बॉलीवुड और सियासत के रिश्ते भी बहुत दिलचस्प रहे हैं. लेकिन बहुत कम बॉलीवुड हस्तियां हैं, जिन्होंने राजनीति में जाकर लंबी और शानदार पारी खेली. इसी में एक थे सुनील दत्त. जो कई बार सांसद रहे. मंत्री बने और रूपहले पर्दे पर हीरो के तौर पर भी उनकी पारी कमाल की थी. ये किस्सा जितना रोचक है, उतना ही फिल्मी भी. ये किस्सा 1999 चुनावों का है.
1999 के लोकसभा चुनाव के दौरान ऐसी स्थिति बनी थी जब संजय दत्त अपने पिता सुनील दत्त के खिलाफ चुनाव प्रचार करने के लिए तैयार हो गए थे. उस समय सुनील दत्त कांग्रेस के टिकट पर मुंबई उत्तर-पश्चिम सीट से चुनाव लड़ रहे थे. संजय दत्त और उनके पिता के बीच उन दिनों कुछ अनबन चल रही थी. पिता उनकी व्यक्तिगत जिंदगी और शादी को लेकर नाखुश थे.
बेटे के कारण ही सुनील दत्त 1993 के मुंबई बम धमाकों में काफी हाथ जला चुके थे. वह उनकी जिंदगी का सबसे कठिन दौर था. एक ऐसा व्यक्ति जो अपनी देशभक्ति और सामाजिक कार्यों के लिए जाना जाता था, उसे अपने ही बेटे की वजह से “देशद्रोही” तक के ताने सुनने पड़े थे. संजय दत्त को जेल में डाल दिया गया था.
तब सुनील दत्त उस समय कांग्रेस के कद्दावर नेता और सांसद थे. संजय की गिरफ्तारी के बाद विपक्ष विशेषकर शिवसेना और भाजपा ने उन पर तीखे हमले किए. इस दबाव और अपनी ही पार्टी के कुछ नेताओं के साथ मतभेद के कारण उन्होंने 1993 में अपने सांसद पद से इस्तीफा भी दे दिया था.
लोग उन्हें देखकर रास्ता बदल लेते थे
सुनील दत्त ने एक इंटरव्यू में बाद में बताया कि जब संजय जेल में थे, तब उनके कई करीबी दोस्तों और फिल्म इंडस्ट्री के लोगों ने दूरी बना ली थी. यहां तक कि संसद के गलियारों में भी लोग उन्हें देखकर रास्ता बदल लेते थे. उन्हें इस बात का गहरा दुख था कि जिस शहर और देश की उन्होंने सेवा की, वही उन्हें शक की निगाह से देख रहा था.
उस दौर में दत्त परिवार को फोन पर जान से मारने की धमकियां मिलती थीं. एक बार तो सुनील दत्त इतना टूट गए कि उन्होंने कहा, “मैंने देश के लिए इतना काम किया, सरहद पर जवानों का हौसला बढ़ाया, और आज मुझे और मेरे परिवार को गद्दार कहा जा रहा है.”
तब उन्होंने सबकुछ दांव पर लगा दिया
सुनील दत्त आजीवन कांग्रेस के पक्के सिपाही रहे, लेकिन जब उनकी अपनी पार्टी ने संजय के मामले में उनकी मदद करने से हाथ पीछे खींच लिए, तो उन्हें मजबूरन अपने राजनीतिक विरोधी बाल ठाकरे के पास जाना पड़ा. बाल ठाकरे ने संजय की मदद की. संजय दत्त के कानूनी केस लड़ने में सुनील दत्त की जमा-पूंजी और काफी समय खर्च हुआ. वे घंटों अदालतों के बाहर खड़े रहते थे. जेल में संजय से मिलने के लिए कतारों में लगते थे. एक पिता के रूप में उन्होंने अपने बेटे को बचाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था.
सुनील दत्त का कद इस बात से पता चलता है कि इतने अपमान के बावजूद वे टूटे नहीं. बाद में फिर से राजनीति में लौटे. भारी मतों से जीत हासिल की. केंद्रीय मंत्री भी बने.
संजय दत्त ने पिता के खिलाफ प्रचार के लिए हां कर दिया
बाद में शिवसेना नेता बाल ठाकरे और संजय दत्त के बीच बहुत करीबी रिश्ते बन गए. इसकी वजह ये थी कि बाल ठाकरे ने संजय को उस समय बहुत सहारा दिया जब वे कानूनी मुश्किलों में फंसे थे. इसी निकटता का लाभ उठाते हुए शिवसेना ने संजय दत्त को अपने उम्मीदवार के समर्थन के प्रचार के लिए न्योता दिया, ये उम्मीदवार कोई और नहीं बल्कि उनके पिता के खिलाफ खड़ा था.
