Donald Trump News: अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अब उन देशों की लिस्ट जारी करनी शुरू कर दी है, जिस पर वो कब्जा करना चाहते हैं. जिन देशों में वो सरकारों को बदलना चाहते हैं. जहां के नेता उनको पसंद नहीं आ रहे.बड़ी बात ये है कि, अब इस लिस्ट में ऐसे क्षेत्र का नाम भी शामिल हो गया है, जिसे अमेरिका का हितैषी माना जाता है. जिसे अमेरिका का मित्र माना जाता है.
लेकिन ट्रंप अब दोस्त से भी दुश्मन जैसा सलूक कर रहे हैं. इस लिस्ट में वेनेजुएला के बाद अब यूरोप के एक इलाके का नंबर आ गया है. इससे पहले क्यूबा, कोलंबिया या ईरान को ट्रंप का अगला टारगेट माना जा रहा था. लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति के नए एलान ने सहयोगी यूरोपीय देशों को चौंका दिया है.
ग्रीनलैंड पर ट्रंप की नजरें
अब ट्रंप ग्रीनलैंड पर कब्जा करना चाहते हैं जो अमेरिका के मित्र देश डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है. ग्रीनलैंड की सुरक्षा और कानून व्यवस्था को डेनमार्क देखता है. यानी अब डॉनल्ड ट्रंप से सिर्फ उनके दुश्मनों को खतरा नहीं. अमेरिका के राष्ट्रपति अब दोस्तों की जमीन और संसाधन भी हड़पना चाहते हैं. आपको भी जानना चाहिए अमेरिका के राष्ट्रपति क्यों अपने ही मित्र देश के स्वायत्त क्षेत्र पर कब्जा करना चाहते हैं.
#DNAमित्रों | सिर्फ दुश्मन नहीं..'दोस्त भी नपेंगे'! ग्रीनलैंड के पास ट्रंप के 'घातक' क्यों तैनात?
ट्रंप के अगले टारगेट का DNA टेस्ट #DNA #DNAWithRahulSinha #DonaldTrump #UnitedStates #Greenland @RahulSinhaTV pic.twitter.com/9lzQiQZxVZ
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ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है कि सुपरपावर मुल्क ने दुनिया के सबसे बड़े सैन्य गठबंधन NATO में अपने सहयोगियों की फिक्र भी नहीं की. आपको ग्रीनलैंड पर कब्जे की मंशा के बाद यूरोप में ट्रंप के विरोध में उठने वाली आवाजों के बारे में भी जानना चाहिए. लेकिन सबसे पहले आप राष्ट्रपति ट्रंप के उस बयान को जानिए जिसके बाद डेनमार्क और ग्रीनलैंड की बेचैनी बढ़ गई है.
आसानी से ग्रीनलैंड नहीं देगा डेनमार्क
डॉनल्ड ट्रंप बता रहे हैं कि अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड बहुत जरूरी है और डेनमार्क ऐसा करने में सक्षम नहीं है. मतलब जिस इलाके की जरूरत अमेरिका को सबसे ज्यादा है, उसे डेनमार्क आसानी से नहीं देगा. इसका मतलब मेक अमेरिका ग्रेट अगेन का नारा देने वाले डॉनल्ड ट्रंप का अगला निशाना ग्रीनलैंड हो सकता है. और ऐसे बयान देकर वो अमेरिका को इसके लिए तैयार कर रहे हैं. वैसे मादुरो के अपहरण से पहले दुनिया ट्रंप के बयान को इतनी गंभीरता से नहीं लेती थी. लेकिन इस बार ट्रंप की तैयारी जमीन पर दिखनी शुरू हो गई है.
इंटरनेट पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसके सामने आने के बाद कहा जा रहा है कि ट्रंप ईरान से पहले ग्रीनलैंड पर कब्जे के प्लान पर काम शुरू कर सकते हैं. इस वीडियो में ब्रिटेन की रॉयल एयर फोर्स के फेयरफोर्ड एयरबेस में अमेरिकी वायुसेना के C-17 सैन्य विमानों की गतिविधियां नजर आ रही हैं.
