क्या था रामायणकाल का खाना - पीना, कौन करता था मांसाहार, महलों में कैसी थी थाली

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अक्सर ये सवाल उठता है कि रामायणकालीन लोग क्या खाते थे. क्या वो शाकाहार और मांसाहार दोनों तरह का खाना खाते थे. उस समय खाना बनाने -पकाने का तरीका कैसा था. इसमें कोई शक नहीं कि उस दौर में खूब अनाज पैदा होता था. अगर कोई मेहमान घर में आ जाए तो उसको उच्च कोटि का भोजन कराया जाता था. तरह तरह के पकवान बनाए जाते थे. लोगों को जब लुभाना होता था या उनसे कोई काम कराना होता था तो स्वादिष्ट पकवानों का आफर दिया जाता था.

रामायणकालीन खानपान के बारे में कई किताबें और ग्रंथ भरपूर जानकारियां देती हैं, इसमें फूड हिस्टोरियन की किताबें भी हैं और उस दौर पर लिखी गईं किताबें भी. शांतिकुमार नानूराम व्यास की किताब “रामायणकालीन संस्कृति” इस बारे में बहुत प्रामाणिक जानकारी देती है. इसमें खान-पान पर एक अध्याय भी है.

किताब में लिखा गया कि मुनिकुमार ऋष्यश्रृंग को अंग देश में लाने के लिए वेश्याओं ने उन्हें नाना प्रकार की मिठाइयों का प्रलोभन दिया था. रावण ने सीता को कई तरह की खाने पीने की चीजों से लुभाने की कोशिश की थी. उस समय अन्न का दान सबसे बेहतर दान माना जाता था. दशरथ और राम के अश्वमेघ यज्ञों में धन और वस्त्र के साथ अन्न का भी दान दोनों हाथों से किया गया. सीता जब वनवास के लिए अयोध्या से निकलीं तो उन्होंने वहां ब्राह्मणों को प्रचुर अन्न दान करने की प्रतिज्ञा की.

शाकाहार के साथ मांसाहार भी

आर्यों का खान -पान वानरों और राक्षसों से अलग था. आर्य मुख्य तौर पर शाकाहारी और कुछ हद तक मांसाहारी थे, वानर विशुद्ध शाकाहारी और राक्षस मुख्य तौर पर मांसाहारी थे. जब वन में भरद्वाज मुनि ने भरत के सैनिकों का स्वागत किया तो उनसे कहा आप अपनी इच्छानुसार सुरा-पान, मांस भक्षण और शाकाहार का सेवन करें. तब इस सेना को इतनी खीर दी गई कि इससे आश्रम के आसपास कीचड़ ही कीचड़ हो गया.

भरत की सेना के लिए मांस परोसा गया

भरद्वाज आश्रम में भरत के सैनिकों को कई तरह के मांस पदार्थ परोसे गए थे यानि ऋषि के आश्रम में मांस के खाने को बनाने या परोसने में कोई गुरेज नहीं था. सीता ने गंगा को मांस भूतौदन (मांस, चावल, शाग और मसालों को एक साथ उबालकर बनाया गया पुलाव) से संतुष्ट करने का संकल्प लिया था. श्राद्धों में ब्राह्णणों को मांस खिलाने की परिपाटी थी.

कौन से अनाज खाए जाते थे, चावल क्यों प्रिय

चावल, जौ और गेहूं मुख्य खाद्य थे. उत्तरकांड में मूंग, चना, कुलथी के साथ उड़द दालों का उल्लेख हुआ है. रोटी खाई जाती थी. चावल खूब खाते थे. खाने में दालों और द्रव सामग्री का उपयोग होता था. खाना मीठा और नमकीन दोनों तरह का होता था. उबला हुआ चावल प्रमुख आहार था. अगर कुंभकरण को चावल के तरह तरह के व्यंजन परोसे जाते थे तो भरद्वाज और वशिष्ठ के आश्रमों में अतिथियों के लिए भरपूर भात उपलब्ध रहता था. सीता अयोध्या में कई तरह के व्यंजनों के साथ अच्छे चावल का सेवन करती थीं.
चावल से इन नामों से व्यंजन बनते थे
मृष्टान्न – चावल के मालपुए
मोदक – चावल, दाल और चीनी के लड्डू
लाज – भुना हुआ चावल
ओदन – भात
पायस – दूध की खीर
कृसर – खिचड़ी या चावल, तिल और दूध से बनी मिठाई
शालि – चावल की बेहतरीन प्रजाति जो जाड़ों में पैदा होती थी
हविष्यान्न – घी में पकाया हुआ चावल
ऐसा लगता है कि रामायणकालीन दौर में चावल की कई किस्में थीं और उनका अलग अलग तरह से इस्तेमाल होता था. खीर खूब खाई जाती थी.

दूध दही का इस्तेमाल 

दूध, दही, मक्खन और घी का खूब इस्तेमाल होता था. चीनी और मसालों में मिली हुई दही को रसाल या रायता कहते थे. उस दौर में सौवर्चल नाम का विशेष नमक इस्तेमाल किया जाता था. खाने में मिर्च, चटनी और खटाई का प्रयोग भी होता था. चीनी, गुड़ और शहद से मिठाइयां बनाई जाती थीं. फल भरपूर होते थे.

रामायण में आम, गन्ना, केला, खजूर, जामुन, अनार, नारियल, कटहल और बेर जैसे फलों का उल्लेख हुआ है. फलों का रस भी निकाला जाता था.