संजय दत्त को मुंबई बम कांड के दौरान लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा.
ये वो समय था जब पारिवारिक अनबन के कारण संजय पिता से नाराज भी थे. खबरों के अनुसार, संजय दत्त ने गुस्से में या भावनाओं में बहकर अपने पिता के खिलाफ प्रचार करने के लिए ‘हां’ कह दी थी. बाद में “कपिल शर्मा शो” में संजय दत्त ने स्वीकार किया कि ऐसा हुआ था. उन्होंने शिवसेना कैंडीडेट के खिलाफ प्रचार के लिए हां कर दिया था.
तब किसने संजय को समझाया
ये खबर जैसे ही मीडिया में आई, हड़कंप मच गया. तब पर्दे के पीछे कुछ ऐसा हुआ कि संजय दत्त ने अपने पैर पीछे खींच लिये. वह पिता के खिलाफ चुनाव प्रचार के लिए नहीं गए. संजय की बहन प्रिया दत्त ने मध्यस्थता की. संजय को समझाया कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं लेकिन पिता के खिलाफ जाना सही नहीं होगा
सुनील दत्त काफी आहत हुए कि उनका बेटा उन्हीं के खिलाफ चुनाव प्रचार करने वाला था. हालांकि उन्होंने इस पर कुछ नहीं बोला. सार्वजनिक रूप से संयम बनाए रखा. आखिरकार पारिवारिक गरिमा की जीत हुई. संजय दत्त ने पिता के खिलाफ प्रचार नहीं किया. संजय ने अपने बदले गहरे दोस्त सुनील शेट्टी को चुनाव प्रचार के लिए भेज दिया.
तब संजय ने अपने इस दोस्त को भेजा
तब सुनील शेट्टी ने उस चुनाव में सुनील दत्त के प्रतिद्वंद्वी और शिवसेना के उम्मीदवार मधुकर सरपोतदार के लिए प्रचार किया. सुनील शेट्टी ने ये स्टैंड दिया कि वह बाल ठाकरे का बहुत सम्मान करते हैं. जब उन्होंने ऐसा किया तो सुनील दत्त उनसे नाखुश तो हुए. संयोग कपिल शर्मा शो में वह संजय दत्त के साथ ही पहुंचे थे. उन्होंने चुटकी ली कि बाप-बेटे के बीच वो फंस गए. हालांकि सुनील शेट्टी ने हमेशा यह साफ रखा कि उनके मन में सुनील दत्त के लिए अपार सम्मान है.
पिता और बहन रहे सांसद
सुनील दत्त वह चुनाव जीत गए. अपनी साख बरकरार रखी. वैसे सुनील दत्त और उनकी बेटी प्रिया दत्त दोनों का ही राजनीतिक करियर काफी प्रभावशाली रहा. सुनील दत्त कुल 17 साल तक सांसद रहे. वह मुंबई उत्तर-पश्चिम सीट से चुनाव लड़ते थे. वर्ष 2004 में वह मनमोहन सिंह सरकार में ‘युवा मामले और खेल मंत्री’ बने. 25 मई 2005 को अपने निधन तक इस पद पर रहे.
प्रिया दत्त कुल मिलाकर करीब 9 साल तक पिता की ही सीट उत्तर पश्चिम मुंबई से सांसद रहीं. 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. फिलहाल वह सामाजिक कामों और ‘नरगिस दत्त फाउंडेशन’ से जुड़ी हुई हैं.
क्यों चुनाव लड़ते लड़ते रह गए संजय
संजय दत्त भी चुनाव लड़ते लड़ते रह गए. वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में संजय दत्त आधिकारिक तौर पर समाजवादी पार्टी में शामिल हुए थे. पार्टी ने उन्हें लखनऊ से उम्मीदवार घोषित कर दिया. उन्होंने भी जोर-शोर से चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया. लेकिन 1993 के मुंबई बम धमाकों में सजा होने की वजह से सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सजा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. कोर्ट का तर्क था कि एक सजायाफ्ता व्यक्ति को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती.
इस वजह से संजय दत्त का नामांकन रद्द हो गया. उनकी जगह समाजवादी पार्टी ने नफीसा अली को मैदान में उतारा. संजय दत्त ने चुनाव तो नहीं लड़ा, लेकिन वह उस समय समाजवादी पार्टी के महासचिव बने. कई उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया.अब वह राजनीति से दूर रहते हैं

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