ब्रिटिश एयरबेस पर पहुंचे अमेरिकी जहाज
अमेरिका के कम से कम दस C-17 सैन्य विमान एक साथ यहां पर पहुंचे. ये क्यों एक सामान्य घटना नहीं, इसे समझने के लिए आपको ब्रिटेन की रॉयल एयर फोर्स के फेयरफोर्ड एयरबेस के बारे में भी जानना चाहिए,जहां पर अचानक एक साथ इतने अमेरिकी विमान उतरने से यूरोप और मिडिलईस्ट दोनों में खलबली मच गई है.
ब्रिटेन के फेयरफोर्ड एयरबेस का इस्तेमाल मुख्य रूप से अमेरिकी एयर फोर्स करती है.
इसे अमेरिका का “यूरोप स्ट्राइक बेस” कहा जाता है. यानी यूरोप में अगर अमेरिकी वायुसेना कोई गतिविधि करेगी तो उसका केंद्र यही एयरबेस बनेगा.
यह यूरोप का इकलौता बेस है जहां से अमेरिका के B-52 बॉम्बर...B-1 बॉम्बर और B-2 स्टेल्थ बॉम्बर ऑपरेट कर सकते हैं.
ये विमान परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम हैं.रॉयल एयरफोर्स Fairford को अमेरिका का Nuclear-Capable Forward Base कहा जाता है.
इसलिए 10 अमेरिकी C-17 सैन्य विमानों के एक साथ यहां पर उतरने को किसी सामान्य अभ्यास से ज्यादा माना जा रहा है.
क्योंकि C-17 ग्लोबमास्टर से भारी हथियार बख़्तरबंद गाड़ियां, बड़ी संख्या में स्पेशल फोर्स हेलीकॉप्टर्स और बड़े युद्ध के लिए जरूरी साजो सामान पहुंचाया जाता है.
C-17 ग्लोबमास्टर को युद्ध शुरू होने से ठीक पहले का ट्रक भी कह सकते हैं.
ये विमान अमेरिका की Hunter Army Airfield से ब्रिटेन पहुंचे हैं. अब जानिए कि अमेरिका के इस सैन्य ठिकाने में कौन कौन सी सैन्य यूनिट तैनात हैं.
यहां अमेरिकी सेना की सबसे तेज, आक्रामक और पहली हमला करने वाली यूनिट 75th Ranger Regiment तैनात है.
जो युद्ध शुरू होने से पहले या फिर पहले दिन सबसे खतरनाक जगहों पर उतरकर दुश्मन को संभलने का मौका नहीं देती.
इसके अलावा यहीं पर अमेरिका की सबसे खुफिया और खतरनाक हेलिकॉप्टर यूनिट 160th SOAR नाइट स्टॉकर तैनात है, जिसने वेनेजुएला में एक्शन किया.
यहीं पर अमेरिकी सेना की एलीट फास्ट-अटैक फोर्स 101st Airborne Division भी तैनात है, जो हेलीकॉप्टरों से तेज हमला करती है.
ये दुश्मन के इलाके में तेज़ी से उतरकर शहर, एयरफील्ड, पुल, तेल-क्षेत्र कब्जे में लेती है,यानी भारी युद्ध से पहले जमीन तैयार करती है.
ब्रिटेन में अमेरिका की स्पेशल फोर्स के कमांडोज और सबसे घातक हथियार किसी युद्धाभ्यास में हिस्सा लेने नहीं पहुंचे हैं. इराक युद्ध के बाद पहली बार यूरोप में अमेरिकी सेना का इतना बड़ा मूवमेंट देखा जा रहा है. जो आमतौर पर युद्ध से पहले किसी बड़े ऑपरेशन से पहले तैनात होता है.
क्या अमेरिका कर रहा बड़े ऑपरेशन की तैयारी
इसलिए, एक्सपर्ट मान रहे हैं कि यूरोप या मध्य-पूर्व में किसी बड़े ऑपरेशन की तैयारी की जा रही है. ब्रिटेन ग्रीनलैंड के बहुत पास है और RAF Fairford वह दरवाजा है जिससे अमेरिका ग्रीनलैंड के करीब यानी आर्कटिक में कदम रख सकता है.
