Last Updated:January 16, 2026, 17:30 IST
Afghanistan Bans Pakistani Medicines: अफगानिस्तान ने घटिया क्वालिटी और बढ़ते तनाव के चलते पाकिस्तानी दवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है. अब भारतीय दवाएं अपनी कम कीमत और बेहतर नतीजों के कारण वहां के नागरिकों की पहली पसंद हैं. भारत ने 327 टन मेडिकल सहायता भेजकर काबुल का दिल जीत लिया है. जायडस के साथ हुए 100 मिलियन डॉलर के सौदे ने पाकिस्तान को बाजार से बाहर धकेल दिया है. अब अफगान स्वास्थ्य क्षेत्र में भारत का दबदबा है.
दवाओं के लिए पाकिस्तान छोड़ भारत की ओर देख रहा अफगानिस्तान. (AI Image)नई दिल्ली/काबुल: अफगानिस्तान की फार्मेसी में होने वाली एक छोटी सी खरीदारी ने दक्षिण एशिया की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत दिए हैं. पाकिस्तान की दवाएं अपनी गिरती गुणवत्ता और राजनीतिक अस्थिरता के कारण अफगान बाजार से बाहर हो रही हैं. इसकी जगह अब भारतीय दवाएं अपनी मजबूती और विश्वसनीयता के साथ खाली स्थान को भर रही हैं. सोशल मीडिया पर एक अफगान ब्लॉगर का अनुभव साझा होने के बाद यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है. पाकिस्तान के लिए यह न केवल आर्थिक झटका है, बल्कि उसकी क्षेत्रीय पकड़ के कमजोर होने का भी प्रमाण है. तालिबान सरकार ने पाकिस्तानी दवाओं पर प्रतिबंध लगाकर भारत को एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में चुना है. भारत अब अफगानिस्तान के स्वास्थ्य क्षेत्र में न केवल दवाएं भेज रहा है, बल्कि वहां के बुनियादी ढांचे को भी सुधारने में मदद कर रहा है.
अफगानिस्तान ने पाकिस्तानी दवाओं पर अचानक प्रतिबंध क्यों लगाया?
तालिबान सरकार ने नवंबर 2025 में पाकिस्तान से आने वाली सभी दवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया था. अफगानिस्तान के उप प्रधानमंत्री मुल्ला अब्दुल गनी बरादर ने दवाओं की घटिया गुणवत्ता को इस फैसले का मुख्य कारण बताया. पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सीमा पर लगातार होने वाली झड़पों ने भी व्यापारिक रिश्तों को रसातल में धकेल दिया है. तोरखम और चमन जैसे प्रमुख व्यापारिक मार्गों को बार-बार बंद किए जाने से दवाओं की आपूर्ति बाधित हो रही थी.
अफगान अधिकारियों का मानना है कि पाकिस्तान जानबूझकर कम मानक वाली दवाएं उनके देश में भेज रहा था. इसके अलावा दोनों देशों के बीच बढ़ते अविश्वास ने काबुल को नए विकल्प तलाशने पर मजबूर कर दिया. अब अफगानिस्तान ईरान, तुर्की और विशेष रूप से भारत की ओर अपनी जरूरतों के लिए देख रहा है. पाकिस्तान के लिए यह फैसला उसकी अर्थव्यवस्था के लिए किसी ‘कड़वी गोली’ से कम नहीं है.
भारतीय दवाओं ने अफगान बाजार में अपनी जगह कैसे बनाई?
भारतीय दवाएं अफगानिस्तान में अपनी गुणवत्ता और किफायती दामों के कारण पहली पसंद बन चुकी हैं. एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार जहां पाकिस्तानी ब्रांड की दर्द निवारक दवा का पत्ता 40 अफगानी में मिलता था, वहीं भारतीय विकल्प मात्र 10 अफगानी में उपलब्ध है. अफगान नागरिक भारतीय दवाओं के परिणामों को अधिक प्रभावी और सुरक्षित मानते हैं. भारत दुनिया भर में जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा उत्पादक है और उसकी यह ताकत अब अफगानिस्तान में दिख रही है. अफगान ब्लॉगर फजल अफगान ने एक्स पर अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि भारतीय टैबलेट ने उनका सिरदर्द मिनटों में ठीक कर दिया. यही कारण है कि वहां के स्थानीय दुकानदार भी अब ग्राहकों को भारतीय ब्रांड ही सुझा रहे हैं. भारतीय दवाओं की बढ़ती मांग ने पाकिस्तान के दशकों पुराने वर्चस्व को पूरी तरह खत्म कर दिया है. अब अफगानिस्तान के सुदूर इलाकों में भी ‘मेड इन इंडिया’ का नाम गूंज रहा है.जायडस लाइफसाइंसेज और अफगान सरकार के बीच क्या डील हुई है?
