Venezuela playbook won't work in Iran: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला में तख्तापलट कराने के बाद वहां के राष्ट्रपति मादुरो को कैदियों की तरह उठाने के बाद कोलंबिया और अन्य देशों को धमकाया तो वहां से भी बराबरी का पलटवार आया. हालांकि मादुरो का हाल देख कर कुछ राष्ट्राध्यक्षों ने व्हाइट हाउस से फोन पर संपर्क किया और वार्ता के जरिए हालिया बयानों से पैदा हुई गरमागरमी और गहमागहमी को पानी डालकर ठंडा कर दिया. दक्षिण अमेरिका में तो शांति आ गई लेकिन अमेरिकी प्रायद्वीप से दूर मिडिल ईस्ट के ईरान की चिंता अभी खत्म नहीं हुई है.
अमेरिका को ईरान में वेनेजुएला जैसा दखल क्यों नहीं देना चाहिए?
ईरान की चिंता क्यों नहीं खत्म हुईं, इसकी दो वजहें हैं एक तो ईरान में सरकार विरोधी और खासकर सुप्रीम लीडर खामनेई की कथित तानाशाही के खिलाफ सुलगी चिंगारी ठंडी नहीं हुई है. दूसरा 13 जून, 2025 को इजरायल से तेहरान पर हमले करवाकर ट्रंप अपने गुस्से का ट्रेलर दिखा चुके हैं. अमेरिका और ईरान के बीच चल रही नूराकुश्ती को लेकर एक्सपर्ट्स ने चिंता जताई है. सबका मानना है कि पहले से बारूद के ढेर पर बैठे मिडिल ईस्ट को और दहलाने से बचाने के लिए ट्रंप को ईरान पर वेनेजुएला जैसा एक्शन लेने से बचना चाहिए, क्योंकि ये जरूरी नहीं कि ट्रंप का 'वेनेजुएला प्लान' जैसा आइडिया ईरान में भी उतने स्ट्राइक रेट से कामयाब हो.

कैसी हैं परिस्थितियां?
इसमें शक नहीं कि वेनेजुएला हो या ईरान दोनों जगह जनता में अपनी सरकारों के प्रति सालों से गहरा आक्रोश था. इसके बावजूद वेनेजुएला में जो हुआ उसे ईरान में रिपीट करना आसान नहीं है. ईरान में 1980 के दशक से अलोकप्रिय सरकार है. इस बार मामला एनर्जी बैन के चलते चरम पर है. ये भी संभव है कि मादुरो को राजधानी कराकस से न्यूयॉर्क ले जाने की अचानक की गई कार्रवाई ने तेहरान का डर और बढ़ा दिया हो.
मौत का आंकड़ा 36 और ईरान को धमका रहा अमेरिका
ईरान के सुरक्षा बलों ने अब तक दमनात्मक कार्रवाई करते हुए सत्ता विरोधी प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाया है. पश्चिमी मीडिया का दावा है कि खामनेई के इशारे पर ईरान के सुरक्षा बलों ने कम से कम 36 लोगों को मार डाला है और अपने खिलाफ अशांति को कम करने के लिए तकरीबन 2000 लोगों को गिरफ्तार किया है. डोनाल्ड ट्रंप प्रदर्शन के पहले दिन से ईरान को चेतावनी दे रहे हैं कि अगर तेहरान में यूं ही नरसंहार जारी रहा तो अमेरिका हस्तक्षेप करने के लिए तैयार है.
ये अलग बात है कि खामनेई इसके कहीं बड़े-बड़े प्रदर्शनों के दौर को आसानी से खत्म करा चुके हैं. खामेनेई ने अतीत में इससे भी बड़े विरोध आंदोलनों का सामना किया है. साल 2009 में लोकतंत्र समर्थक ग्रीन क्रांति में लाखों लोगों के शामिल होने से लेकर 2022-2023 के महिलाओं को अदब से रहने का तरीका सिखाने से लेकर महंगाई और ईंधन की कमी तक को लेकर हुए प्रदर्शनों को खामनेई ने आसानी से टैकल करते हुए अपनी सत्ता को बरकरार रखा है.
ईरान कमजोर दिख रहा
इस बार हालात अलग हैं. ईरान की सरकार घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर बचाव की मुद्रा में है. पिछले साल इजराइल ने उसके परमाणु ठिकानों पर हमला करके बुरी तरह हराया. ईरान के मुख्य सहयोगियों जिनमें सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद, गाजा में हमास और लेबनान में हिजबुल्लाह तक का सत्यानाश हो गया और ईरान कुछ न कर पाया.
खामेनेई की तमाम बड़ी-बड़ी बातों के बावजूद, ईरान की नाकामियों का ठीकरा खामनेई के सिर फूटा. अर्थव्यवस्था की खराब हालत और ईरानी मुद्रा की गिरती कीमत और महंगाई ने खामनेई के खिलाफ लाखों लोगों को खड़ा कर दिया.
क्या खामनेई बैकफुट पर हैं जिसका फायदा उठाना चाहते हैं ट्रंप?