ट्रंप की इस तैयारी और बयान ने डेनमार्क की टेंशन भी बढ़ा दी है. डेनमार्क की पीएम ने डॉनल्ड ट्रंप के ऐलान को अपने मुल्क का अपमान माना है. उन्होंने ट्रंप से कहा है कि वो डेनमार्क को धमकी दे रहे हैं. डेनमार्क पर ग्रीनलैंड देने का दबाव बना रहे हैं और ये सब उस वक्त हो रहा है, जब डेनमार्क यूरोप में अमेरिका का करीबी सहयोगी है. यानी अब ट्रंप से सिर्फ अमेरिका के दुश्मनों को नहीं अमेरिका के दोस्तों को भी खतरा है. अब जानिए कि ग्रीनलैंड को ट्रंप अमेरिकी सुरक्षा के लिए क्यों जरूरी मानते हैं. और ग्रीनलैंड के लिए ट्रंप अपने दोस्तों पर क्यों दबाव बना रहे हैं.
बर्फ से ढके इलाके में क्यों बढ़ी महाशक्तियों की दिलचस्पी?
आखिर बर्फ से ढके इस क्षेत्र में दुनिया की महाशक्तियों की दिलचस्पी इतनी क्यों बढ़ गई है. ग्रीनलैंड उत्तरी अमेरिका के पास आर्कटिक क्षेत्र में दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, जो लगभग 80% बर्फ से ढका हुआ है.
यहां की जनसंख्या एक लाख से भी कम है. सन 1700 के आसपास डेनमार्क ने ग्रीनलैंड पर शासन शुरू किया. लंबे समय तक ग्रीनलैंड डेनमार्क की कॉलोनी रहा.
धीरे-धीरे ग्रीनलैंड को स्वशासन यानी सेल्फ रूल मिला आज ग्रीनलैंड के पास अपना प्रधानमंत्री अपनी सरकार अपनी भाषा और अपनी संस्कृति है. लेकिन विदेश नीति और रक्षा के मामले अब भी डेनमार्क संभालता है. यानी दुनिया में ग्रीनलैंड को डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र के तौर पर पहचाना जाता है. साल 2019 में भी अमेरिका ने ग्रीनलैंड को खरीदने की पेशकश की थी. लेकिन डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ने इससे इनकार कर दिया था. अब आप समझिए अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड क्यों जरूरी है.
अब खुल रहे नए समुद्री रास्ते
पहले आर्कटिक पूरी तरह बर्फ से ढका रहता था, लेकिन अब जलवायु परिवर्तन से बर्फ पिघल रही है. इससे दो नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं. North West Passage और Trans-Polar Route. इन दोनों रास्तों से यूरोप और एशिया की यात्रा 7 से 10 दिन कम हो जाएगी. यानी एशिया से यूरोप का माल 30–40% कम समय में पहुंचेगा. इससे स्वेज और पनामा नहर पर निर्भरता घटेगी. ग्रीनलैंड इन रास्तों के बीच में बैठा है. इसलिए जो ग्रीनलैंड पर असर रखेगा वो आर्कटिक का व्यापार कंट्रोल कर पाएगा.
इसके अलावा F-35 जैसे लड़ाकू विमानों,रडार, मिसाइल सिस्टम और इलेक्ट्रिक गाड़ियों में लगने वाली जिन धातुओं यानी रेयर अर्थ पर चीन कब्जा करके बैठा है. ग्रीनलैंड में ये धातुएं बहुत बड़ी मात्रा में मौजूद हैं. इसलिए अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड पर कंट्रोल चीन पर निर्भरता से बचने का बैक-अप प्लान है.
ग्रीनलैंड में मीठे पानी का बड़ा स्टॉक
ग्रीनलैंड में पिटुफ़िक एयर बेस अमेरिका की ढाल माना जाता है. यहां से अमेरिका रूस की तरफ से आने वाली मिसाइलों,सैटेलाइट और स्पेस पर नजर रखता है. आप इसे अमेरिका की “Early Warning Bell” कह सकते हैं. अगर ये ना हो तो अमेरिका रूस की तरफ से होने वाले किसी भी हमले के बारे में देर से पता चलेगा. यानी अमेरिका का डिफेंस अंधा हो जाएगा.
