ईरान में इस्लामिक शासन का जो स्वरूप खामेनेई और उनकी मुल्ला मंडली ने तैयार किया था, उसमें असहिष्णुता, मूर्खता और कट्टरवाद तीनों का समावेश था. समझिए यहां असहिष्णुता अपने ही लोगों के खिलाफ थी. कट्टरवाद के कठोर नियमों को नहीं माननेवालों के खिलाफ असहिष्णुता का मीटर इतना हाई था कि उन्हें मौत की सजा दी जाती थी. समझिए खामेनेई और मौलानाओं ने 1979 में कथित इस्लामी क्रांति के बाद ईरान में इस्लाम के नाम पर आम लोगों को कट्टरपंथ का गुलाम बनाया. महजबी नारा लगाकर निर्दोषों लोगों को फांसी दी. इस्लाम के नाम पर युवाओं को युद्ध में धकेला, लाखों युवा अकाल मृत्यु के शिकार हुए.
अपने कथित इस्लामिक शासन के नाम पर खामनेई और उनकी मौलाना मंडली ने खुद को सर्वोपरि घोषित कर दिया. हर मस्जिद, हर मदरसा उनका कंट्रोल रूम बन गया. मित्रो कथित इस्लामिक शासन में ईरान की मस्जिदें धार्मिक स्थल नहीं सरकारी ताकत का केंद्र बन गई थी. ईरान में मस्जिद नमाज की नहीं खामेनेई की खूंखार बसिज फोर्स का रिक्रूटमेंट सेंटर बन गई थी. मस्जिदें इस्लामिक शासन के प्रोपेगेंडा का हब बन गई हैं. मस्जिदों में बैठे कट्टरपंथी मौलाना खामेनेई विरोधियों की लिस्ट बनाते थे. संक्षेप में कहें तो मस्जिदें धार्मिक स्थल नहीं रह गई थी. मौलानाओं की ताकत का केंद्र और प्रतीक बन गई थीं. इसलिए आज प्रदर्शनकारी इन मस्जिदों को गुस्से की आग में स्वाहा कर रहे हैं.
ईरान क्यों जल रहा है?
समझिए ये मजहब के खिलाफ नहीं कट्टरपंथी मौलानाओं के खिलाफ बगावत है. क्योंकि इस्लाम कहता है- इंसाफ, रहम, आज़ादी. वहीं ईरान का कट्टरपंथी मौलाना मॉडल कहता है दमन, फतवा, मौत. इस्लाम कहता है - तुममें से बेहतर वो है जो अच्छा काम करें. लेकिन ईरान के कट्टरपंथी मौलाना कहते हैं तुममें से बेहतर वो है जो मेरी वफादारी करे. आज ईरान के प्रदर्शनकारी जब मस्जिद जलाते हैं तो वो धर्म से नहीं लड़ रहे होते हैं. वो उन कट्टरपंथी मौलानाओं से लड़ रहे हैं जिन्होंने धर्म का नाम लेकर खुद को धर्म का प्रतीक बना लिया. स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि सांप्रदायिकता, कट्टरता और उसका भयानक वंशज धार्मिक कट्टरवाद ने इस सुंदर पृथ्वी को लंबे समय से नुकसान पहुंचाया है.
ईरान में 46 साल से लोग धार्मिक कट्टरवाद की गिरफ्त में
ईरान में इस धार्मिक कट्टरवाद ने 46 साल से आम लोगों को बंधक बनाया हुआ था. लोगों की आंखों पर धर्मांधता की पट्टी बांध दी गई थी. लेकिन अब वो पट्टी उतर चुकी है. प्रदर्शनकारी मस्जिद जलाकर ये संदेश दे रहे हैं कि उन्हें अब मौलानाओं के कट्टरपंथी इस्लाम से मुक्ति चाहिए. ईरान में मस्जिदों को जलाया जा रहा है. लेकिन दुनिया में इस्लाम की रक्षा का ठेका लेनेवालों की जुबान खामोश है. जो लोग भारत में अतिक्रमण हटाने के लिए हुई कार्रवाई को इस्लाम विरोधी बताते हैं. जो लोग भारत में एक छोटी सी मस्जिद की एक ईंट दरकने पर भी दुनिया में ये नैरेटिव फैलाते हैं कि भारत में इस्लाम को खतरा है आज वो मौन हैं. ईरान में जलती मस्जिदों पर उनकी जुबान खामोश है. वो आज जलती मस्जिदों को देखकर भी इस्लाम खतरे में है वाला नारा नहीं उछाल रहे हैं
भारत विरोधी सोच वाले खामनेई ब्रांड इस्लाम का समर्थन करते हैं
इसे बौद्धिक पाखंड कहते हैं, इसे वैचारिक बेईमानी कहते हैं. समझिए भारत में एक छोटी कार्रवाई होने पर ये लोग पूरी दुनिया में प्रोपेगैंडा करते हैं. लेकिन ईरान में 30 से ज्यादा मस्जिदें जला दी गईं इनके लिए इस्लाम अब भी खतरे में नहीं आया. जानते हैं ऐसा क्यों हैं. क्योंकि ये मौलानाओं के इस्लाम के खिलाफ आम मुसलमान का गुस्सा है. भारत विरोध सोच वाले कट्टरपंथी भी उसी खामनेई ब्रांड इस्लाम का समर्थन करते हैं. ईरान में जलती हर मस्जिद "इस्लाम खतरे में है" वाले नैरेटिव को भी जला रही है. चुप रहना इन बौद्धिक पाखंडियों की शातिराना मजबूरी है. क्योंकि ये बोलेंगे तो फिर चर्चा मौलानाओं के इस्लाम बनाम आम मुसलमान के इस्लाम की होगी. यहां फिर इनके कट्टरपंथी पाखंड की पोल खुलेगी. इसलिए इन बौद्धिक बेईमानों ने शातिराना चुप्पी ओढ़ ली है. 34 साल तक बाबरी के नाम पर बवाल करनेवाले क्लब कट्टरपंथ को शातिराना चुप्पी की चादर के ढक रहा है.
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