कुछ पशु मेध्य थे यानि खाने लायक

हां, खाए जाने वाले पशुओं दो श्रेणियों में रखा गया था, खाए जाने वाले जिन्हें मेध्य यानि पवित्र कहते थे और अमेध्य यानि अपवित्र. मेध्य पशुओं का मांस देवताओं को समर्पित करने योग्य माना जाता था. ये पशु छाग यानि बकरा, हिरण और सुअर थे. मृग यानि हिरण का मांस आर्यों में खासतौर पर प्रिय था. चर्बीवाले पक्षी आहार की दृष्टि से अच्छे माने जाते थे.

मछली का भोजन काफी प्रचलित था. कांटा फेंककर मछली पकड़ने के बारे में वाल्मीकी ने कई बार संकेत किया है. बाणों से भी मछली का शिकार किया जाता था. पंपा सरोवर की मोटी मोटी मछलिया काफी प्रसिद्ध थीं.

अपने वनवास के पहले दिन ही भूख लगने पर राम और लक्ष्मण शाम को मृगों का शिकार किया था. यमुना के करीबी जंगलों में उन्होंने कई पवित्र मृगों का शिकार किया. जिसे रामायण में “बहुन्मेघ्यान्मृगान्हत्वा चेरतुर्यमुनावने” (2/52/33) कहा गया.

हालांकि मांसाहार के व्यापक प्रचलन के बावजूद उसे खराब किस्म का भोजन माना जाता था. इसी वजह से राम ने अपने वनवास काल में कंद मूल फल से निर्वाह करने और मुनियों की तरह मांस का त्याग करने का संकल्प लिया. वह संयमित शाकाहार पर ज्यादा जोर देते थे.

अशोकवाटिका में हनुमान ने सीता से कहा था आपके वियोग में राम ना तो मांस का सेवन करते हैं और न मधु का (न मांसं राघवो भुंक्ते न चैव मधु सेवते, 5/36/41)

अरण्यकांड और अयोध्याकांड में स्पष्ट उल्लेख है कि राम–लक्ष्मण–सीता कंद-मूल, फल खाते थे. मृग का शिकार करते थे. “लक्ष्मणो मृगयां यायात्” यानि लक्ष्मण शिकार के लिए जाते थे.

अयोध्या का राजभोजन क्या था

अयोध्याकांड में दशरथ के राजभोज का में ये चीजें शामिल थीं- चावल, घी, दूध, मांस से बने व्यंजन, मदिरा. ये संकेत देता है कि क्षत्रिय और राजदरबार में मांसाहार सामान्य था.

रामायण काल में पितृयज्ञ, अतिथि सत्कार में मांस परोसने का उल्लेख मिलता है, जो वैदिक परंपरा का हिस्सा था. फूड हिस्टोरियन केटी अचाया “इंडियन फूड – एक हिस्टोरिकन कंपेनियन” (Indian Food: A Historical Companion) में लिखते हैं कि वैदिक और रामायण काल में शाकाहार और मांसाहार दोनों प्रचलित थे. शुद्ध शाकाहार का विचार बाद में बौद्ध–जैन प्रभाव से मजबूत हुआ.

इतिहासकार उपिंदर सिंह की किताब “ए हिस्ट्री ऑफ एनसिएंट एंड अर्ली मेडव इंडिया” (A History of Ancient and Early Medieval India) में लिखा है, यज्ञ, उत्सव, राजभोज में मांस का प्रयोग होता था. तपस्वी जीवन में शाकाहार था तो समाज मिश्रित खाद्य संस्कृति वाला था.

भोजन कितनी बार होता था

भोजन दिन में तीन बार किया जाता था. सबेरे का भोजन प्रातराश कहलाता था. रावण ने सीता को धमकी दी थी कि यदि तुमने मेरी पर्यकशायिनी बनने से इनकार कर दिया तो रसोइए मेरे सुबह के नाश्त के लिए तुम्हारे टुकड़े टुकड़े कर डालेंगे. राक्षण नरमांस भी खाने के  लिए जाने जाते थे.

दूसरी बार का भोजन दोपहर बाद किया जाता था. उत्तरकांड के अनुसार राम अपनी अशोकवाटिका में सीता के साथ दोपहर बाद का भोजन करते थे. भोजन का अंतिम समय रात का था. रावण के रात के समय के भोजन का सुंदरकांड के ग्यारहवें सर्ग में विस्तार से बताया गया है.  इसमें वो ये चीजें खाता था.

मृगों, भैंसों और जंगली सुअरों के मांस के कटे टुकड़े सोने बड़े पात्रों में मोरों और मृगों का भुना हुआ मांस नमक मिश्रित शूकर, एक तरह का पक्षी, साही, हरिण और मोर का मांस कई तरह अन्य मांस एकशल्य मछली का भली भांति का पकाया मांस चटनियां विविध पेय और नमकीन मीठे पदार्थ तरह तरह के फल कई तरह के सुंगधित मसालों से सुवासित शर्करा, मधु, पुष्प और द्रव.

रसोइया कैसा होता था

रसोइया सूद या सूपकार कहलाता था. उससे ये अपेक्षा की जाती थी कि वह चबाने, निगलने, चूसने और चाटने के सभी खाद्य पदार्थों को बनाने में सिद्धहस्त हो. वैसे उस समय के राजकुमार भी पाक कला को अच्छी तरह जानते थे. लक्ष्मण खुद कुशल रसोइया थे. भोजन परोसते समय रसोइए सुंदर वस्त्र और आभूषणों से सज्जित थे.

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