ग्रीनलैंड की बर्फ में दुनिया के करीब 20% मीठे पानी के बराबर स्टॉक माना जाता है जैसे-जैसे दुनिया में पानी की कमी बढ़ेगी. यह पानी सोने से भी कीमती होगा.
अमेरिका से लिए सीधे आर्कटिक जाना लंबा, महंगा और मौसम के कारण खतरनाक भी है.ग्रीनलैंड अमेरिका और आर्कटिक के बीच में पड़ता है. इसलिए यह अमेरिका और यूरोप के बीच आर्कटिक का “Forward Base” बन सकता है.
ग्रीनलैंड में पीछे रहना नहीं चाहता अमेरिका
और जिस वक्त रूस आर्कटिक में सैन्य अड्डे बना रहा है.चीन निवेश और व्यापार के नाम पर घुसपैठ कर रहा है. तो अमेरिका को लग रहा है अगर वो ग्रीनलैंड में पीछे रह गया तो भविष्य में आर्कटिक के नियम रूस और चीन मिलकर तय करेंगे. ट्रंप ने अपने बयान में भी ग्रीनलैंड में नजर आ रहे रूस और चीन के जहाजों का जिक्र किया. यही वजह है ट्रंप ग्रीनलैंड पर आक्रामक हैं और अपने सहयोगी डेनमार्क पर दबाव बना रहे हैं.
यूरोप के अलावा ट्रंप की निगाहें कैरेबियन सागर के द्वीप देश क्यूबा और दक्षिण अमेरिकी देश कोलंबिया पर भी टिकी हैं.यहां भी ट्रंप हमले का प्लान बना रहे हैं. पहले आपको कोलंबिया से ट्रंप की नाराजगी की वजह और ट्रंप की धमकी के बारे में जानना चाहिए.
आजकल अमेरिका के पत्रकार भी ट्रंप को कुरेद कुरेद कर जानना चाहते हैं कि ट्रंप की सैन्य तैयारियों की गाज कहां पर गिरने वाली है और ऐसे ही एक सवाल के जवाब में ट्रंप ने मादुरो की तरह कोलंबिया के राष्ट्रपति का नाम लिया है, जिन्हें वो पसंद नहीं करते हैं. ट्रंप कह रहे हैं कोलंबिया पर शासन कर रहे नेता बीमार हैं,उनका शासन नहीं टिकेगा.
कोलंबिया पर भी हमला कर सकते हैं ट्रंप
पत्रकार ने पूछा कि अमेरिका यहां भी हमला करेगा तो ट्रंप ने खुश होकर कहा ये काफी अच्छा है. यानी ट्रंप मादुरो को वेनेजुएला से अगवा करने के बाद इतने खुल गए हैं या कहिए, इतने अराजक हो गए हैं कि किसी भी देश पर हमला करने को तैयार हैं. वैसे, ट्रंप की धमकी के जवाब में कोलंबिया के राष्ट्रपति ने जनता की आड़ लेने की कोशिश की. लेकिन वो भी जानते हैं कि आजकल जो ट्रंप कह रहे हैं, वो करके भी दिखा रहे हैं. इसलिए कोलंबिया ने अपनी सेना की तैनाती भी कर दी है.
आज कोलंबिया की सेना के हेलीकॉप्टर..बॉर्डर के इलाकों में गश्त करते नजर आए. इन हेलीकॉप्टर्स की संख्या बता रही थी कि वेनेजुएला में अमेरिकी फाइटर जेट का एक्शन और ट्रंप की धमकी को कोलंबिया हलके में नहीं ले रहा है.