ईरान ने बीते दस सालों में अरबों रुपये विदेशी प्रोजेक्ट्स में फूंके हैं. खामेनेई और उनके इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने कई विदेशी कारनामों पर सैकड़ों अरबों डॉलर खर्च किए हैं. जनता का दावा है कि इसमें एक रुपये का फायदा भी ईरान को नहीं हुआ. इसमें यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम भी शामिल रहा, जिसका ईरान के लिए कोई फौरी कमर्शियल यानी व्यावसायिक मूल्य नहीं था, जबकि इसे बनाने में दसियों अरबों डॉलर खर्च हुए. ईरान की जनता ने इसे खामनेई की परमाणु सनक से जोड़कर देखा, उनको लगा कि परमाणु हथियार बनाने के संदिग्ध लक्ष्य के कारण ईरान को प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा और वो अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर अलग-थलग पड़ गया.
वेनेजुएला में भी लगाया ईरान ने पैसा?
असद के सीरिया और हिजबुल्ला वाले देश लेबनान में ईरान ने अरबों रुपये कथित रूप से फूंक दिए. हमास को फंडिंग भी काम न आई. नतीजा ईरान को चवन्नी का फायदा नहीं मिला. सीरिया में असद की सत्ता को बागी नेता 'सर्रा' ने उखाड़ फेका. सीरियाई राष्ट्रपति असद को देश छोड़कर मास्को में शरण लेनी पड़ी. शर्रा रूस का हाथ झटककर अमेरिका की गोद में बैठ गए.
इसी तरह हिजबुल्ला पर लगाया पैसा भी बेकार गया क्योंकि वो अमेरिका समर्थित इजरायल का बाल बांका नहीं कर सका, खुद बर्बाद हो गया. यही हाल ईरान से फंडिग लेने वाले हमास का रहा. गाजा के बंकरों में छिपकर खुद को तीस मार खां समझने वाले बड़े-बड़े हमास के कमांडर और नेता इजरायल ने मार गिराए और गाजा को खाली प्लाट में बदल दिया.
हालांकि इस बात का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है कि ईरान ने वेनेजुएला में कितना निवेश किया है, जिसे वह अब खो भी सकता है. लेकिन तेल रिफाइनरी और टैंकर बनाने से लेकर ऑटोमोटिव फैक्टरियों और घरों में इस्तेमाल होने प्रोजेक्ट्स को देखते हुए, एक अनुमान है कि लगभग 2 अरब डॉलर से 4 अरब डॉलर का कर्ज उस पर बकाया हो सकता है.
ट्रंप को संयम क्यों बरतना चाहिए?
चीन और रूस दोनों सिर्फ अमेरिका की निंदा में व्यस्त हैं. दोनों ने ऐसा कुछ भी ठोस नहीं किया है जिससे ईरान का डर कम हो इसके बावजूद माना जा रहा है कि ट्रंप को दुस्साहस में भी ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे मिडिल ईस्ट में एक नई जंग शुरू हो जाए, जिसे रोकना असंभव सा हो.
क्या कहती है जियोपॉलिटिक्स?
ईरान के लोग अपने नेता की आलोचना कर सकते हैं लेकिन बाहरी हमले पर पूरा ईरान एक जुट हो सकता है. इसके साथ ही क्या है ताजा स्थिति ये भी आपको बताते हैं. पिछले साल जून में इजरायल पर हमला अचानक हुआ था, उन्हें संभलने का मौका नहीं मिला, लेकिन इस बार ईरान पहले से ज्यादा तैयार होगा. वहीं जून, 2025 के इजरायल के हवाई हमलों के बाद कुछ समय तक ईरान की सरकार को अपनी जनता की सहानुभुति मिली. क्योंकि विदेशी ताकतों के हमले में हुई मौतों ने देश को एकजुट किया.
ईरान के इस्लामी नेताओं ने भी देशभक्ति की भावना को बढ़ावा देने के लिए फारसी राष्ट्रवादी प्रतीकों को अपनाया, जिन्हें वे पहले मूर्तिपूजा कहकर निंदा करते थे. इसलिए ये मानने के पर्याप्त कारण हैं कि पिछले साल की तरह ईरान पर हमले करने से खामनेई को फायदा होगा, क्योंकि प्रदर्शनकारी दुश्मन का साथ देने वाला 'गद्दार' समझे जाने के डर से अपने घर लौट सकते हैं.
वहीं अगर अमेरिकी-इजराइली हमले से ईरान की सरकार गिर भी जाती है, तब भी इस बात की गारंटी नहीं है कि नया राष्ट्रपति पश्चिमी देशों का पिछलग्गू समर्थक लोकतंत्र का लबादा ओढे़गा. बल्कि ज्यादा संभावना ये है कि ईरान की सत्ता IRGC द्वारा चलाई जाने वाली एक कम धार्मिक लेकिन अमेरिका की उतनी ही कट्टर दुश्मन सरकार के पास चली जाएगी.
एक और वजह ईरान का इस्लामिक देश होना है. भले ही ईरान 'शिया' देश है, लेकिन मुस्लिम ब्रदरहुड के नाम पर सऊदी को छोड़ बाकी इस्लामिक देश ईरान के साथ आ सकते हैं. ऐसा हुआ तो इस स्थिति से निपटना अमेरिका तक के लिए आसान न होगा. ये अप्रत्याशित स्थिति हो सकती है, क्योंकि मामला धर्म की धुरी पर आ सकता है.
Disclaimer: (ये लेखक के निजी विचार हैं)

12 hours ago
