शरद पवार ने चाहा होता तो पूरा हो जाता अजित दादा का सपना, मगर अब हमेशा के लिए अधूरा रह गया ख्वाब

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Last Updated:January 29, 2026, 09:34 IST

साहब ने चाहा होता तो पूरा हो जाता दादा का सपना, मगर अब अधूरा रह गया ख्वाबअजित पवार और शरद पवार. फाइल फोटो- फोटो-पीटीआई

Sharad Pawar-Ajit Pawar Relations: महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम रहे अजित पवार के निधन से राज्य की राजनीति में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है. अजित दादा राज्य के छह डिप्टी सीएम रहे. अनुभव के मामले में वह महाराष्ट्र के मौजूदा नेतृत्व यानी सीएम देवेंद्र फडणवीस और डिप्टी सीएम एकनाश शिंदे दोनों से सीनियर थे. भाजपा, कांग्रेस और शिवसेना तीनों के नेतृत्व वाली सरकारों में डिप्टी सीएम रहे. लेकिन, कभी सीएम नहीं बन पाए. उन्होंने सीएम बनने की अपनी इच्छा सार्वजनिक तौर पर भी कई बार जाहिर की थी. सीएम बनना उनका सपना था लेकिन अब यह सपना हमेशा-हमेशा के लिए ख्वाब हो गया है.

दरअसल, ऐसा नहीं है कि अजित पवार के राजनीतिक जीवन में कभी सीएम बनने का मौका नहीं आया. महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार ऐसा संयोग बना था जब अजित पवार राज्य के सीएम बन सकते थे. लेकिन, राजनीति के जानकारों के धड़ा यह कहता है कि उनके चाचा और राज्य की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले शरद पवार आगे नहीं आए और दादा सीएम नहीं बन पाए. हालांकि इस दावे को खारिज करने वाले जानकारों का कहना है कि अगर उस वक्त एनसीपी को सीएम की कुर्सी मिलती तो दादा उस कतार में काफी पीछे थे. उनसे की सीनियर नेता थे और शरद पवार उनको दरकिनार कर अपने भतीजे को सीएम की कुर्सी नहीं दे सकते थे.

शरद पवार और उनकी पत्नी के साथ अजित पवार. फोटो- पीटीआई

दरअसल, इस कहानी की शुरुआत 1999 से होती है. वह वक्त दिग्गज कांग्रेसी रहे शरद पवार ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल के होने को मुद्दा बनाकर पार्टी तोड़ दी. उन्होंने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) बनाई. फिर कुछ ही महीने बाद हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में अपने दम पर कदम रखा दिया. उस वक्त राज्य में भाजपा-शिवसेना की सरकार थी. यानी मुकाबला त्रिकोणीय हो गया. चुनाव में 288 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस को 75, शिवसेना को 69, भाजपा को 56 और एनसीपी को 58 सीटें मिलीं. किसी भी दल या गठबंधन को 145 का जादुई आंकड़ा नहीं मिला. फिर चंद महीने पहले की अदावत भूलकर कांग्रेस और एनसीपी ने पोस्ट पोल अलायंस कर सरकार बना ली. उस सरकार में अजित पवार शामिल हुए. फिर 2004 में एनसीपी-कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा और सत्ता में वापसी की. इस बार एनसीपी राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी.

2004 का विधानसभा चुनाव

2004 के विधानसभा चुनाव में एनसीपी को 71 और कांग्रेस 69 सीटें मिलीं. जबकि विपक्षी गठबंधन में शिवसेना को 62 और भाजपा को 54 सीटें मिलीं. यह एक ऐसा वक्त था जब एनसीपी के संस्थापक शरद पवार राज्य में सीएम पद पर अपनी दावेदारी कर सकते थे. लेकिन, शरद पवार ने सीएम पद कांग्रेस को दे दिया और बदले में कैबिनेट में एनसीपी की हिस्सेदारी बढ़ा दी. उस सरकार में भी अजित पवार डिप्टी सीएम बने. फिर एनसीपी 2004 में केंद्र में मनमोहन सिंह ने नेतृत्व में बनी यूपीए सरकार में शामिल हो गई. इस तरह अजित पवार के सीएम बनने का ख्वाब अधूरा रह गया.

उस वक्त अजित पवार एनसीपी और महाराष्ट्र की राजनीति में खुद को अपने चाचा शरद पवार के उत्तराधिकारी के तौर पर देखते थे. लेकिन, 2004 में इस रिश्ते में थोड़ी दूरी आ गई. फिर 2009 में शरद पवार ने अपनी बेटी सुप्रिया सूले को चुनावी मैदान में उतार दिया. इससे अजित पवार और असहज हो गए. हालांकि राज्य के स्तर पर अजित पवार ही शरद पवार के उत्तराधिकारी माने जाते थे. केंद्र में सुप्रिया सुले पार्टी का चेहरा बनने लगी.

सुप्रिया सुले और अजित पवार. फोटो- पीटीआई

2004 का चुनाव और टूट गया सीएम का ख्वाब

फिर 2014 आते-आते चुनावी माहौल बदल गया. देश और राज्यों के स्तर पर पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा का तेजी से उभार हुआ. इस असर महाराष्ट्र की राजनीति पर भी पड़ा. 2014 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना-भाजपा गठबंधन सत्ता में वापसी कर गई. देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में सरकार बनी. उस चुनाव में कांग्रेस और एनसीपी क्रमशः 42 और 41 सीटों पर सिमट गई. फिर 2019 में एनसीपी 54 सीटों के साथ अपनी पकड़ स्थापित करने में सफल हुई. लेकिन, वह 2004 वाला प्रदर्शन कभी नहीं कर पाई. 2019 के बाद राज्य की राजनीति में काफी उठापटक देखा गया. शिवसेना और एनसीपी दोनों दो फाड़ हुई. पहले उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में महाविकास अघाड़ी की सरकार बनी फिर शिवसेना के दोफाड़ होने के बाद भाजपा के समर्थन से एकनाथ शिंदे सीएम बने. उसके करीब एक साल बाद 2023 में एनसीपी भी दोफाड़ हुई और अजित पवार शिंदे सरकार में फिर से डिप्टी सीएम बने. फिर 2024 के विधानसभा चुनाव में अजित पवार ने अपने दम पार्टी को खड़ा किया और इसमें काफी हद तक सफल हुए. शरद पवार की गैरमौजूदगी में पार्टी कार्यकर्ताओं और कैडर के बीच अजित दादा एकमात्र नेता थे जो अपना प्रभाव छोड़ते थे. लेकिन, अब वह हमारे बीच नहीं रहे और उनका सीएम बनने का ख्वाब हमेशा के लिए अधूरा रह गया.

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संतोष कुमार

न्यूज18 हिंदी में बतौर एसोसिएट एडिटर कार्यरत. मीडिया में करीब दो दशक का अनुभव. दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, आईएएनएस, बीबीसी, अमर उजाला, जी समूह सहित कई अन्य संस्थानों में कार्य करने का मौका मिला. माखनलाल यूनिवर्स...और पढ़ें

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January 29, 2026, 09:34 IST

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साहब ने चाहा होता तो पूरा हो जाता दादा का सपना, मगर अब अधूरा रह गया ख्वाब

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