इसके अलावा वेनेजुएला बॉर्डर के पास भी टैंक बख्तरबंद वाहन और सैनिकों को तैनात कर दिया गया है. यह कदम सीधे तौर पर अमेरिका की सैन्य कार्रवाई के बाद उठाया गया है. कोलंबिया में ये तैनाती हाल के दशकों की सबसे बड़ी सैन्य-कार्रवाई है .अब जानिए कि ट्रंप कोलंबिया से क्यों नाराज हैं ? और कोलंबिया पर अटैक की बात कह रहे हैं ।
ट्रंप चाहते हैं कि कोलंबिया पहले की तरह ड्रग्स के खिलाफ कठोर सैन्य नीति अपनाए, लेकिन कोलंबिया सरकार अब ऐसा नहीं चाहती.
कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्ताव पेट्रो शांति, बातचीत और किसान-समर्थन की नीति चला रहे हैं, जिसे ट्रंप “कमज़ोरी” मानते हैं.
इसी वजह से ट्रंप प्रशासन ने कोलंबिया को ड्रग-वॉर में सहयोग नहीं करने वाला देश कहकर दबाव बढ़ाना शुरू किया है.
वेनेजुएला ऑपरेशन के बाद ट्रंप चाहते थे कि कोलंबिया खुलकर अमेरिकी सैन्य बेस बने. लेकिन बोगोटा ने इनकार किया.
असलियत में ट्रंप की सख्त लैटिन-अमेरिका नीति में कोलंबिया अब आज्ञाकारी सहयोगी नहीं रहा.इसीलिए ट्रंप की आंखों का कांटा बन गया है, जिसे ट्रंप जल्द से जल्द निकालना चाहते हैं.
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ट्रंप ने कोलंबिया के अलावा क्यूबा के लिए भी भविष्यवाणी कर दी. अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा अब क्यूबा में भी सरकार जाएगी. अमेरिकी विदेश मंत्री भी क्यूबा को बड़ी समस्या बता रहे हैं. वेनेजुएला में अमेरिकी ऑपरेशन में कई क्यूबाई नागरिक और सुरक्षा कर्मी मारे गए, जिसे हवाना ने “युद्ध जैसा हमला” कहा.
क्यूबा कर रहा अमेरिकी हमले का विरोध
क्यूबा खुलकर इस हमले के लिए अमेरिका का विरोध कर रहा है. रूस का पुराना सहयोगी क्यूबा अमेरिका को दशकों से चुनौतियां दे रहा है.क्यूबा मिसाइल संकट इससे पहले भी अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है और अब ट्रंप अपने नई परिस्थितियों में अपने इस पुराने दुश्मन को भी निपटाना चाहते हैं और इस डर को देखते हुए क्यूबा भी युद्धाभ्यास कर रहा है. क्यूबा ने भी एयर डिफेंस सिस्टम तैनात कर दिए हैं. यानी ट्रंप को संदेश दिया जा रहा है कि अगर अमेरिकी हेलीकॉप्टर क्यूबा में घुसे तो उनकी राह आसान नहीं होगी.
वेनेजुएला,ग्रीनलैंड और कोलंबिया और क्यूबा के अलावा दुनिया में चार और ऐसे क्षेत्र हैं, जहां पर ट्रंप कब्जा करना चाहते हैं. उसे अमेरिका या फिर अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं.
ट्रंप इससे पहले कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की पेशकश कर चुके हैं. कनाडा ने इसे अपमानजनक बताया था.
ट्रंप ने पनामा कैनाल वापस लेने की इच्छा जाहिर की थी. ट्रंप ने आरोप लगाया था कि यहां पर टोल और चीन का असर तेजी से बढ़ रहा है.
ट्रंप मैक्सिको में भी एंट्री चाहते हैं. यहां ट्रंप ने ड्रग कार्टेल्स के खिलाफ अमेरिकी सेना भेजने की बात कही थी.
ट्रंप की नजर गाजा पर भी है. ट्रंप ने फिलिस्तीनियों को गाजा से बाहर बसाने का प्लान दुनिया के सामने रखा था. वो गाज़ा को “Middle East का Riviera” यानी समुद्र किनारे का अमीरों और सैलानियों का लग्ज़री इलाका बनाना चाहते थे. और इसमें अमेरिकी कंपनियों को अहम रोल निभाना था. लेकिन इसके लिए मुस्लिम मुल्क फिलहाल तैयार नहीं.

1 day ago
