Last Updated:January 15, 2026, 16:28 IST
IAS Topper Story: बक्सर के पूर्व डीएम और 2012 बैच के तेजतर्रार आईएएस अधिकारी मुकेश पांडे की वह कहानी, जिसने 9 साल पहले पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था. यूपीएससी में 14वीं रैंक हासिल करने वाले इस अधिकारी ने एक ऐसा कदम उठाया, जो आज चर्चा में आ जाता है. क्या एक आईएएस अधिकारी पारिवारिक कलह और मानसिक तनाव नहीं झेल पाता है? जानिए उस डीएम की कहानी, जिसने दिल्ली के होटल लीला के कमरा नंबर 742 और नीला बैग का जिक्र कर अपने आखिरी सफर पर निकल गया. क्या पत्नी और ससुराल पक्ष से विवाद ने उन्हें वो रास्ता चुनने के लिए मजबूर किया, जो करोड़ों में एक आदमी चुनता है. एक आईएएस टॉपर की दर्दभरी कहानी.
2012 बैच के टॉपर आईएएस की इनसाइड स्टोरी.IAS Topper Story: सफलता की चकाचौंध के पीछे कभी-कभी इतना गहरा अंधेरा छिपा होता है कि इंसान को मौत का रास्ता ही सबसे आसान लगने लगता है. साल 2017 की 11 अगस्त की वह सुबह भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के गलियारों के लिए एक ऐसी खबर लेकर आई, जिसने हर किसी को स्तब्ध कर दिया. बिहार के बक्सर जिले के जिलाधिकारी (DM) मुकेश पांडे, जिनका करियर किसी भी युवा के लिए प्रेरणा हो सकता था, गाजियाबाद में एक रेलवे ट्रैक पर मृत पाए गए. उनका शव क्षत-विक्षत हालत में मिला था, लेकिन उनके पास से बरामद सुसाइड नोट ने जो कहानी बयां की, वह सफलता और व्यक्तिगत जीवन के बीच के उस भयानक संघर्ष को उजागर करती है, जिसे अक्सर समाज देख नहीं पाता. जानें एक टॉपर ने क्यों वह रास्ता चुना, जो बहुत कम लोग चुनते हैं.
सफलता का शिखर और अचानक अंत मुकेश पांडे कोई साधारण अधिकारी नहीं थे. 2012 बैच के इस आईएएस अधिकारी ने यूपीएससी जैसी कठिन परीक्षा में देशभर में 14वीं रैंक हासिल की थी. उनकी छवि एक ईमानदार, कर्मठ और संवेदनशील अधिकारी की थी. खुद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें एक ‘कुशल प्रशासक’ के रूप में सराहा था. बक्सर में उनकी तैनाती के दौरान लोग उनकी कार्यशैली के कायल थे. लेकिन किसे पता था कि जो व्यक्ति पूरे जिले की समस्याओं को सुलझाने का दम रखता था, वह अपने भीतर चल रहे तूफानों से हार जाएगा.
होटल का कमरा नंबर 742 और वो नाइकी बैग
मरने से पहले मुकेश पांडे दिल्ली के एक आलीशान पांच सितारा होटल ‘द लीला पैलेस’ में रुके थे. पुलिस को उनके शव के पास से जो सुसाइड नोट मिला, उसमें साफ लिखा था कि वे अपनी मर्जी से जान दे रहे हैं. उन्होंने अपनी आखिरी चिट्ठी में दिल्ली के होटल के कमरा नंबर 742 का जिक्र किया था, जहां उनके नाइकी का ब्लू बैग में एक विस्तृत सुसाइड नोट रखा था. उनके शब्दों में गहरी हताशा थी. उन्होंने लिखा था, ‘मैं जीवन से तंग आ चुका हूं और मेरा मानवीय अस्तित्व से विश्वास उठ गया है.’ यह पंक्तियां किसी ऐसे व्यक्ति की नहीं लग रही थीं जिसने सिस्टम के सबसे ऊंचे पायदान पर अपनी जगह बनाई हो.
