Last Updated:April 03, 2025, 14:18 IST
Telangana CM revanth reddy statement and Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के बयान पर नाराजगी जताई, जिसमें उन्होंने बीआरएस विधायकों के दलबदल पर उपचुनाव न कराने की बात कही थ...और पढ़ें

सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना के सीएम के बयान पर कड़ा ऐतराज जताया है.
Telangana CM revanth reddy statement and Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने एक दिन पहले बुधवार को तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के एक बयान पर सख्त नाराजगी जताई. यह बयान राज्य विधानसभा में दिया गया था, जिसमें रेड्डी ने कहा था कि अगर भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के विधायक पक्ष बदलते हैं, तो भी उपचुनाव नहीं होंगे. सदन के भीतर उनके इस बयान को खुलेआम हॉर्स ट्रेडिंग को बढ़ावा देने वाला माना गया. सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने इस पर सुनवाई करते हुए कहा कि ऐसे बयान संविधान के 10वें शेड्यूल को कमजोर करते हैं. 10 शेड्यूल को दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है. इसे 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए लागू किया गया था. इसका मकसद विधायकों और सांसदों के दल-बदल को रोकना और राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना है.
यह विवाद 26 मार्च को रेड्डी की उस टिप्पणी से शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने बीआरएस विधायकों के दलबदल की स्थिति में उपचुनाव न कराने की बात कही थी. यह मुद्दा तब और गर्म हो गया जब सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस में शामिल हुए कुछ बीआरएस विधायकों की अयोग्यता की याचिकाओं पर तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष की कथित देरी को लेकर सुनवाई शुरू की. जस्टिस गवई ने सख्त लहजे में कहा, “अगर यह बात विधानसभा में कही गई है, तो आपके मुख्यमंत्री 10वें शेड्यूल का मजाक उड़ा रहे हैं.” उन्होंने जोर दिया कि विधानसभा में दिए गए बयानों का बहुत महत्व होता है और ये कानून की व्याख्या में इस्तेमाल हो सकते हैं.
क्या है 10वां शेड्यूल
संविधान का 10वां शेड्यूल दलबदल को रोकने के लिए साफ नियम बनाता है. इसके तहत अगर कोई विधायक या सांसद अपनी पार्टी छोड़ता है या पार्टी के निर्देशों के खिलाफ वोट देता है, तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है. हालांकि, कुछ अपवाद भी हैं. मसलन, अगर कोई विधायक अपनी पार्टी के दो-तिहाई सदस्यों के साथ नई पार्टी बनाता है या किसी विलय में शामिल होता है, तो वह अयोग्य नहीं होगा. यह नियम 2003 के 91वें संशोधन के बाद और सख्त हो गया. दलबदल के मामलों में फैसला विधानसभा अध्यक्ष या लोकसभा स्पीकर लेता है और यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा के दायरे में आता है, जैसा कि 1992 के कीहोतो होलोहान मामले में तय हुआ था.
सुनवाई में बीआरएस नेता पदी कौशिक रेड्डी के वकील सी ए सुंदरम ने सीएम के बयान का हवाला दिया, जिसमें उपचुनाव की संभावना को साफ तौर पर नकारा गया था. दूसरी ओर, विधानसभा अध्यक्ष के वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि विधानसभा की कार्यवाही इस मामले में कोर्ट के दायरे से बाहर है. लेकिन जस्टिस गवई ने इसे खारिज करते हुए कहा कि ऐसे बयानों की जिम्मेदारी समझनी होगी, वरना भविष्य में सख्त कार्रवाई हो सकती है.
10वां शेड्यूल का मकसद
10वां शेड्यूल का मकसद “हॉर्स ट्रेडिंग” को रोकना है, जिसमें विधायक पैसे या पद के लालच में पार्टी बदलते हैं. लेकिन कई बार यह कानून पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाता. उदाहरण के लिए, अगर कोई विधायक इस्तीफा दे देता है और दूसरी पार्टी से चुनाव लड़ता है, तो यह दलबदल नहीं माना जाता.
यह पहली बार नहीं है जब रेड्डी के बयानों पर सुप्रीम कोर्ट नाराज हुआ है. पिछले साल भी दिल्ली आबकारी नीति घोटाले में बीआरएस नेता के. कविता को जमानत मिलने पर उनकी टिप्पणी को लेकर कोर्ट ने नाराजगी जताई थी. इस ताजा मामले ने एक बार फिर दलबदल कानून और राजनीतिक नैतिकता पर बहस छेड़ दी है. सवाल यह है कि क्या 10वां शेड्यूल वाकई हॉर्स ट्रेडिंग को रोक पा रहा है, या इसे और सख्त करने की जरूरत है?
First Published :
April 03, 2025, 14:18 IST