भारत और अफगानिस्तान के बीच व्यापारिक संबंध अब मानवीय सहायता से आगे बढ़कर व्यावसायिक समझौतों तक पहुंच गए हैं. नवंबर 2025 में भारतीय दवा क्षेत्र की दिग्गज कंपनी जायडस लाइफसाइंसेज ने एक बड़ा कदम उठाया. कंपनी ने अफगानिस्तान के रोफी इंटरनेशनल ग्रुप के साथ 100 मिलियन डॉलर (लगभग 840 करोड़ रुपये) के समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए. इस सौदे के तहत जायडस शुरुआत में अफगानिस्तान को जीवन रक्षक दवाओं का निर्यात करेगी. भविष्य में कंपनी वहां अपना स्थानीय कार्यालय और मैन्युफैक्चरिंग प्लांट भी स्थापित करने की योजना बना रही है. यह समझौता अफगानिस्तान की दवाओं के लिए आयात पर निर्भरता को कम करने में मदद करेगा. तालिबान सरकार भी भारतीय कंपनियों को निवेश के लिए करों में छूट और अन्य सुविधाएं देने का वादा कर रही है. यह रणनीतिक साझेदारी भारत की ‘फार्मा कूटनीति’ की एक बड़ी जीत मानी जा रही है.
भारत की ‘मेडिकल डिप्लोमेसी’ ने पाकिस्तान को कैसे पछाड़ा?
भारत ने पिछले चार वर्षों में अफगानिस्तान को 327 टन से अधिक चिकित्सा आपूर्ति भेजी है. इसमें कोविड वैक्सीन, रेबीज और हेपेटाइटिस के टीके के साथ-साथ आवश्यक एंटीबायोटिक्स भी शामिल हैं. भारत सरकार ने काबुल में आधुनिक अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों के निर्माण का संकल्प लिया है. पक्तिया, खोस्त और पक्तिका जैसे प्रांतों में पांच मैटरनिटी क्लीनिक बनाने का काम तेजी से चल रहा है. काबुल में एक 30 बिस्तरों वाला आधुनिक अस्पताल और कैंसर उपचार केंद्र भी बनाया जा रहा है. भारत ने हाल ही में काबुल को 128-स्लाइस सीटी स्कैनर और कैंसर की दवाएं भी दान में दी हैं. इसके अलावा भारतीय डॉक्टर वहां के स्थानीय डॉक्टरों को प्रशिक्षण देने के लिए मेडिकल कैंप लगा रहे हैं. जून 2025 में काबुल में लगे ‘जयपुर फुट कैंप’ ने 75 लोगों को कृत्रिम अंग लगाकर नई जिंदगी दी. भारत की यह निस्वार्थ सहायता पाकिस्तान की ‘धमकी और नाकेबंदी’ वाली राजनीति पर भारी पड़ रही है.अफगानिस्तान के हेल्थकेयर सेक्टर का भविष्य अब किसके हाथ में है?
आंकड़ों पर नजर डालें तो पाकिस्तान का अफगान फार्मा मार्केट शेयर 40 प्रतिशत से गिरकर अब नगण्य होने की ओर है. वहीं भारत का हिस्सा 15 प्रतिशत से बढ़कर आने वाले समय में 30 प्रतिशत से ऊपर जाने की उम्मीद है. भारत के फार्मा निर्यात संवर्धन परिषद (Pharmexcil) ने अनुमान लगाया है कि भारत अफगानिस्तान को सालाना 200 मिलियन डॉलर की दवाएं भेज सकता है.
अफगान स्वास्थ्य मंत्री मौलवी नूर जलाल जलाली ने भारत को अपना ‘दूसरा घर’ बताते हुए रिश्तों के नए अध्याय की शुरुआत की है. भारत अब वहां आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सा प्रणालियों को भी बढ़ावा देने पर काम कर रहा है. पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली और राजनीतिक जिद ने उसे अपने सबसे बड़े पड़ोसी बाजार से बेदखल कर दिया है. अब अफगानिस्तान के स्वास्थ्य और विकास की डोर भारत के हाथों में मजबूती से थमी हुई है.
About the Author
दीपक वर्मा (Deepak Verma) एक पत्रकार हैं जो मुख्य रूप से विज्ञान, राजनीति, भारत के आंतरिक घटनाक्रमों और समसामयिक विषयों से जुडी विस्तृत रिपोर्ट्स लिखते हैं. वह News18 हिंदी के डिजिटल न्यूजरूम में डिप्टी न्यूज़...और पढ़ें
Location :
New Delhi,New Delhi,Delhi
First Published :
January 16, 2026, 17:27 IST

1 hour ago