पारिवारिक कलह और पत्नी के साथ विवाद का दर्द
मुकेश पांडे की इस आत्महत्या के पीछे की सबसे बड़ी वजह जो सामने आई, वह थी उनके निजी जीवन में चल रहा भीषण तनाव. रिपोर्ट्स और पुलिस जांच के मुताबिक, मुकेश अपनी शादीशुदा जिंदगी और पारिवारिक विवादों के चलते भारी मानसिक दबाव में थे. पत्नी और मां में अक्सर लड़ाई होती थी. पांडेय ने सुसाइड नोट में उन्होंने अपनी पत्नी और ससुराल वालों के साथ वैचारिक मतभेदों और आपसी कलह की ओर संकेत किया था. एक ऐसा व्यक्ति जो दफ्तर में सैकड़ों फाइलें निपटाता था, वह घर के विवादों के आगे खुद को बेबस महसूस करने लगा था. यह विडंबना ही है कि समाज में प्रतिष्ठित माने जाने वाले पदों पर बैठे लोग भी घर की चारदीवारी के भीतर के झगड़ों से इस कदर टूट सकते हैं.
वह आखिरी सफर
मॉल से रेलवे ट्रैक तक मुकेश पांडे बक्सर से यह कहकर निकले थे कि उनके मामा की तबीयत खराब है और वे दिल्ली जा रहे हैं. लेकिन उनकी नियत कुछ और ही थी. दिल्ली पहुंचने के बाद वे जनकपुरी के एक मॉल में गए, जहां उन्होंने बिल्डिंग की 10वीं मंजिल से कूदकर जान देने की कोशिश की, लेकिन सुरक्षा के डर से वे वहां से निकल गए. सीसीटीवी फुटेज में उन्हें नीली टी-शर्ट और जींस पहने हुए मेट्रो स्टेशन की ओर जाते देखा गया. इसके बाद उन्होंने अपने रिश्तेदारों को व्हाट्सएप पर मैसेज भेजकर अपने इरादों की सूचना दी. जब तक पुलिस उन्हें लोकेट कर पाती, तब तक वे गाजियाबाद के कोटगांव रेलवे ट्रैक पर पहुंच चुके थे और एक तेज रफ्तार ट्रेन ने उनकी जीवनलीला समाप्त कर दी थी.
एक अधूरे सपने की दास्तान
गुवाहाटी में रहने वाले मुकेश के पिता ने जब उनसे आखिरी बार बात की थी, तो मुकेश ने उनसे उनकी डायबिटीज का हाल पूछा था. पिता को जरा भी भनक नहीं थी कि उनका लाडला बेटा जो अब एक जिले का मालिक है, वह इतना बड़ा कदम उठा लेगा. मुकेश पांडे की मौत ने मानसिक स्वास्थ्य और कार्य के दबाव के साथ-साथ व्यक्तिगत खुशी के महत्व पर एक नई बहस छेड़ दी थी. उनकी मौत इस बात का प्रमाण थी कि पैसा, रुतबा और सफलता तब तक बेमानी हैं, जब तक मन में शांति न हो.
आज भी जब बिहार के प्रशासनिक हल्के में मुकेश पांडेय का नाम आता है, तो लोग उनकी कार्यक्षमता को याद करते हैं, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठता है कि क्या हमारा समाज और सिस्टम अपने सबसे काबिल अधिकारियों को वह मानसिक संबल दे पा रहा है, जिसकी उन्हें जरूरत है? मुकेश पांडे की कहानी एक सफल आईएएस की कहानी कम और एक टूटे हुए इंसान की व्यथा ज्यादा लगती है.
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रविशंकर सिंहचीफ रिपोर्टर
भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले रविशंकर सिंह सहारा समय न्यूज चैनल, तहलका, पी-7 और लाइव इंडिया न्यूज चैनल के अलावा फर्स्टपोस्ट हिंदी डिजिटल साइट में भी काम कर चुके हैं. राजनीतिक खबरों के अलावा...और पढ़ें
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Ghaziabad,Ghaziabad,Uttar Pradesh
First Published :
January 15, 2026, 16:28 IST

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