प्रक्रिया से बाहर रखना था. बागेरहाट और गोपालगंज जैसे क्षेत्रों में सुरक्षा का बहाना बनाकर अल्पसंख्यक उम्मीदवारों के नामांकन रद्द कर दिए गए. कई लोगों को नाम वापस लेने पर मजबूर कर दिया गया. साफ था कि सरकार के इशारे पर लोगों को चुनावों में भाग लेने से रोका गया.
डेटा कह रहा पूरी कहानी
जब बांग्लादेश के चुनावी डेटा का विश्लेषण किया गया, तो ममता बनर्जी के ‘शांतिपूर्ण और आदर्श’ चुनाव के दावों की हवा निकल गई.वहां 299 सीटों पर कुल 2,034 उम्मीदवार मैदान में थे. लेकिन इन 2,034 उम्मीदवारों में से केवल 80 हिंदू अल्पसंख्यक थे. यह कुल उम्मीदवारों का लगभग 3.9 प्रतिशत है, जबकि बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी करीब 8 प्रतिशत है. यानी प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुपात से आधा भी नहीं रहा. हैरानी की बात यह है कि जिन सीटों पर हिंदू वोटर्स 15-20 प्रतिशत हैं, वहां भी प्रमुख राजनीतिक दलों ने हिंदू उम्मीदवार नहीं उतारे. खुल्ना-1 जैसी सीट पर 8 हिंदू उम्मीदवारों ने पर्चा भरा था, लेकिन बाद में या तो उनके नामांकन रद्द कर दिए गए या दबाव डालकर नाम वापस करवा लिए गए.सिर्फ 2-3 हिंदू उम्मीदवार ही पहुंचे संसद
आंकड़ों के मुताबिक, चुनाव लड़ने वाले अधिकांश 80 हिंदू उम्मीदवार उन छोटी वामपंथी पार्टियों से थे, जिनका वोट शेयर न के बराबर है. नतीजों की बात करें तो केवल दो से तीन हिंदू उम्मीदवार ही जीत सके और वे सभी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के टिकट पर चुनाव लड़े थे. किसी भी मुख्यधारा की बड़ी पार्टी ने अल्पसंख्यकों को उनके अनुपात के हिसाब से प्रतिनिधित्व नहीं दिया.
बीजेपी और चुनाव आयोग का कड़ा जवाब
ममता बनर्जी के इस बयान के बाद कि भारत को बांग्लादेश के चुनावों से सीखना चाहिए, बीजेपी ने उन पर तीखा हमला बोला. वहीं भारतीय चुनाव आयोग ने भी अपनी चुनावी प्रक्रियाओं का बचाव करते हुए कड़ा रुख अपनाया है. इंटेलिजेंस सोर्सेज का मानना है कि इस तरह की चुनिंदा तुलनाएं बांग्लादेश की जमीनी हकीकत, अल्पसंख्यकों के कम प्रतिनिधित्व और उनके खिलाफ हो रही डराने-धमकाने की घटनाओं को नजरअंदाज करती हैं.
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Delhi,Delhi,Delhi
First Published :
February 18, 2026, 17:34 IST

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